एम्बुलेंस ना मिलने पर रिक्शा से ले गए शव, GRP की बढ़ी मुश्किल

उत्तर प्रदेश में इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है। बांदा-मानिकपुर रेल रूट पर मिले वृद्ध का शव को एम्बुलेंस न मिलने पर जीआरपी के कॉन्स्टेबल रिक्शे पर लादकर पोस्टमॉर्टम के लिए ले गए।
एम्बुलेंस ना मिलने पर रिक्शा से ले गए शव, GRP की बढ़ी मुश्किल
 

पिछले महीने मिर्जापुर में एक भाई को अपनी शादीशुदा बहन को कंधे पर रखकर हॉस्पिटल ले जाना पड़ा था। वहीं, कौशांबी में एक शख्स को अपनी सात महीने की भांजी की बाॅडी कंधे पर रखकर 10 किलोमीटर का रास्ता साइकिल से तय करना पड़ा था।  

रिक्शे पर पोस्टमार्टम हाउस भेजने के ताजा मामले में जीआरपी घिर गई है। एसडीएम सदर ने जांच में जीआरपी की लापरवाही पाई है। उधर, जीआरपी थानाध्यक्ष का कहना है कि रिक्शे पर शव वृद्ध के परिजन ले गए थे।

शनिवार की शाम बांदा-मानिकपुर रूट पर नहरपुर अतर्रा के पास मिले 70 वर्षीय वृद्ध का शव मिला था। शव पोस्टमार्टम हाउस रिक्शे पर भेजा गया था। यह मामला मीडिया में उछला तो डीएम ने एसडीएम सदर प्रहलाद सिंह को जांच के आदेश दिए। रविवार को एसडीएम ने जांच की। उन्होंने जीआरपी थानाध्यक्ष इंद्रमोहन बडोला और प्रभारी सीएमओ से लिखित बयान लिए।

रिक्शे में शव रख कर ले जाते हुए जीआरपी जवान पीछे चलते हुए

शाम को डीएम को सौंपी जांच रिपोर्ट में जीआरपी थाना प्रभारी इंद्रमोहन बडोला के बयानों का हवाला देकर कहा कि मृतक की शिनाख्त हो चुकी थी। परिजन थाने आ गए थे। जीआरपी कांस्टेबलों को शव पोस्टमार्टम हाउस ले जाने के लिए प्राइवेट वाहन नहीं मिल पाया। इस पर मृतक के परिजन खुद शव को रिक्शे पर रखकर पोस्टमार्टम हाउस ले गए। एसडीएम ने जांच रिपोर्ट में लिखा है कि जीआरपी को चाहिए था कि मुक्तिधाम अथवा सीएमओ से संपर्क कर शव के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था कराते, लेकिन जीआरपी ने लापरवाही बरती।

यह भी लिखा कि जीआरपी थाना प्रभारी ने यह भी बताया कि अज्ञात शव के निस्तारण और अंतिम संस्कार के लिए सरकार की ओर से 1000 रुपये खर्च की व्यवस्था है, लेकिन शिनाख्त हो जाने पर यह नियम नहीं लागू होता। परिजन ही अंतिम संस्कार करते हैं। उधर, प्रभारी सीएमओ भगवती प्रसाद ने अपने बयान में कहा है कि जिला अस्पताल में मृत्यु होने पर ही शव को परिजनों या पोस्टमार्टम के लिए शव वाहन नि:शुल्क उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। सीएमओ ने इसका शासनादेश भी संलग्न किया है।
 

कानपुर देहात में बेटे का शव कंधे पर ले जाने को मजबूर हुआ था बाप
छह जनवरी को कानपुर देहात में एंबुलेंस नहीं मिलने पर बेटे के शव को कंधे पर लादकर ले जाने का मामला हमने आपको दिखाया था। मासूम की लाश ले जाने के लिए परिवारवालों को गाड़ी भी नहीं दी गई और मजबूरी में कंधे पर 10 साल के मासूम की लाश ले जानी पड़ी। न अस्पताल का दिल पसीजा, न बाजार में किसी का दिल पिघला।

मिर्जापुर में भाई के कंधे पर बहन ने तोड़ा था दम
उत्तर प्रदेश के ही मिर्जापुर में 28 जून को 108 एम्बुलेंस नहीं मिलने पर एक भाई अपनी शादीशुदा बहन को कंधे पर लादकर अस्पताल के लिए निकल पड़ा था, लेकिन रास्ते में बहन की मौत हो गई। उसके परिवार वालों का आरोप था कि उन्होंने एम्बुलेंस की मांग की थी, लेकिन वह एक घंटे तक नहीं पहुंची। बहन को तड़पता देख भाई उसे कंधे पर उठाकर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के लिए निकल पड़ा। वह करीब200 मीटर ही गया था कि बहन ने उसके कंधे पर ही दम तोड़ दिया। बहन की मौत के बाद रोता-बिलखता भाई अपनी बहन की लाश को कंधे पर ही लादकर घर पहुंचा था।

एम्बुलेंस​ के बदले 800 रुपए मांगने का आरोप
इससे पहले यूपी के कौशांबी में 12 जून को ऐसा ही मामला सामने आया था। वहां एक शख्स को अपनी सात महीने की भांजी की बॉडी कंधे पर लादकर हॉस्पिटल से 10 किलोमीटर साइकिल से घर ले जाना पड़ा था। इस मामले में विक्टिम फैमिली का आरोप था कि सरकारी हॉस्पिटल ने एम्बुलेंस के लिए उनसे 800 रुपए की मांग की थी।

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