उबरना नहीं है मुश्किल बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर से, जानिए कैसे करें बचाव

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर (बीपीडी) की पहचान करना आसान नहीं होता। कई सामान्य लक्षणों की वजह से अकसर इसकी पहचान और सही उपचार में देरी हो जाती है। बीपीडी के उपचार में समाज और परिवार की भी खास भूमिका होती है। बता रही हैं

अचानक से भावनाओं का तूफान सा टूट पड़ता है/ पल-पल में मूड स्विंग होता है/ हर छोटा मसला बहुत बड़ा महसूस होता है/ रिश्ते बहुत तेजी से बनते-बिगड़ते हैं/ खुद को किसी से जुड़ा हुआ नहीं पाते/ज्यादातर समय ये लक्षण बने रहते हैं तो यह मामूली बात नहीं है। यह बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर  (बीपीडी) भी हो सकता है। वैसे ये लक्षण कभी-कभार सबमें दिखाई दे जाते हैं, पर बीडीपी से पीड़ित लोगों में यह व्यवहार बहुत बढ़ जाता है।

ज्यादातर समय मरीज बेहद संवेदनशील रहने लगता है। कुल मिलाकर, यह व्यक्ति के मूड, छवि और व्यवहार में तेजी से बदलाव आने की दिक्कतों से जुड़ी मानसिक समस्या है। उपचार में देरी किए जाने से बीपीडी के मरीजों में अवसाद और मूड संबंधी दूसरी समस्याएं भी होने लगती हैं। बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा होता है। आंकड़ों की मानें तो इसके 90 प्रतिशत मामले औरतों से जुड़े ही होते हैं। आनुवंशिक कारण भी इसकी वजह होते हैं।

आते हैं आत्महत्या के विचार 
शोधों के अनुसार बीडीपी के शिकार लोगों को आत्महत्या के विचार ज्यादा आते हैं।  इससे पीड़ित 80 प्रतिशत मरीज आत्महत्या के बारे में सोचते रहते हैं। ज्यादा परेशान होने पर वे खुद को काट लेने, जला लेने जैसे विचारों से घिरा पाते हैं। इसके पीड़ितों में 4 से 9 प्रतिशत की मृत्यु आत्महत्या के कारण ही होती है। ऐसे में करीबी लोगों को बेहद सतर्क रहने के साथ-साथ माहौल को सकारात्मक रखना पड़ता है।

पहचान क्यों है मुश्किल  
कई लक्षण सामान्य होने के कारण इस डिसॉर्डर की पहचान मुश्किल होती है। कई बार बीमार व्यक्ति की दिक्कत परिवार भी नहीं समझ पाता। एक ओर इस डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्ति अकेला महसूस करता है, दूसरी ओर पल-पल में मूड बदलना लोगों को मरीज के करीब आने ही नहीं देता। इसी वजह से पीड़ित व्यक्ति अंदर ही अंदर घुटता रहता है और अपनी बात किसी से साझा नहीं कर पाता है। जिससे स्थितियां बिगड़ती चली जाती हैं।

ऐसे लोगों को लगातार अपने आसपास के लोगों से तालमेल बिठाने में दिक्कत होती है। अपने भावों को संभाल नहीं पाने के कारण ऐसे लोग अकसर तनावपूर्ण मानसिक और व्यवहारगत समस्याओं से जुड़े रहते हैं। आमतौर पर वयस्क होने पर इसके  लक्षण सामने आते हैं।

कुछ खास लक्षण
– व्यक्ति भीतर से खालीपन महसूस करता है। वह खुद को अकेला समझता है।
– ऐसे मरीज कभी कोई एक निर्णय नहीं ले पाते हैं। किसी एक चीज का चुनाव करना इनके लिए कठिन होता है।
– रिश्तों में अस्थिरता होती है। रिश्ते बहुत तेजी से बनते-बिगड़ते हैं। लंबे समय तक कोई भी रिश्ता बनाए रखना इनके लिए कठिन होता है।
– ऐसे लोग या तो किसी से बहुत प्रेम करने लगते हैं या अकारण ही नफरत।
– अचानक से बहुत तेज गुस्सा आने लगता है।
– ऐसे लोग आत्महत्या की धमकी देकर अपना काम निकालना भी खूब जानते हैं।
– व्यक्ति को खुद का बिंब बदलता हुआ सा महसूस होता है।
– हमेशा डर और असुरक्षा के भावों से घिरे रहते हैं। यह डर सताता रहता है कि करीबी लोग छोड़कर चले जाएंगे।
– बड़ी जल्दी आवेग में आ जाते हैं। अगर कुछ सोच लिया तो उसे तुरंत करना है, फिर समय और हालात भी नहीं देख पाते।

कुछ सामान्य लक्षण 
– खुद के बारे में एक जैसी और अच्छी सोच ना रख पाना।
– खुद को दूसरों से जुड़ा हुआ महसूस न करना।
– दूसरों के लिए सहानुभूति महसूस न करना।
– नकारे जाने से डरना। तेजी से मूड बदलना।
– चिंता और अवसाद की भावना से घिरे रहना।
– खुद को संभाल नहीं पाने के कारण सेक्स व मादक द्रव्यों का सेवन ज्यादा करना
– लापरवाही से ड्राइविंग करना और अचानक विध्वसंक हो उठना।
– लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना।

सुधार होंगे ऐसे
मरीज और करीबियों, दोनों के लिए यह स्थिति कठिन होती है। उपचार के तौर पर मरीजों को भावों को संभालना प्रमुख रूप से सिखाया जाता है। साथ ही करीबियों की भी काउंसलिंग की जाती है। रिश्तों से जोड़ने के लिए कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी की मदद भी ली जाती है। मनोरोग विशेषज्ञ व्यक्ति की पुरानी बीमारियों, पारिवारिक माहौल से जुड़े प्रश्न भी पूछते हैं। यह इलाज थोड़ा लंबा होता है। हालांकि इसमें दवाएं भी दी जाती है, पर काउंसलिंग सबसे जरूरी होती है।  मरीज की स्थिति के आधार पर थेरेपी का चुनाव किया जाता है।

कुछ विशेषज्ञ एक खास तरह की थेरेपी को चुनते हैं, जिसे डीबीटी यानी डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी कहा जाता है। इसमें इलाज को पांच हिस्सों में बांटा जाता है। जो हैं-
– व्यक्तिगत चिकित्सा
– समूह कौशल प्रशिक्षण
– माइंडफुलनेस
– आवश्यकतानुसार फोन पर सलाह देना
– हिम्मत बनाए रखने के लिए काउंसलिंग और रोगी की देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाता है।

क्यों होता है बीपीडी 
बीपीडी के कई कारण हो सकते हैं:
आनुवंशिक कारण: परिवार में माता-पिता में से किसी को यह समस्या होने पर बच्चों में इसके होने की आशंका बढ़ जाती है

हार्मोन असंतुलन: कई बार गर्भावस्था में हार्मोन असंतुलन से बच्चे पर असर पड़ जाता है।

तनाव: तनावपूर्ण माहौल में लंबे समय तक रहना भी इसका शिकार बना सकता है। बचपन में शारीरिक शोषण का शिकार या बहुत कम उम्र में अपनों से अलग हुए बच्चों में इसका असर देखने को मिलता है।

बड़े हादसे: 
– माता-पिता या बच्चों की मृत्य
– प्यार में धोखा
– करीबी रिश्ता टूटना
– घरेलू हिंसा के ईद-गिर्द बचपन बीतना।

परिवार का साथ है जरूरी 
बीपीडी के लिए घर का माहौल काफी हद तक जिम्मेदार होता है। घर में लगातार लड़ाइयां होना या फिर माता-पिता के बीच मतभेद होना भी इस डिसॉर्डर को जन्म दे सकता है। इस डिसॉर्डर की पहचान खुद भी की जा सकती है। खुद पर ध्यान दीजिए कि कहीं आप बहुत सारे नकारात्मक विचारों से तो नहीं घिरे हुए हैं, जिन्हें काबू रख पाना मुश्किल हो रहा है। अगर ऐसा है तो यह विशेषज्ञों की मदद लेने का सही समय है।

इस दिक्कत में कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी भी कारगर मानी जाती है। इसमें बुरे विचारों को अच्छे विचारों में बदलने की कोशिश की जाती है। दवाओं की भी भूमिका होती है, पर सबसे बड़ा योगदान परिवार का होता है। मरीज के करीबी सदस्यों को लगातार यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि मरीज के मन में क्या चल रहा है। वो ना बताना चाहे तो भी प्यार से पेश आते हुए उनसे बातचीत जारी रखनी चाहिए। ऐसे लोगों के साथ ईमानदारी से व्यवहार करना चाहिए। तनावपूर्ण व गंभीर मसलों की बातचीत उनके व्यवहार और हालात को देखकर ही करनी चाहिए। मरीज से विनम्रता से पेश आना चाहिए। साथ ही हर समय उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

गंभीर है स्थिति

02 करोड़ लोग भारत में बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर से पीड़ित हैं। 95 प्रतिशत को सही इलाज नहीं मिल पाता।

70 से 80 फीसदी मामलों में बीपीडी के मरीजों के शारीरिक शोषण का इतिहास देखने को मिलता है।

20 के आसपास की उम्र के बीपीडी मरीजों को खास देखभाल चाहिए। खुद को हानि पहुंचाने के ज्यादा मामले इस उम्र के पीड़ितों में मिलते हैं।

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