उत्तराखंड के चार निगमों में भाजपा मेयर की अग्नि परीक्षा तो दो में कांग्रेसी मेयर के लिए मुश्किल
वर्तमान स्थिति में जिन चार नगर निगमों में भाजपा के मेयर निर्वाचित हुए हैं, वहां बोर्ड में कांग्रेेस-निर्दल का वर्चस्व है तो जिन दो निगमों में कांग्रेस के मेयर चुने गए हैं, वहां भाजपा-निर्दल का प्रभुत्व है। यही वजह है कि निकाय चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा सात में से पांच नगर निगमों में मेयर पद पर काबिज होने के बावजूद सहज नहीं है। हल्द्वानी, ऋषिकेश, रुद्रपुर और काशीपुर में उसके पार्षदों की संख्या बहुमत से दूर है। ऐसे हालातों में निर्दलियों को साथ लेना उसकी मजबूरी होगी। ठीक यही हालत कोटद्वार और हरिद्वार नगर निगम में मेयर पद पर जीती कांग्रेस की है।
फिलहाल दो दिसंबर को शपथग्रहण समारोह से पहले भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने वर्चस्व वाली छोटी सरकारों में भविष्य में बढ़ने वाली तकरार से बचने के रास्ते खोजने में जुटी है। सामान्य प्रस्ताव को पास कराने को जहां पचास फीसदी से एक अधिक संख्या बल चाहिए तो वहीं, संविधान संशोधन, बजट व अन्य विशेष मामलों में दो तिहाई कोरम की आवश्यकता होगी। छह नगर निगमों में बहुमत और कोरम की दिक्कतें हैं। यही वजह है कि दोनों दल निर्दलियों पर डोरे डाल रहे हैं। पूर्व मेयर विनोद चमोली कहते हैं, जिन मुद्दों पर मत विभाजन की नौबत आती है, निश्चिततौर पर उनमें दिक्कत आएगी। ऐसी स्थितियों में बहुमत महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन कई विषय ऐसे हैं जहां शासन को अधिकार है। मेयर चाहे तो नगर आयुक्त की सहमति से प्रस्ताव शासन को भेज सकता है। ऐसी स्थिति में भाजपा ज्यादा सहज है क्योंकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है। बहरहाल, स्थानीय सरकार के बोर्डों को चलाने के लिए बहुमत का पेच कहां हटेगा और कहां दिक्कत पैदा करेगा, ये आने वाला समय बता देगा।





