इस सनक का यारों क्या कहना !

सुरेन्द्र दुबे
एक शब्द है सनक। ये सनक व्यक्ति की हो सकती है।ये सनक समाज की हो सकती है।ये सनक संस्था की हो सकती है। सनक सनक में लोग बहुत अच्छे काम कर जाते हैं। सनक सनक में तमाम बार बड़ा नुकसान भी हो जाता है। सनक और लगन बड़े करीबी शब्द हैं। लगन हमेशा पॉजिटिव होती है,इसलिए उससे कोई खतरा नहीं रहता। सनक पॉजिटिव व निगेटिव दोनों हो सकती है इसलिए इसके अपने खतरे भी हो सकते हैं।
सनक का ताज़ा उदाहरण देखिए। शिक्षा मंत्रालय अपनी जिद पर अड़ गया है कि नीट व जे ई ई की परीक्षाएं हर हाल में सितम्बर में होंगी।
तालाबंदी के कारण पूरे देश में ट्रेनें बंद हैं।बसे। व टैक्सियां भी नहीं चल रही हैं।अधिकांश राज्यों में बाढ आई हुई है। यानी कि छात्रों के लिए परीक्षा स्थल तक पहुंचना परीक्षा पास करने से भी ज्यादा कठिन है। परीक्षा केंद्रों पर कैसे सामाजिक दूरी के नियमो का पालन होगा।

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नेता व सरकार दोनों ने सामाजिक दूरी के नियमो से दूरी बना रखी है। भाजपा के सदस्यता अभियान में जिस तरह भीड़ जुटाई जा रही है उस पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की जमकर क्लास ली है। आए दिन सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में सामाजिक दूरी बनाए रखने के नियमों को अंगूठा दिखा कर सरकार लगातार यह बता रही है कि वह अपनी सनक से ही काम करेगी।वह जब जो सोचेगी वहीं करेगी जैसा कि हर सनकी का चरित्र होता है।

सरकार की इस सनक का नतीजा छात्र भुगतेंगे
हजारों छात्रों की परीक्षा छूटेगी। परीक्षा केंद्रों पर सामाजिक दूरी के उचित इंतजाम न होने के कारण बीमारी का संक्रमण का खतरा।फिर यही बीमारी छात्रों के जरिए उनके घरों तक पहुंच सकती है। क्यों नहीं पहुंचेगी। बीमारी की अपनी सनक होती है। जो भी उसे छूने की कोशिश करेगा, उसे अपने लपेटे में ले लेगी।वायरस हमेशा आदमी से ज्यादा सनकी होता है।सनक का परिणाम पहले ही देश भुगत रहा है।सनक चढ़ी,पूरे देश में लाकड़ाऊंन कर दिया गया।

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करोड़ों लोग बीच में फंस गए।मजदूर भी एक नंबर के सनकी। पैदल ही अपने घरों को चल पड़े।कुछ सनकी लोगों ने इन लोगों को खाना भी खिलाया। एक बहुत बड़े सनकी सोनू सूद ने अपने खर्चे से इन लोगों को घरों तक पहुंचाया।इनके खाने पीने की भी व्यवस्था की।तो कभी कभी सनक में लोग अच्छा काम भी कर जाते हैं। कुछ लोग इन मजदूरों को बिलखता देखने के बाद भी सनक नहीं सके।बल्कि जब दूसरे लोगों ने इनकी मदद करनी चाही तो बसों पर ही बवाल मचा दिया।बुरी तरह सनक गए।
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वैसे इस अपने प्यारे देश में पिछले कई वर्षों से सनक महोत्सव ही चल रहा है।किसी भी सरकार को चैन से चलते देख कुछ लोग सनक जाते है। तोड़ फोड़ मचा देते हैं। ये लोग लोकतंत्र के रक्षक है।
इस लिए रक्षा करने के लिए सब कुछ अपने कब्जे में ले लेना चाहते हैं।नेता तो नेता संस्थाएं तक सनक गई है।अब इनकम टैक्स , सी बी आई व ई डी को ही लीजिए।जहां किसी सरकार को चैन से चलते देखा,छापे मारने लगती हैं।
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इनकी सनक राष्ट्रव्यापी है। तमाम सनकी इनकी सनक के भरोसे ही सनक महोत्सव का आनंद उठा रहे हैं। एक सनकी प्रशांत भूषण भी है जिन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी की सनक चढ़ी हुई है।अब भुगतें। कोर्ट नें मुजरिम मांन लिया है। अब सनक में कहीं दंड मिल गया तो फिर सारी सनक निकल जाएगी।

अब किसको किसको सनकी कहें। पूरे देश में ही ऐसा ही माहौल चल रहा है। मीडिया भी अपनी सनक में है।बेरोजगारी चरम पर है। लोग आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। पर मीडिया सुशांत सिंह राजपूत के पीछे पड़ा है। उसकी सनक है कि आत्महत्या को हत्या साबित करके रहेंगे। जनता भी अजब सनकी है। थोड़े दिन टी वी देखना बंद कर दे।पर नहीं उसकी भी सनक है कि जो दिखाना हो दिखाओ। देखते हैं कौन बड़ा सनकी है। हम भी बहुत बड़े सनकी है। वरना ये सब लिखने की क्या जरूरत थी। पर सनक है तो है। बस यही कह सकते हैं- इस सनक का यारों क्या कहना।
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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