इस चुनाव में गुजरात मॉडल की चर्चा क्यों नहीं ?

दिल्ली ब्यूरो: ठगनी राजनीति के क्या कहने ! यह कब किसी को अपने जाल में फसा ले यह भी कोई नहीं जानता। माया का जाल जब सर पर चढ़ता है तब मदारी जो कहता है ,जमूरा वही करता दिखता है।ये राजनेता किसी मदारी से कम नहीं। और जनता जमूरा भी है और दर्शक भी। जब दर्शक पर माया का जाल सफल हो जाता है तब वह भी जमूरा हो जाता है। आज देश की जो हालत है उसमे पूरी कथानक मदारी और जमूरे वाली है। ये बातें इसलिए कही जा रही है कि पिछले लोकसभा चुनावों में आर्थिक विकास के नाम पर प्रचारित किए गए ‘गुजरात मॉडल’ की काफी चर्चा थी. लेकिन इस बार यह भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं है. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तो उनके नेतृत्व में राज्य ने आर्थिक मोर्चे पर बेहतरीन प्रदर्शन किया था. इसे ‘गुजरात मॉडल’ नाम दिया गया जिसे पिछले लोकसभा चुनावों में खूब भुनाया गया था. लेकिन इस बार यह मॉडल चुनाव से जुड़ी किसी चर्चा का हिस्सा बनता नहीं दिख रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह है गुजरात की तरक्की का नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से कोई खास संबंध न होना.
एक रिपोर्ट के मुताबिक 2002-03 से 2013-14 के बीच गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) देश की जीडीपी के सीएजीआर से 29 प्रतिशत ज्यादा थी. यह वह समय था जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उनके नेतृत्व में गुजरात की उत्पादन वृद्धि भी देश की उत्पादन वृद्धि से 22 प्रतिशत अधिक थी. लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गुजरात आर्थिक विकास के मोर्चे पर पीछे नहीं रहा. इस संबंध में ताजा आंकड़े (2016-17) बताते हैं कि मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद भी राज्य उत्पादन समेत अन्य सभी क्षेत्रों में वृद्धि कर रहा है. दिलचस्प बात यह है कि मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले भी उत्पादन व आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर गुजरात बेहतर प्रदर्शन कर रहा था. संक्षेप में कहें तो नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले, बनने के बाद और अब मुख्यमंत्री पद छोड़ने पर भी गुजरात का आर्थिक विकास के रास्ते पर आगे बढ़ना जारी है.
इस तथ्य पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के असोसिएट प्रोफेर हिमांशु कहते हैं, ‘ये आंकड़े बताते हैं कि गुजरात के (अच्छे) आर्थिक प्रदर्शन का नरेंद्र मोदी से नाता थोड़ा ही है. बल्कि 2014 में मोदी के (मुख्यमंत्री) रहते हुए ही कई अर्थशास्त्रियों ने गुजरात की आर्थिक शासन प्रणाली में समस्याएं होने की बात कही थी. 2017 के विधानसभा चुनावों में गुजरात की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्रों की खराब होती हालत सामने आ गई थी.’ वहीं, कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता राजीव गोड़ा कहते हैं, ‘गुजरात मॉडल की पोल बहुत पहले खुल चुकी है. यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री ने इसका जिक्र करना बंद कर दिया है. ऊना में दलितों की पिटाई, समाज के अलग-अलग समूहों में बढ़ती बेचैनी और कम मानव विकास बताते हैं कि गुजरात मॉडल कुछ लोगों को फायदा भर पहुंचाने के लिए बनाया गया था.’
वहीं, स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन कहते हैं, ‘अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में हुई उच्च वृद्धि के चलते गुजरात मॉडल सामने आया था. ऐसा कृषि के लिए सिंचाई सुविधाओं में हुए सुधार और प्रशासन में पूर्ण रूप से पारदर्शिता होने की वजह से हुआ था… मोदी ने 2014 में गुजरात मॉडल को बहस का मुद्दा बनाया था. लेकिन अब यह बदल चुका है.’

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