इस कृषि विश्वविद्यालय की अनियमितताओं पर फिर उठे सवाल

जुबिली न्यूज़ डेस्क
लखनऊ. चन्द्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर में चल रही अनिमितताओं और शासकीय नियमों की अनदेखी रुकने का नाम नहीं ले रही है. छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के वित्त अधिकारी धीरेन्द्र कुमार तिवारी ने चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के अर्थ नियंत्रक को फिर से पत्र लिखकर विश्वविद्यालय में चल रही गतिविधियों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है.
पत्र में कहा गया है कि शासन ने अपने विभिन्न आदेशों में चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर के लिए कुछ व्यवस्थाएं की हैं. जिसका अनुपालन होता हुआ नहीं दिख रहा है.

अर्थ नियंत्रक को बताया गया है कि चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर में वित्तीय अनुशान स्थापित किये जाने के लिए शासनादेश संख्या 3028/ 67/ कृ.शि.-4-1506/ दिनांक 22 दिसंबर 2004 का अनुपालन विशेषकर वित्तीय उपाशय के मुद्दे पर शासन से पुष्टि नहीं कराई गई.
शासकीय आदेशों की अवहेलना का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि आईसीएआर से शतप्रतिशत वित्त पोषित तदर्थ योजनाओं में कार्यरत कार्मिकों का ट्रांसफर या समायोजन राज्य सरकार द्वारा सृजित पदों पर करके राजकीय अनुदान द्वारा अनियमित भुगतान और उन्हें सातवाँ वेतनमान का भुगतान किया गया.
इसी तरह त्रुटिपूर्ण वेतन निधारण की आदित आपत्ति के बावजूद उसी तरह के नए अनियमित वेतन निर्धारण आदेशों के भी प्रकरण प्रकाश में आये हैं.
शासन को संदर्भित प्रकरणों पर भी विश्वविद्यालय स्तर पर निर्णय लिए जाते रहने की वजह से न्यायिक विवादों के प्रकरण बने.
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के वित्त अधिकारी ने चंद्रशेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के अर्थ नियंत्रक को लिखे पत्र में कहा है कि असाधारण गज़ट अधिसूचना संख्या 1450/ 79-वि-1-19-1(क)-5-19 दिनांक 5 अगस्त 2019 में वर्णित अध्यापक से भिन्न गैर शिक्षकों तथा सेवानिवृत्त गैर शिक्षकों को भी सिर्फ अध्यापकों के लिए अनुमन्य लाभ 62 वर्ष तक के सेवा विस्तार की कार्रवाई भी कर दी.
विश्वविद्यालय ने सृजित पदों से अधिक संख्या में कर्मचारियों को भुगतान किया. निधि लेखा विभाग ने वर्ष 2014-15 में इस पर लिखित आपत्ति भी की थी.
इसी तरह से विश्वविद्यालय के प्रबंध मंडल की 25 अप्रैल 2018 को हुई 153 वीं बैठक में 5 जुलाई 2017 के शासनादेश की व्यवस्था के प्रतिकूल लेखा संवर्ग में की गई प्रोन्नतियों को निरस्त कर दिया गया था लेकिन अब तक उक्त कार्मिकों का उन्हीं पदों पर कार्यरत रहना शासनादेश और प्रबंध मंडल के आदेशों की अवमानना प्रतीत होती है.
पत्र में कहा गया है कि कृषि विज्ञान केन्द्रों में मूल रूप से नियुक्त कार्मिकों को राज्य सरकार के सृजित पदों पर ट्रांसफर या समायोजन कर लिए जाने से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए जा रहे अनुदान पर अनियमित और गैर ज़रूरी व्यय भार पड़ रहा है.
पत्र में कहा गया है कि कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिकों को कैरियर एडवांसमेंट स्कीम और सातवें वेतनमान के सम्बन्ध में कृषि विज्ञान केन्द्रों के तदर्थ सेवा वाले कर्मचारियों के पेंशन के लाभ के सम्बन्ध में शासनादेश का कड़ाई से अनुपालन का प्रकरण भी सामने है.
साथ ही बैंकों से अप्रयुक्त चेकों को लेकर कैशियर के पास मौजूद अवशिष्ट चेकों का भौतिक सत्यापन कर दोनों का मिलान करने के आदेश भी दिए गए हैं. चेकों के दुरूपयोग को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है.
उधर बी.एस.एम.डी. कालेज कानपुर में शिक्षक और भाजपा प्रबुद्ध प्रकोष्ठ के नेता डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने अपर मुख्य सचिव वित्त और वित्त आयुक्त को पत्र लिखकर कहा है कि प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए वित्त विभाग द्वारा अनुदान स्वीकृत किया जाता है. वित्तीय स्वीकृतियों में यह स्पष्ट निर्देश रहता है कि जो शिक्षक और कर्मचारी शासन द्वारा नियमित रूप से सृजित पदों पर नियुक्त हैं उन्हें ही वेतन दिया जाए.
उन्होंने लिखा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने गज़ट प्रकाशित कर शिक्षक की परिभाषा भी स्पष्ट की है. राजाज्ञा के विपरीत कानपुर कृषि विश्वविद्यालय में यूजीसी मानक के विपरीत नान यूजीसी/ केवीके वैज्ञानिक एवं शोध सहायकों को नान प्लान मद में आवंटित अनुदान से वेतन दिया जा रहा है जो कि गज़ट की मंशा के विपरीत है.
डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने लिखा है कि कुलपति द्वारा मनमाने तरीके से प्लान में नियुक्त कर्मचारियों का नान प्लान के पद पर और नान प्लान में नियुक्त कर्मचारियों को प्लान के पदों पर ट्रांसफर कर गंभीर वित्तीय अनियमितता की जा रही है.
उन्होंने बताया है कि 22 दिसंबर 2004 कृषि शिक्षा उत्तर प्रदेश के शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि जिन मामलों में वित्तीय उपाशय निहित हो उसमें विश्वविद्यालय को शासन से सहमती लेनी पड़ेगी. बोर्ड की पिछली बैठक में भी यह बात बताई गई थी लेकिन कुलपति शासनादेशों का उल्लंघन करते हुए शिक्षकों की कमेटी बनाकर मनमाने तरीके से नान यूजीसी वैज्ञानिकों को सभी लाभ देने और गलत तरीके से वेतन निर्धारण का काम कर रहे हैं.
इसी तरह केवीके के कर्मचारियों को केवीके में वापस लेने के लिए जून 2020 में हुए शासनादेश का पालन भी नहीं किया जा रहा है. जिन कर्मचारियों का मददगार नहीं है उन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया है, लेकिन राजनीतिक पहुँच वाले और कुलपति के करीबी लोग अभी भी कार्यमुक्त नहीं किये गए हैं.
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डॉ. मिश्र ने लिखा है कि शिक्षकों के सम्बन्ध में सरकारी गज़ट का कड़ाई से अनुपालन हो. जो शिक्षक उससे आच्छादित हो उसे यूजीसी वेतनमान आदि के लाभ मिलें. इसके साथ ही विश्वविद्यालय में शासन द्वारा शिक्षकों और कर्मचारियों के कितने पद सरकार द्वारा सृजित हैं यह भी स्पष्ट नहीं है.विश्वविद्यालय अपनी सुविधा के अनुसार सृजित पदों की संख्या बदलता रहता है. रोस्टर रजिस्टर भी शासन के आदेशों के तहत नहीं बना है. कुलपति रिक्त पदों को भरने के लिए विज्ञापन देते रहते हैं. जबकि वित्त विभाग की नियमावली में इसकी मनाही है. विश्वविद्यालय के कई विभागों में आवश्यकता से अधिक कर्मचारी और शिक्षक हैं. इसकी समीक्षा कराई जानी चाहिए.

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