इसे किन्नर समुदाय का ‘भगवाकरण’ तो न मानें! अजय बोकिल की कलम से

कुछ लोग इसे किन्नर समुदाय का भगवाकरण भी कह सकते हैं, लेकिन मोक्षनगरी काशी में इस पितृ पक्ष में जो हुआ, उसे हिंदू समाज में सकारात्मक बदलाव का महत्वपूर्ण आयाम माना जाना चाहिए। वहां किन्नरों ने गंगा घाट पर अपने पूर्वजों का पिंडदान किया। यह धार्मिक संस्कार पिशाच मोचन कुंड पर किन्नर महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में कुंड पर हुआ। अपने ‘पूर्वजों’ की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष की प्राप्ति के लिए सारे किन्नरों ने पूरे विधि-विधान के साथ तर्पण किया और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। दो साल पहले भी किन्नरों ने इसी तरह पितरों का श्राद्ध किया था। तब उसकी ज्यादा चर्चा नहीं हुई थी। किन्नरों के श्राद्ध और पिंडदान का यह संस्कार काशी के 21 वेदपाठी ब्राह्मणों ने विधि विधान के साथ कराया। हिंदू धर्म में अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। मान्यता है कि इसमें किया जाने वाला पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज और सरल मार्ग है।
यह घटनाक्रम इसलिए भी गौर करने लायक है कि किन्नरों का कोई निश्चित धर्म नहीं होता। कानून के हिसाब से तृतीय लिंगी होने के साथ-साथ वे चाहे जिस धर्म का पालन कर सकते हैं। लेकिन धर्म खुद उन्हें अपना शायद ही मानता है। हिंदू धर्म में तो किन्नरों को मृत्यु के बाद दाह संस्कार की अनुमति नहीं है। वे स्वयं भी खुद ‘दुर्भाग्यशाली’ मानकर मृतकों को दफनाते हैं। यह संस्कार भी गोपनीय तरीके से किया जाता है। फिर भी उन्होने काशी में पिंड दान किया तो यह अपने आप में सांकेतिक है। कहते हैं कि हिंदू किन्नरों के पिंडदान का उदाहरण महाभारत में मिलता है, जहां भीष्म के हाथों मारे गए शिखंडी ( किन्नर) का पिंडदान का उल्लेख है।
शिखंडी श़ूर भी था, लेकिन किन्नरों के शौर्य को कभी स्वीकार नहीं किया गया, यह अलग बात है। वैसे भी किन्नर भारतीय समाज में हेय और तिरस्कार के भाव से ही देखा जाता है, भले ही उनके किन्नर होने में स्वयं उनका कोई दोष नहीं होता। उनका जन्म पूर्व जन्म के पापों का फल माना जाता है। जबकि यह दोष प्रकृति का है, जो उन्हें पुरूष या स्त्री नहीं बनाया। समाज से ठुकराए इन लोगों ने अपना समाज और परंपराएं बना ली हैं, ‍िजनका वे धार्मिक लक्ष्मण रेखाअों से परे जाकर पालन करते हैं। उसमें समावेशिता है। संख्या की दृष्टि से भी किन्नर देश में अल्पसंख्यंक हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में किन्नर ( हिजड़े) की संख्या करीब 19 लाख है। ज्यादातर किन्नर अपनी शारीरिक और सामाजिक अधकचरी स्थिति देखकर युवा वस्था में घरबार छोड़ देते हैं। महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी जैसे सुशिक्षित और संकल्पित बिरले किन्नर हैं, जो समाज की मुख्य धारा में रहकर अपने अधिकारों और समाज में बराबरी के हकों के लिए लड़ रहे हैं। किन्नरों द्वारा पिंडदान भी इसी लड़ाई की अहम कड़ी है।
यह जिज्ञासा सहज है कि जब किन्नरों में संतानोत्पत्ति की क्षमता नहीं होती तो उनके पितर कौन हैं? वो किसका और कौन सा श्राद्ध करते हैं? क्या ऐसा करना उचित है? सनातन धर्म में मनुष्य पर तीन ऋण माने गए हैं। पितृ, ऋषि और देव ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितरों का श्राद्ध पितृ ऋण से मुक्ति के लिए किया जाता है। काशी में किन्नरों ने अपने गुरूअों, चेलों, मांअोंऔर पिताअों को पितृ मानकर उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया। यह श्राद्ध ‘त्रिपिंडी’ विधि से से सम्पन्न हुआ। त्रिपिंडी इसलिए कि सामान्यत: श्राद्ध पूर्वजों की तीन पीढि़यों के लिए ‍िकया जाता है। लेकिन त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पीढि़यों से भी पहले के और अज्ञात पितरों के लिए किया जाता है। इसमें प्रावधान है कि यदि मृतक का गोत्र ज्ञात न हो तो उसके लिए ‘अनादिष्ट गोत्र’ शब्द प्रयोग किया जाए।
बहरहाल, यहां मकसद श्राद्ध विधि का विवरण देना अथवा धार्मिक कर्मकांड का औचित्य ठहराना नहीं है, बल्कि हिंदू में समाज हो रहे सकारात्मक बदलाव को रेखांकित करना है। क्योंकि किन्नर, चाहे वो कोई सा धर्म क्यों मानते हों, अमूमन हिकारत के भाव से ही देखे जाते रहे हैं। समाज उन्हें ताली पीट कर, कर्कश आवाज में गाते-नाचते जबरन नेग वसूल करने वालों के रूप में ही चीन्हता है। लेकिन वे भी मानव समुदाय का अभिन्न हिस्सा हैं, उनकी भी संवेदनाएं, धार्मिक विश्वास और आस्थाएं हैं, यह शायद ही कोई सोचता है । वैसे भी हिंदू कर्मकांडो में बहुत सारे किंतु-परंतु और वर्जनाएं हैं, जो कभी शुचिता के नाम पर तो कभी जाति वर्ण या योनि के नाम पर लागू की जाती हैं। ऐसे में नैसर्गिक विकृति या त्रुटि के शिकार किन्नर समुदाय को सम्मान पूर्वक अपने पितरों (वो जो भी हों) को मोक्ष दिलाने किया गया सनातन उपक्रम रू़ढि़यों में जकड़े हिंदू धर्म का एक प्रगतिशील कदम ही माना जाना चाहिए। अर्थात इससे ‍किन्नरों और उनकी जीवन शैली के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह रातों-रात नहीं बदल जाएगा। फिर भी इसे सही दिशा में शुरूआत तो मानी ही जा सकती है। 14 वे किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी का कहना है कि कोशिश है, कि हम हर पांचवे साल यहीं आकर अपने पितरों की आत्माभ की शांति के लिए पिंडदान करें। क्योंकि किन्नर बच्चे समाज में से ही आते हैं और हमारा समाज उनको गले लगाता है। हम उनसे जाति-न धर्म नहीं पूछते। इसलिए हमारा दायित्व है कि हमारे समाज में जन्मे लोग जो अब नहीं रहे, उनकी आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए पिंडदान करें।
यह अंध श्रद्धा भी हो सकती है। लेकिन श्रद्धाल से सत्कार्य सधे तो उसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए। श्राद्ध से पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्त होती है या नहीं, पिंडदान से पितर सचमुच प्रसन्न होते हैं या नहीं, यह पितरों की मुक्ति का संस्कार है या फिर उत्तराधिकारियों को कर्मकांड में उलझाए रखने का सनातन चक्र है, इस पर बहस हो सकती है। कहा यह भी जा सकता है ‍िक किन्नरों की पहली जरूरत शिक्षा और समुचित रोजगार है न ‍कि पिंडदान आदि। लेकिन यदि कोई संस्कार अपने सीमाअों से निकल कर सर्व समावेशी रूप ग्रहण करे तो उसे उसी रूप में लेना चाहिए। किन्नरों के पितरों और योनि मुक्ति का विचार भी काल्पनिक हो सकता है, लेकिन उन्हें तो इसी लोक कई बार नर्क सी जिंदगी जीनी पड़ती है, उसका क्या ? अगर इसी लोक में इस धार्मिक कर्मकांड के माध्यम से हिंदू समाज में कुछ हद तक भी बराबरी का दर्जा मिलता हो तो बुरा क्या है? क्योंकि किन्नरों को तो पितृ मुक्ति से भी ज्यादा गरज एक असहज और कृ‍त्रिम जीवन जीने के ‍अभिशाप से मुक्त होने की है।
हालांकि ऐसे धार्मिक कर्मकांडों की वैज्ञानिकता पर प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं। उनसे मिलने वाले वास्तविक लाभों पर भी सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन ये कर्मकांड कहीं न कहीं आस्था के माध्यम से मनुष्य की जिजीविषा को मजबूत भी करते हैं। अगर पितरो के तर्पण से मुख्यज धारा से बहिष्कृत किन्नर समुदाय कहीं सामान्य जीवन जीने की अोर प्रवृत्त होता है तो काशी में हुए श्राद्ध कर्म का प्रति फल कल्याणकारी ही मानिए। क्योंकि उपेक्षितों और बहिष्कृतों का कल्याण भी स्वयं समाज का कल्याण है। धर्म और देश का कल्याण है।

अजय बोकिल

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