आत्‍महत्‍या के विचार आने से रोकने में पूरी तरह सक्षम हैं होम्‍योपैथिक दवायें

-मन में उठ रहे आत्‍महत्‍या करने के आवेग को कर देती हैं समाप्‍त

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-भावनात्‍मक रूप से टूटने पर उठाते हैं मरीज आत्‍महत्‍या जैसा कदम

-विश्‍व आत्‍महत्‍या रोकथाम दिवस पर विशेष

डॉ गिरीश गुप्‍तधर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। व्‍यक्ति जब भावनात्‍मक रूप से टूट जाता है, और उसे किसी का सहयोग नहीं मिलता तो उसमें आत्‍महत्‍या की प्रवृत्ति पैदा होती है, उसके अंदर आवेग (इम्‍पल्‍स) पैदा होता है और उसी आवेग में वह आत्‍महत्‍या जैसा कदम उठा लेता है, होम्‍योपैथी में ऐसी कई अति उत्‍कृष्‍ट दवायें हैं जो इस आवेग को समाप्‍त करती हैं।

यह महत्‍वपूर्ण जानकारी यहां राजधानी लखनऊ स्थित गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के संस्‍थापक होम्‍योपैथिक विशेषज्ञ डॉ गिरीश गुप्‍त ने विश्‍व आत्‍महत्‍या रोकथाम दिवस के मौके पर ‘सेहत टाइम्‍स’ से विशेष बातचीत में दी। उन्‍होंने बताया कि भावनात्‍मक रूप से टूटने के बाद आत्‍महत्‍या जैसा कदम उठाने वाले लोग वही होते हैं, जिन्‍हें किसी का सहयोग नहीं मिलता, उनकी बात को समझने वाला कोई नहीं होता। उन्‍होंने कहा कि आवश्‍यक यह है कि यदि कोई व्‍यक्ति परेशान है, तो सबसे पहले उसके परिजनों, मित्रों को चाहिये कि उसकी परेशानी को समझे, उससे बात करे। उन्‍होंने बताया कि कई बार ऐसा भी होता है कि परेशान व्‍यक्ति अपनी समस्‍या दूसरों बताता भी है लेकिन सुनने वाला व्‍यक्ति इसकी गंभीरता को नहीं समझता और उसकी बात को हवा में उड़ा देता है, खासतौर से यह बात अगर उस व्‍यक्ति के परिजन या निकट का व्‍यक्ति कहता है तो मरीज को लगता है कि मेरी कोई सुनने वाला ही नहीं है, और उसका मनोबल टूटने लगता है।

कैसे-कैसे कारण

डॉ गुप्‍त ने बताया कि समस्‍याओं के पीछे अनेक कारण होते हैं, उन्‍होंने अपने मरीजों से मिले अनुभव के आधार पर बताया कि लखीमपुर के एक बिल्‍डर की दिक्‍कत यह थी उसे उस व्‍यक्ति ने धोखा दिया जिसकी उसने उसके कठिन वक्‍त के समय अपने साथ बिजनेस में लगा कर मदद की। बिल्‍डर का कहना था कि मुझे फाइनेंशियल लॉस होने का इतना अफसोस नहीं है जितना मेरे विश्‍वास को तोड़ने का अफसोस है। इसी प्रकार एक अधिकारी जिन्‍होंने दबाव में आकर गलत तरीके से कार्य किया, उसके बाद यह सोचकर, कि मैंने गलत किया है और अब मुझे इसकी सजा मिलेगी, उन्‍होंने आत्‍महत्‍या कर ली। इसी प्रकार एक अन्‍य अधिकारी ने धोखा खाकर घोटाले में फंसने के बाद अपनी जान दे दी।

डॉ गुप्‍ता का कहना था कि मेरा यह मानना है कि कोई ऐसी समस्‍या नहीं है जिसका समाधान न हो, बस जरूरत उस समय उसे ऐसे सहारे की होती है जो सही मार्ग दिखाये।

क्‍यों कारगर हैं होम्‍योपैथिक दवायें  

डॉ गिरीश ने बताया कि होम्‍योपै‍थी में शरीर को अलग-अलग अंगों में विभाजित न करते हुए, पूरे शरीर को एक मानकर, उसकी हिस्‍ट्री लेकर, मरीज की प्रकृति के अनुसार उपचार के लिए दवा का चयन किया जाता है। ये होम्‍योपैथिक दवायें आत्‍महत्‍या करने के लिए उठने वाले आवेग को जड़ से खत्‍म कर देती हैं। उन्‍होंने बताया कि अगर व्‍यक्ति को इस तरह की कोई मानसिक समस्‍या है तो उसे और उसके घरवालों को चाहिये कि किसी कुशल होम्‍योपैथिक चिकित्‍सक से सम्‍पर्क करें।

क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता

गंभीर रोगियों में दवा के साथ साइकोथेरेपी की भी भूमिका

डॉ गुप्‍त बताते हैं कि मरीज की हिस्‍ट्री और उसे हो रही दिक्‍कतों से पता चल जाता है कि उसकी समस्‍या किस स्‍तर की है। ऐसे में उसकी काउंसलिंग तो होती ही है, साथ ही रोगी की मनोदशा के हिसाब से उसके लिए दवा के साथ ही साइकोथेरेपी भी करनी होती है। इस बारे में गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च की क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता ने बताया कि रोगी की काउंसिलिंग कर  उसे हो रहे तनाव, एडिक्‍शन, आपसी संबधों जैसी परेशानियों का समाधान ढूंढ़ने का मनोबल पैदा किया जाता है, यह शॉर्ट टर्म होता है, यानी काउंसलिंग की लम्‍बे समय तक जरूरत नहीं पड़ती।

सावनी गुप्‍ता ने बताया कि लेकिन जब दिक्‍कतें बड़ी हो जाती हैं, और रोगी की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है, ये दिक्‍कतें बीमारियों जैसे सीवियर डिप्रेशन, ओसीडी, बायपोलर आदि का रूप ले लेती हैं, तो ऐसे में मरीज की साइकोथेरेपी की जाती है। सावनी बताती हैं कि प्रत्‍येक मरीज के लिए उसकी जरूरत के अनुसार साइकोथेरेपी के प्रकार का चुनाव किया जाता है, यानी अगर मरीज को विचारों से दिक्‍कत है या उसका व्‍यवहार परेशानी पैदा कर रहा है अथवा उसे भावनात्‍मक दिक्‍कत है, इन तीनों में जो भी परेशानी ज्‍यादा हावी होती है उसके अनुसार थैरेपी का चुनाव किया जाता है। यह लॉन्‍ग टर्म होती है, इसके कई सेशंस चलते हैं। साथ ही दवायें भी चलती हैं, इसके बाद मरीज ठीक हो जाता है।

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