आखिर रामलला को पीएम मोदी ने क्यों किया साष्टांग दंडवत प्रणाम? अगर नहीं जानते तो ये पढ़ें

अयोध्या। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों आज अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इससे पहले पीएम मोदी ने रामलला के दर्शन के समय प्रभू को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। आखिर साष्टांग दंडवत प्रणाम क्या होता है और ये क्यों किया जाता है? आज के समय में कई लोग ऐसे हैं जो इसके बारे में सही जानकारी नहीं रखते। तो आइए आज हम आपको इसके बारे में जानकारी देते हैं….
दरअसल साष्टांग दंडवत प्रणाम भारत में ऐसी परंपरा है, जिसमें अभिवादन की पराकाष्ठा है। यानि अगर कोई अपने इस मानव शरीर से किसी व्यक्ति, मूर्ति या देवता का अभिवादन या उसके प्रति श्रद्धा का अर्पण पूर्ण मनोयोग से करता है, तो उसकी मुद्रा साष्टांग दंडवत प्रणाम ही हो सकती है।
शास्त्रों में इस दंडवत प्रणाम को ‘साष्टांग प्रणाम’ भी कहा जाता है। प्राचीनकाल में ‘दंड’ सीधे बांस को कहा जाता था, और जब इस बांस को भूमि पर समतल रख दिया जाए, तो वह मुद्रा ‘दण्डवत’ हो जाती है। जब शरीर को इसी अवस्था में मुंह के बल भूमि पर लिटा दिया जाए, तो इसको दंडवत प्रणाम कहा जाता है। शरीर की इस मुद्रा में शरीर के 6 अंगों का भूमि से सीधा स्पर्श होता है। अर्थात् शरीर में स्थित 6 महामर्मो का स्पर्श भूमि से हो जाता है, जिन्हें वास्तुशास्त्र में ‘षण्महांति’ या ‘छ:महामर्म’ स्थान माना जाता है। ये अंग वास्तुपुरूष के महामर्म इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि ये शरीर के अतिसंवेदनशील अंग होते हैं।
योगशास्त्र में इन्हीं 6 अंगों में षड्चक्रों को लिया जाता है। षड्चक्रों का भूमि से स्पर्श होना इन चक्रों की सक्रियता और समन्वित एकाग्रता को इंगित करता है। एक साथ संपूर्ण शरीर के षड्चक्रों का स्पर्श होना, संपूर्ण एकाग्रता, पूर्ण समर्पण और पूर्ण श्रद्धा का प्रमाण माना जाता है।
दंडवत प्रणाम में व्यक्ति सब कुछ भूलकर केवल अपने श्रद्धेय के प्रति समर्पित हो जाता है। दंडवत प्रणाम की मुद्रा में व्यक्ति सभी इंद्रियों (पांच ज्ञानेंद्रियां और पांचों कर्मेद्रियों) को कछुए की भांति समेटकर अपने श्रद्धेय को समर्पित होता है। उसे ऐसा आभास होता है कि अब आत्म निवेदन और मौन श्रद्धा के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं करना है।





