आखिर क्यों कॉलेज में पड़ी यूनिसेक्स टॉयलेट की जरूरत?

कुछ साल पहले तक भारत में ट्रांसजेंडर किसी भी सरकारी फॉर्म में अपने जेंडर के बारे में नहीं बता सकते थे. लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें थर्ड जेंडर का दर्जा दिया. लेकिन आज भी भारत में शायद की कहीं ट्रांसजेंडर के लिए अलग टॉयलेट बनाए गए हैं. और ऐसी ही स्थिति पश्चिमी देशों में भी है. वहां भी ट्रांसजेंडर कई दिक्कतों से जूझते है. इसी को देखते हुए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज ने सभी टॉयलेट को यूनिसेक्स करने का फैसला लिया है. 

आखिर क्यों कॉलेज में पड़ी यूनिसेक्स टॉयलेट की जरूरत?इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में अब महिला और पुरुष छात्र अब एक ही टॉयलेट का इस्तेमाल करेंगे. समरविले कॉलेज में वोटिंग के आधार पर ये फैसला लिया गया, जिसमें 80 फीसदी ने इसके पक्ष में मतदान किया. 4 हजार छात्र-छात्राएं यहां पढ़ते हैं.

इन टॉयलेट की खास बात ये है कि इन्हें LGBT कम्यूनिटी के लोग भी सहजता से इस्तेमाल कर सकेंगे. कॉलेज के एक एलजीबीटी मामलों से जुड़े ऑफिसर ने इस फैसले का प्रस्ताव रखा था. उन्होंने कहा कि ये सिर्फ बोर्ड हटाना नहीं है, बल्कि जेंडर के आधार पर अलग-अलग किए गए स्पेस को एक करना है.

हालांकि, काफी छात्र-छात्राओं ने इस फैसले पर खुशी जाहिर की है, लेकिन कुछ महिलाओं ने चिंता जताई है इससे यौन हिंसा की घटना में बढ़ोतरी हो सकती है. पिछले सेमेस्टर में छात्रों ने ऐसे ही प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इस फैसले के बाद सभी टॉयलेट से मेल या फीमेल के साइन हटा दिए जाएंगे. इसकी जगह पर gender neutral toilets  लिखे जाएंगे. खास बात ये है कि समरविले कॉलेज 1990 तक सिर्फ महिलाओं का कॉलेज था. सीक्रेट बैलट के जरिए यहां वोटिंग हुई थी.

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