अहिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी की समस्याएं

नवीन कुमार घोषाल
भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। भौगोलिक रूप से हो या फिर सांस्कृतिक रूप से, तरह- तरह के रहन- सहन, रीति रिवाज और भाषाएं हमारी इस धरा को रंग-बिरंगा बनाती हैं। बात जब उठी है भाषा की तो भारत के हर राज्य की अपनी एक मातृभाषा है और इनके अलावा हर राज्य में कई प्रचलित बोलियां अपना वर्चस्व बनाये रखती हैं। वहां के बाशिंदे इन बोलियों में ही रचे-बसे और पगे हैं। इन्हीं के साथ उनका पूरा जीवन बीतता है।
अब बात यह उठती है कि जब हमारे देश में इतनी भाषाएं और उनकी बोलियां हैं तब इस देश को आखिर कौन सी भाषा है जो एक रखती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ऐसी कौन सी भाषा है जिसे लेकर कोई भी पूरे देश में आराम से घूम-फिर सकता है। नि:संदेह हमारी हिन्दी ही है जो पूरे देश में समझी जाती है। इसमेँ भावनाओं के संप्रेक्षण की वैज्ञानिक विधि समाहित है।
किंतु हिन्दी भले ही पूरे देश में समझी जा सकती हो लेकिन बोली भी जाती हो, ऐसा कतई नहीं है। यह एक कटू सत्य है। या फिर एक विडंबना है। दक्षिण भारत के राज्यों और पूर्वोत्तर राज्यों में हिन्दी को समझ लेते हों, पर वहां के निवासी इसे बोलने से कतराते हैं। शायद इसके पीछे वहां के राजनीतिक कारण हैं। पश्चिम बंगाल तक तो हिन्दी बोलने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे लेकिन अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में इस भाषा को बोलने वाले नगण्य ही हैं। अरुणाचल, मणिपुर और त्रिपुरा इसके अपवाद हो सकते हैं।
बंगाल में तो साइन बोर्ड पर आपको हिन्दी के दर्शन हो जाएंगे लेकिन और पूरब में जाने पर हिन्दी बिल्कुल गायब हो जाती है। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में तो हिन्दी का हाल और भी बुरा है। सबसे बड़ी बात यह कि वहां के लोग हिन्दी समझते अच्छी तरह से हैं लेकिन बोलना नहीं चाहते। यहां तक कि वहां हिन्दी बोलने वालों से खासी नफरत भी की जाती है। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रचलन के चलते भले ही दुनिया हमारी मेज या हमारे मोबाइल में सिमट गई हो और तमाम विविध संस्कृतियां एकाकार हो गई हों लेकिन इन सबके बावजूद देश के इन अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में हिन्दी की समस्याएं काफी विकट हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इन अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में राजभाषा के प्रति इतनी उदासीनता क्यों है? इसका प्रमुख कारण अगर ढूंढा जाए तो हम पाएंगे कि इन राज्यों में हिन्दी की दुर्दशा के लिए हिन्दीभाषी ही जिम्मेदार हैं। दरअसल हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लिए जितनी ईमानदारी से प्रयास होने चाहिए थे, वे नहीं हुए। हरिद्वार के प्रतिष्ठित कवि स्वर्गीय माणिक बाबू ने काफी पहले ही इस दर्द को कुछ इस तरह से बयां किया था-
‘अंग्रेज बन गये हम मैकाले के हाथों,
पतंग गोरे की उड़ी काले के हाथों,
निर्वस्त्र खड़ी है हिन्दी भाषा के जंगल में,
लुट गई है हिन्दी हिन्दी वालों के हाथों।
उपरोक्त पंक्तियों के निहितार्थ बहुत गहरे हैं। यह एक बहुत बड़ी विडम्बना ही कही जाएगी कि हिन्दी को आज तक उसी के क्षेत्र में कोई सशक्त मंच नहीं मिला, अहिन्दीभाषी क्षेत्रों की तो बात ही छोड़ दें। हिंदी भाषी उत्तर प्रदेश में ही इस वर्ष करीब ग्यारह लाख बच्चे बोर्ड परीक्षा में फेल हो गए। इसे क्या कहा जाए, उदासीनता नहीं तो और क्या है?
यह भी एक कटू सत्य ही है कि हिन्दीभाषी तथाकथित ‘क्षत्रप’ बरगद के पेड़ बनकर खड़े रहे और अपने नीचे कभी नये हस्ताक्षरों को पनपने ही नहीं दिया। फलस्वरूप हिन्दी लगातार अपना वजूद समेटती रही। जबकि अहिन्दीभाषी राज्यों में ऐसा नहीं है। वहां अपनी मातृभाषा को लेकर जितने ईमानदारी से प्रयास होते रहे हैं, उसी का परिणाम है कि इन राज्यों में वहां की भाषा लगातार मजबूत होती चली गई और वहां के लोगों की जीवनशैली में गहरे उतर गई।
वस्तुत: हिन्दी को इन तथाकथित ‘क्षत्रपों’ के चंगुल से मुक्त कराना होगा और आमजन को भागीदार बनाना होगा। स्मरण रहे कोई भी भाषा तब तक जन भाषा नहीं बन सकती, जब तक उस पर ‘ठेकेदारी’ हावी रहे। तो आइए, हिन्दी दिवस के बहाने अपनी हिन्दी को इन ‘ठेकेदारों’ से मुक्त कराएं और अपनी इस दुलारी भाषा को आजादी से खुली हवा में सांस लेने दें।
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