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अगर हुआ गठबंधन तो हो सकता है कुछ ऐसा भविष्य

लखनऊ। पिछले चुनाव में पार्टी की हालत और समय की नजाकत को देखते हुए बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने गठबंधन की नीति अपनाने पर जोर दिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इसकी राह इतनी आसान नहीं है। भले ही 2014 के चुनाव में बसपा का एक भी सांसद नहीं जीत सका था और सपा ने पांच सीटें जीती थीं लेकिन, मायावती किसी भी कीमत पर जूनियर पार्टनर बनने को तैयार नहीं होंगी। ऐसे में सपा का ‘बड़ा दिल ही गठबंधन को दिशा दे सकता है। सपा के लिए यह दोहरी चुनौती होगी क्योंकि उस पर सहयोगी दलों को संतुष्ट करने का दबाव भी होगा।अगर हुआ गठबंधन तो हो सकता है कुछ ऐसा भविष्य

वैसे तो सपा-बसपा 1993 में प्रदेश में एक साथ चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन, इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा था। फिर भी फूलपुर, गोरखपुर और कैराना लोकसभा के उपचुनाव में बसपा ने सपा के लिए अपने वोटों का ट्रांसफर कराकर सहयोगी की जमीन तैयार की थी। इन सभी उपचुनाव में भाजपा की हार ने विरोधियों का मनोबल आसमान में पहुंचा दिया लेकिन, बसपा ने संयत टिप्पणी ही की थी।

बसपा की कांग्रेस से बढ़ रही नजदीकियों ने भी असमंजस बनाए रखा था लेकिन, दिल्ली में हुई पार्टी नेताओं की बैठक में मायावती ने सभी राज्यों में गठबंधन की नीति पर चलने की बात कहकर यह संकेत दे दिए हैं कि आम चुनाव में उप्र में भी वह सपा के साथ को लेकर गंभीर हैं। सपा इस गठजोड़ को लेकर पहले से ही उत्साहित है, लेकिन इसका फार्मूला क्या होगा, इसका खाका स्पष्ट होना बाकी है।

प्रदेश में मायावती का अपना प्रतिबद्ध वोट बैंक है और वह इसे ट्रांसफर कराने में भी सक्षम हैं। पार्टी से जुड़े लोगों के अनुसार बसपा चालीस सीटों से कम पर समझौता नहीं करने वाली। समाजवादी पार्टी यदि इस पर सहमत होती है तो उसे अपने कोटे की सीटों में कटौती करनी होगी। यदि कांग्रेस इसका हिस्सा बनती है तो सीटों की उसकी दरकार सपा से ही होगी और रालोद भी अपनी हिस्सेदारी की बात करेगा।

इस वजह से सीटों के बंटवारे को लेकर पेंच खड़ा हो सकता है। एक फार्मूला यह भी चर्चा में है कि 2014 भाजपा के खिलाफ जिस भी दल का प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहा हो, वह सीट उस दल को दे दी जाए लेकिन, इस पर भी अभी आखिरी फैसला होना बाकी है। इस फैसले से कांग्रेस और रालोद जैसे संगठनों को आपत्ति होगी। 

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