तब और अब की बिहार छात्र राजनीति

पटना। बिहार की छात्र राजनीति की हनक, मायने और मकसद में पिछले पांच दशकों में भारी तब्दीली आई है। पहले छात्र नेता किसी दल के पिछलग्गू नहीं होते थे, बल्कि बड़े-बड़े दल उनके सहयोग के आकांक्षी होते थे। छात्र नेताओं की अलग पहचान होती थी। मगर अब के छात्र संगठनों की पहचान सियासी दलों की अनुषंगी इकाई भर रह गई है। ऐसे में कैसे सुधरेगी शिक्षण व्यवस्था और कैसे आएगी राजनीति में शुचिता?तब और अब की बिहार छात्र राजनीति

छात्र राजनीति: तब और अब

बिहार के विश्वविद्यालय यानी सियासत की ऐसी पाठशालाएं, जहां छात्र नेता एबीसीडी सीखते हैं और आगे चलकर बड़े नेताओं के मोहरे बन जाते हैं। छात्र राजनीति की यह वर्तमान तस्वीर है, किंतु पांच-छह दशक पहले ऐसी बात नहीं थी। इसी पाठशाला से नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, सुशील मोदी, अश्विनी चौबे, रविशंकर प्रसाद, रामजतन सिन्हा एवं अनिल शर्मा सरीखे हस्तियों ने राजनीति सीखी एवं उसे मकसद तक पहुंचाया। बाद की पीढ़ी के छात्र संघ अध्यक्षों में अभी तक एक भी ऐसा चेहरा नहीं उभरा है, जो मुख्यधारा की राजनीति में ठीक से कदम भी रख सके या शिक्षण व्यवस्था को सुधारने-संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

छात्र संघों को राज्‍यपाल की सलाह 

यही कारण है कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने दो दिन पहले पटना में एक कार्यक्रम के दौरान छात्र संघों को नया अध्याय शुरू करने की सलाह दी। शिक्षा में सुधार के लिए विश्वविद्यालय एवं कालेज प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए छात्रों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि अब पहले की तरह आंदोलन करने से व्यवस्था बदलने वाला नहीं। राज्यपाल खुद छात्र राजनीति से आए हैं। इसलिए उनसे बेहतर कोई बता-जता नहीं सकता कि 70 के दशक का दौर अब नहीं रह गया है, जब जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में बिहार की छात्र राजनीति ने देश को तानाशाही शासन से मुक्ति की राह दिखाई थी।

छात्र संघ अध्यक्ष का शिक्षा व्‍यवस्‍था पर कटाक्ष

इसी कार्यक्रम में पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष दिव्यांशु भारद्वाज का कहना था कि बिहार के बच्चे ताने सुनकर दूसरे प्रदेशों में पढ़ाई करने के लिए विवश हो रहे हैं, क्योंकि यहां तीन साल का कोर्स पांच साल में पूरा हो रहा है। बिहार में वक्त जाया करने से अच्छा वे ताने सुनकर समय पर पढ़ाई पूरी करना ज्यादा पसंद करते हैं।

एक ही मंच पर राज्यपाल की सलाह के साथ-साथ छात्र संघ अध्यक्ष के शब्दों में छात्रों का संकल्प भी दिखा। छात्र संघ अगर तत्परता दिखाए तो बिहार की शिक्षा व्यवस्था नि:संदेह बदल सकती है। छोटा से छोटा आंदोलन भी छात्रों की सक्रियता से बड़ा हो सकता है, क्योंकि छात्र संघ का मतलब जोश, जज्बे और जन सरोकारों से जुड़ाव वाली सियासत से है।

जेपी आंदोलन के बाद भटक गई बिहार की छात्र राजनीति

करीब पांच दशक पहले की छात्र राजनीति से सक्रिय हुए नेताओं की नजीरों से साबित भी होता है कि जनता के दुख-दर्द और जरूरतों की जितनी समझ छात्र नेता रहे राजनेताओं में है, उतनी किसी अन्य में नहीं। नया बिहार बनाने और राजनीति को मुकाम तक पहुंचाने में 70 के दशक में जेपी आंदोलन से जुड़े छात्र नेताओं की जितनी भूमिका है, उतनी किसी और की नहीं। यह दीगर है कि कोई मुकाम तक पहुंच गया तो कोई पहले ही लडख़ड़ा गया। जेपी आंदोलन के बाद बिहार की छात्र राजनीति भटक गई। तब से अभी तक राजनीति में छात्र नेताओं की कोई खास भूमिका नहीं रही, क्योंकि मुद्दे पर आंदोलन या संघर्ष का सवाल उत्तरोत्तर सिकुड़ता चला गया।

जातियों में बंट गई छात्रों की जमात

ऐसा क्यों हुआ, इसे 1980 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए शंभु शर्मा से बेहतर कौन बता सकता है। उनका सीधा जवाब है, जातिवाद ने चौपट कर दिया। बाद के वर्षों में मंडल आंदोलन के चलते छात्रों की जमात जातियों में बंट गई, जिसका सीधा असर हुआ कि संगठित छात्र शक्ति कमजोर हो गई और विश्वविद्यालय प्रबंधन निरंकुश। नियंत्रण और निगरानी हटने पर शिक्षण व्यवस्था चौपट और सत्र का विलंब होना लाजिमी है।

आज के छात्र नेताओं के पास चिंतन का अभाव

छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रामजतन सिन्हा इसकी वजह विचारों की कमी मानते हैं। वे कहते हैं कि आज के छात्र नेता गैर-राजनीतिक हैं। उनके पास चिंतन नहीं है। छात्र राजनीति में अति सक्रिय रहे एवं वर्तमान में कांग्रेेस नेता विनोद शर्मा के मुताबिक परीक्षा पैटर्न ने भी छात्र राजनीति को गर्त में ढकेला। विद्यार्थियों की विश्लेषण क्षमता कमजोर पड़ गई और ऑब्जेक्टिव सवाल-जवाब की परीक्षा ही ज्ञान का आधार बन गई।

छात्र राजनीति की दुर्गति के लिए जिम्मेवार ये तत्‍व

बहरहाल, छात्र राजनीति में राज्यपाल की अभिरूचि लेने से सुशील मोदी आशान्वित हैं। उन्हें 40 सालों का धुंध अब छंटता नजर आ रहा है। छात्र राजनीति की वर्तमान दुर्गति के लिए वह परिसर में आपराधिक प्रवृत्ति के प्रवेश को जिम्मेवार मानते हैं। उनके मुताबिक 70-80 के दशक में भी छात्र तोडफ़ोड़, हंगामा और बवाल करते थे, किंतु उसका भी एक स्तर होता था। अब तो आंदोलन का कोई मायने-मतलब नहीं होता। ऐसे में आगे की राह तो मुश्किल होगी ही।

अब वैसी बात कहां

बिहार की राजनीति कभी छात्र राजनीति का अनुसरण करती थी। सिर्फ जेपी आंदोलन की बात नहीं है। आजादी के तुरंत बाद पटना के छात्र आंदोलनों की गूंज ने दिल्ली के भी कान खड़े कर दिए थे। 1955 में पुलिस गोलीबारी में एक छात्र की मौत पर बीएन कालेज के छात्र भड़क गए थे। तब छात्र संघ की स्थापना भी नहीं हुई थी। फिर भी छात्र इतने एकजुट थे कि एक्शन कमेटी बनाकर राज्य सरकार के खिलाफ खड़े हो गए।

पूरे प्रदेश के छात्रों ने समर्थन दिया। जुलाई के पहले हफ्ते से शुरू हुआ आंदोलन अगस्त तक चला। पूर्व छात्र नेता एवं वर्तमान में राजद प्रवक्ता चितरंजन गगन के मुताबिक असर इतना व्यापक था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी पटना आना पड़ा। 30 अगस्त को गांधी मैदान से उन्होंने छात्रों को आंदोलन वापस लेने की चेतावनी दी, किंतु छात्र नहीं झुके।

नतीजतन तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के न चाहने के बावजूद नेहरू को गोलीकांड की जांच के लिए दास आयोग का गठन करना पड़ा था। इसका असर इतना व्यापक हुआ कि कुछ महीने बाद हुए चुनाव में महेश प्रसाद सिंह समेत तीन मंत्री हार गए। तीनों मंत्रियों की भूमिका को छात्र संदिग्ध मान रहे थे। इसलिए चुनाव में जनता ने सबक सिखा दिया। चार साल बाद 1959 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की स्थापना हुई।

बर्बाद की कहानी, पूर्ववर्ती छात्र संघ अध्‍यक्ष की जुबानी

पुरानी पीढ़ी के अंतिम छात्र संघ अध्यक्ष शंभु शर्मा थे, जो 24 जून 1980 में चुने गए थे। उनके मुताबिक छात्र राजनीति का आधार पहले सामाजिक हुआ करता था, जो अब जातीय हो गया। अनिल शर्मा के दौर तक कुछ हद तक शुचिता बची हुई थी, जो मेरे समय में पूरी तरह खत्म हो गई। 80 के दशक में शिक्षकों की विद्वता को भी जातीय चश्मे से देखा जाने लगा। एक जाति के शिक्षक को दूसरी जाति के छात्र नापसंद करने लगे। हॉस्टलों में आपराधिक किस्म के छात्रों का कब्जा हो गया। परिसर में अराजकता का राज हो गया। मुद्दे और आदर्श गायब हो गए।

पहले विद्यार्थियों को सहूलियतें-परेशानी, रोजगार परक प्रशिक्षण आदि मुद्दे होते थे, किंतु अब कैंपस की राजनीति को बड़े दल तय करने लगे हैं। इससे कंटेंट काफी बदल गया है। मेरे समय में साढ़े 17 हजार बच्चों के लिए 45 सौ शिक्षक थे। आज तो आधे भी नहीं हैं। जो हैं भी उन्हें पूरा वेतन नहीं मिलता। एडहॉक पर रखा गया है। पहले प्रोफेसर कैंपस में ही रहते थे। बच्चों के लिए 24 घंटे सुलभ थे, लेकिन अब तो हॉस्टल सुपङ्क्षरटेंडेंट को भी पुलिस सुरक्षा में आना पड़ता है। शंभु शर्मा निदान बताते हैं कि अगर सरकार, विश्वविद्यालय और छात्र नेता मिलकर काम करें तो वातावरण सुधर सकता है।

लालू को हराने वाले आज हाशिये पर

छात्र राजनीति से मुख्यधारा में आए कुछ नेताओं को मुकाम मिल गया तो कुछ हाशिये से बाहर नहीं निकल पाए। 1969 में पहली बार पटना विश्वविद्यालय में हुए प्रत्यक्ष चुनाव में राजेश्वर प्रसाद अध्यक्ष और लालू प्रसाद महासचिव चुने गए थे। राजेश्वर को मुख्य धारा में कोई जगह नहीं मिली, लेकिन लालू बिहार की राजनीति के पर्याय बन गए। उसके एक साल बाद 1971 में लालू को हराकर अध्यक्ष बनने वाले रामजतन सिन्हा को लोकप्रिय और सक्रिय अध्यक्ष माना गया था, लेकिन आज लालू की तुलना में वे भी कहीं नहीं हैं।

राजनारायण चेतना मंच के अध्यक्ष बालमुकुंद शर्मा को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। रामजतन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री पद से आगे नहीं बढ़ पाए, जबकि उनका अतीत सबसे ज्यादा सफल है। न्यूयार्क में आयोजित विश्व युवक असेंबली में भाग लेकर उन्होंने बिहार की छात्र राजनीति को गौरवान्वित किया था। भुवनेश्वर में हुए नेशनल काउंसिल ऑफ यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स ऑफ इंडिया के 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन में भी बिहार को प्रतिनिधित्व किया था।

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