उत्तराखंड में चौंदकोट के ये व्यक्ति चाल-खालों को देने निकले पुनर्जीवन

सतपुली, पौड़ी गढ़वाल: पानी के वैश्विक संकट को देखते हुए दुनियाभर में जल संवर्द्धन और संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर कवायद चल रही है। ऐसे में चौंदकोट क्षेत्र के संघर्षशील युवा भला कैसे खामोश रह सकते थे। पहाड़ के सूखते जल स्रोतों के कारण गायब हो रही हरियाली और भविष्य के पेयजल संकट से चिंतित इन उत्साही युवाओं ने चौंदकोट क्षेत्र में पुरखों के बनाए चाल-खालों को पुनर्जीवन देने का संकल्प लिया। और…’विश्व पर्यावरण दिवस’ पर वह निकल पड़े हाथों में गैंती व बेलचे लेकर माउंटेन मांझी की तरह एक नई पटकथा का आगाज करने। उत्तराखंड में चौंदकोट के ये व्यक्ति चाल-खालों को देने निकले पुनर्जीवन

पौड़ी गढ़वाल जिले का चौंदकोट क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौंदर्य और पुरुषार्थ के बूते समूचे उत्तराखंड में अपनी अलग पहचान रखता है। सात दशक पूर्व वर्ष 1951 में इस क्षेत्र के हजारों पुरुषार्थियों ने श्रमदान के बूते चंद दिनों में ही 30-30 किमी के मोटर मार्गों का निर्माण कर देश-दुनिया को श्रमशक्ति की अहमियत बता दी थी। लेकिन, बीते कुछ दशकों से चौंदकोट क्षेत्र में पानी की समस्या लगातार गहराती चली गई। नतीजा, क्षेत्र में जहां हरियाली तेजी से गायब हुई, वहीं गांवों से बेतहाशा पलायन भी शुरू हो गया। इन हालात से व्यथित क्षेत्र के युवाओं ने अपने पुरखों की तरह ‘माउंटेन दशरथ मांझी’ की भूमिका का अनुसरण कर अपने क्षेत्र के चाल-खालों को पुनर्जीवन देने का जीवट संकल्प लिया। विश्व पर्यावरण दिवस पर इन युवाओं की टोली हाथों में गैंती व बेलचे उठाकर चाल-खालों को पुनर्जीवन देने निकल पड़ी है।

 प्रकृति का संरक्षण हर व्यक्ति का दायित्व

मंगलवार को अपर जिलाधिकारी रामजी शरण ने फावड़े से गड्ढा खोदकर चौबट्टाखाल से युवाओं की इस मुहिम की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि प्रकृति का संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। जिस तेजी से विश्व में जल संकट बढ़ रहा है, उसे देखते हुए जरूरी है कि प्राकृतिक स्रोतों के संवद्र्धन को गंभीर प्रयास किए जाएं। 

 ‘भलु लगदू’ के सुधीर की पहल पर हुआ फीलगुड

पानी की अहमियत को लेकर पुरखों की अपनाई चाल-खाल संवर्द्धन की इस मुहिम को दोबारा साकार कर रहे हैं डबरा चमनाऊं निवासी सुधीर सुंद्रियाल। ढाई दशक पूर्व रोजी की खातिर एनसीआर की ओर रुख करने वाले सुधीर नामी कॉरपोरेट कंपनियों में लाखों का पैकेज लेकर खुशहाल जीवन जी रहे थे। लेकिन, घर आने पर बंजर खेतों की कतारों और रोजगार की तलाश में छोड़े गए घरों पर लटके तालों ने उन्हें व्यथित कर दिया।

फिर क्या था, पुरखों की थाती को दोबारा संवारने के लिए सुधीर ने चार साल पहले लाखों का पैकेज छोड़ गांव में ही पुरुषार्थ करने का उपक्रम शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने ‘भलु लगदू’ नाम से संस्था बनाकर ग्रामीणों को उससे जोड़ना शुरू किया। इन्हीं ग्रामीणों की मेहनत और लगन अब धीरे-धीरे रंग लाने लगी है।

सुधीर की प्रेरणा से क्षेत्र के दर्जनों युवा खेती-बागवानी की उन्नत तकनीकी अपनाकर स्वरोजगार की ओर बढ़ रहे हैं। सुधीर ने गांव में रह रही नई पीढ़ी के लिए अपने संसाधनों से ‘फीलगुड नॉलेज केंद्र’ की स्थापना कर उसे उन्नत जानकारी से रू-ब-रू कराने की अनूठी पहल भी की है। बकौल सुधीर, ‘पानी है तो जीवन है’, इस सूक्त वाक्य को ग्रामीणों और प्रवासियों के सम्मुख लाकर उनका लक्ष्य क्षेत्र की सभी पौराणिक खालों को पुनर्जीवन देना है।’  

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