NDA की लोकप्रियता हुई कम, नरेंद्र मोदी बने जनता की पहली पसंद

मोदी सरकार पहले की तुलना में अब कम लोकप्रिय है लेकिन 2019 के महामुकाबले के लिए नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए वोटरों की पसंद के मामले में भारी बढ़त बनाए हुए हैं. देशभर में कराए गए एक सर्वे से ऐसे संकेत सामने आए हैं.NDA की लोकप्रियता हुई कम, नरेंद्र मोदी बने जनता की पहली पसंद

नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी

लोकनीति-CSDS मूड ऑफ द नेशन (MOTN) सर्वे के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता के पैमाने पर देखा जाए तो नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच अंतर घटा है. पांच महीने पहले ये अंतर जहां 17 फीसदी था वो अब घटकर 10 फीसदी रह गया है.  

सर्वे कहता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी 34 फीसदी वोटरों की स्वाभाविक पसंद बने हुए हैं. वहीं इस पद के लिए राहुल 24 फीसदी वोटरों का समर्थन हासिल है. 2014 में मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए 36 फीसदी वोटरों की पसंद थे. चार साल बाद, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग वोटरों के बीच पैठ बनाने में सफल हुए हैं.

लोकसभा में NDA अब भी मार सकता है बाजी

सर्वे कहता है कि अगर तत्काल लोकसभा चुनाव होते हैं तो बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को 543 में से 274 सीट पर कामयाबी मिल सकती है. 2014 लोकसभा चुनाव में एनडीए को 323 सीट पर जीत हासिल हुई थी.

हालांकि यूपीए अब भी बहुमत के आंकड़े 272 से काफी पीछे है. स्टडी का अनुमान है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 164 सीट मिल सकती हैं. चार साल पहले इस गठबंधन को लोकसभा चुनाव में 60 सीट ही मिल पाई थी. सर्वे बताता है कि अभी चुनाव हों तो अन्य पार्टियों को 105 सीट पर जीत मिल सकती है. 2014 चुनाव में इन्हें 153 सीट पर कामयाबी मिली थी.

एंटी इंकम्बेंसी का असर

सर्वे के मुताबिक करीब आधे प्रतिभागी यानी 47 फीसदी इस हक में नहीं है कि केंद्र में मौजूदा सत्ताधारियों को दोबारा मौका दिया जाए. लेकिन जिन वोटरों का इंटरव्यू किया गया उनमें 39 फीसदी का कहना है मोदी प्रशासन एक बार और मौका दिए जाने के काबिल है. सर्वे में बाकी प्रतिभागी ऐसे थे जिन्होंने इस बारे में कोई साफ राय व्यक्त नहीं की.

MOTN सर्वे देश भर में फैले 175 असेम्बली निर्वाचन क्षेत्रों की 700 जगहों पर इस साल 28 अप्रैल से 17 मई के बीच कराया गया. देश के 19 राज्यों में कराए गए सर्वे में 15,859 प्रतिभागियों की राय जानी गई है. इन राज्यों के नाम हैं- आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में कराया गया.

अल्पसंख्यक मोदी सरकार के बड़े आलोचक

सर्वे के मुताबिक मोदी सरकार को लेकर नापसंदगी की भावना बढ़ रही है, खास तौर पर देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों में. मुस्लिमों में तीन चौथाई, ईसाइयों में हर पांच में से तीन और सिखों में करीब आधे प्रतिभागियों ने संकेत दिया कि वे मोदी सरकार को सत्ता में दोबारा लौटते देखना नहीं चाहते.    

मोदी सरकार को समर्थन में हिन्दू भी बंटे

मोदी प्रशासन को क्या फिर मौका मिलना चाहिए?  इस सवाल हिन्दू वोटर बंटे नजर आए. इनमें 42 फीसदी का कहना है कि मोदी प्रशासन को दोबारा मौका नहीं दिया जाना चाहिए. 44 फीसदी हिन्दू वोटर मोदी प्रशासन को दोबारा मौका देने के पक्ष में खड़े नजर आए.

सर्वे के मुताबिक सभी हिन्दू समुदायों की बात की जाए तो मोदी सरकार के विरोध में दलित और आदिवासी सबसे ज्यादा मुखर नजर आए. दलितों में 55 फीसदी, आदिवासियों में 43 फीसदी और अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) में 42 फीसदी केंद्र के मौजूदा प्रशासन से सख्त नाराज दिखा.

दलितों में कांग्रेस के लिए समर्थन बढ़ा

सर्वे से सामने आया है कि 2014 चुनाव के बाद पहली बार दलितों में कांग्रेस के लिए बीजेपी से ज्यादा समर्थन नजर आ रहा है. देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के समर्थन में जहां 23 फीसदी दलित वोटर खड़े दिख रहे हैं, वहीं बीजेपी को 22 फीसदी दलित ही समर्थन दे रहे हैं. सर्वे बताता है कि दलित और आदिवासियों ने प्रधानमंत्री के लिए पसंदीदा व्यक्ति के मामले मे भी राय बदली है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जनवरी में प्रधानमंत्री पद के लिए दलितों में 18 फीसदी और आदिवासियों में 27 फीसदी की पसंद थे. अब पांच महीने बाद 25 फीसदी दलित और 30 फीसदी आदिवासी राहुल को पीएम के लिए पहली पसंद बता रहे हैं.    

वहीं दूसरी ओर पीएम मोदी की लोकप्रियता बीते 5 महीनों में दलितों में 35 फीसदी से गिरकर 25 फीसदी और आदिवासियों में 42 फीसदी से गिरकर 37 फीसदी पर आ गई है.  

NDA  के आंकड़ों में उतार

सर्वे के मुताबिक “एनडीए के लिए आंकड़े उतने ही खराब हैं जितने जुलाई 2013 में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (UPA) के खिलाफ थे यानी 2014 लोकसभा चुनाव से 9 महीने पहले.”

उस वक्त 39 फीसदी वोटर यूपीए का विरोध कर रहे थे और सिर्फ 31 फीसदी ही उसका समर्थन करते दिख रहे थे. उस वक्त 30 फीसदी कोई राय व्यक्त करने की स्थिति में नहीं थे.  

ताजा MOTN सर्वे बताता है कि इस साल जनवरी में कराई गई आखिरी स्टडी से अब तक सत्तारूढ़ पार्टी ने वोटिंग-च्वाइस-इंडेक्स पर 2 फीसदी का गोता खाया है. इस साल के शुरू में 

करीब 34 फीसदी वोटरों की राय थी कि उसी समय लोकसभा चुनाव होते हैं तो वे बीजेपी को वोट देना पसंद करेंगे. पांच महीने बाद अब बीजेपी के समर्थन में खड़े वोटरों की संख्या घटकर 32 फीसदी रह गई है.

स्टडी में कहा गया है, “बीजेपी के समर्थन वाले वोटरों की संख्या में 2 फीसदी की गिरावट बेशक मामूली हो लेकिन ये लोकप्रियता में कमी  का संकेत है. यानी बीजेपी ग्राफ को नीचे गिरने से रोकने में नाकाम रही है.”  

लोकनीति-सीएसडीएस की ओर से बीते साल मई में कराए गए सर्वे के मुताबिक बीजेपी की लोकप्रियता शिखर पर थी, तब 39 फीसदी पार्टी को समर्थन देते दिख रहे थे.

स्टडी मे कहा गया है, ‘नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी भावना बढ़ने का अर्थ है कि बीजेपी के समर्थन आधार को नुकसान हुआ  है.

जहां तक पूरे एनडीए की बात है तो कुल वोटरों में से 37 फीसदी इसके पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं. जनवरी से अब तक इसमें तीन फीसदी की कमी आई है. मई 2017 से तुलना की जाए तो एनडीए के समर्थन-आधार में 8 फीसदी की कमी आई है.  

सहयोगी दलों के वोटरों में 52% मोदी के साथ

सर्वे बताता है कि सहयोगी दलों के वोटरों में से आधे से ज्यादा यानी 52 फीसदी मोदी सरकार को 2019 में एक और मौका देने के हक में हैं. वहीं हर पांच में से दो यानी 38 फीसदी वोटरों का कहना है कि वो मोदी सरकार को दोबारा सत्ता में लौटते नहीं देखना चाहते.   

सर्वे का कहना है, “अगर यही भावना आने वाले महीनों जोर पकड़ती हैं तो ये ना सिर्फ बीजेपी बल्कि इसके सहयोगियों के लिए भी गंभीर चुनौती होगा.”

क्षेत्रों में बीजेपी की स्थिति

कर्नाटक में बीजेपी के प्रदर्शन को एक तरफ रख दिया जाए तो दक्षिण भारत सत्तारूढ़ पार्टी के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है. पांच दक्षिणी राज्यों को मिला दिया जाए और आज चुनाव हों तो वहां सिर्फ 18 फीसदी वोटर ही बीजेपी के समर्थन में दिख रहे हैं. सर्वे के मुताबिक जनवरी से अब तक दक्षिण भारत में बीजेपी के समर्थन-आधार में 7 फीसदी की कमी आई है. इस गिरावट के लिए सबसे बड़ा कारण तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) का एनडीए से बाहर आना रहा है.     

स्टडी बताती है कि टीडीपी आंध्र प्रदेश में जनवरी के मुकाबले अब कहीं बेहतर स्थिति में है. दक्षिण भारत की अन्य पार्टियों की बात की जाए तो तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), डीएमके, जेडीएस और लेफ्ट का समर्थन-आधार पिछले 5 महीनों में बढ़ा है.  

उत्तर भारत की बात की जाए तो MOTN सर्वे के मुताबिक अब इस क्षेत्र में करीब 39 फीसदी वोटर बीजेपी/एनडीए का समर्थन कर रहे हैं. जनवरी में ये आंकड़ा 45 फीसदी पर था.

सर्वे कहता है, “क्षेत्र में बीजेपी के वोट शेयर में ये खासी गिरावट का कारण उत्तर प्रदेश जैसे अति महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ अचानक और स्पष्ट रूप से गिरना है. साल के शुरू से अब तक बीजेपी की लोकप्रियता में 8 फीसदी की गिरावट आई है.”   

“दो महीने पहले ही अस्तित्व में आया एसपी-बीएसपी गठबंधन वोटरों की पसंद में बीजेपी से कहीं आगे दिखाई दे रहा है.”

सर्वे के मुताबिक अगर पश्चिम और मध्य भारत की बात की जाए तो एनडीए ने यूपीए पर अपनी बढ़त बना रखी है. लेकिन गुजरात में कांग्रेस का समर्थन आधार बढ़ना ये दिखाता है कि दो राष्ट्रीय गठबंधनों में जो अंतर था वो अब सिकुड़ रहा है.

मई 2017 में इस क्षेत्र में एनडीए को यूपीए पर 24 फीसदी की बढ़त हासिल थी. सर्वे बताता है कि ये बढ़त घटकर अब 5 फीसदी पर आ गई है.

गुजरात के अलावा कांग्रेस मध्य प्रदेश में भी बेहतर प्रदर्शन करती नजर आ रही है. यहां लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर कांग्रेस को बीजेपी पर आरामदायक बढ़त दिखाई दे रही है.

सर्वे बताता है कि महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन आगे है लेकिन कांग्रेस और एनसीपी उसे कांटे की टक्कर दे रहे हैं. देश के पूर्वी हिस्सों की बात की जाए तो बीजेपी/एनडीए के लिए समर्थन बीते एक साल में स्थिर नजर आ रहा है.

बीजेपी का बिहार (जेडीयू के साथ) और ओडिशा में अच्छा प्रदर्शन करना जारी है. हालांकि पश्चिम बंगाल में ये कुछ खास असर नहीं बना सकी है. वहां तृणमूल कांग्रेस बहुत मजबूत स्थिति में बीजेपी से कहीं आगे है. अगर झारखंड और असम की बात की जाए तो वहां कांग्रेस के दोबारा मजबूत होने के संकेत साफ दिख रहे हैं.   

आर्थिक मुद्दे

आर्थिक मुद्दों को लेकर वोटरों की जो आशंकाएं हैं वो बीते 5 महीनों में कम नहीं की जा सकी हैं. सर्वे के मुताबिक कुछ क्षेत्रों में ये बढ़ गई हैं.  

बेरोजगारी अधिकतर वोटरों की मुख्य चिंता का विषय बना हुआ है. हर 4 में से 1 वोटर का कहना है कि बेरोजगारी देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बनी हुई है.

MOTN सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी के अलावा गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को लेकर बढ़ता असंतोष भी सरकार के लिए समस्या वाली बात है.  

प्रतिभागियों में से करीब एक चौथाई यानी 24 फीसदी ही जनवरी में हुए सर्वे में जीएसटी को कठोर बता रहे थे. ताजा सर्वे में ये आंकड़ा बढ़ कर 40 फीसदी हो गया है.

एऩडीए सरकार का दावा ‘सबका साथ, सबका विकास’ भी अब वोटरों के लिए लुभाने वाला नहीं रह गया है. स्टडी के मुताबिक प्रतिभागियों में सिर्फ 30 फीसदी ही सरकार के इस दावे से सहमत दिखाई दिए कि विकास का लाभ सभी वर्गों को मिला है.  

गैर NDA , गैर UPA  पार्टियों को लाभ

एनडीए को लेकर किसानों और व्यापारियों में अलोकप्रियता बढ़ने का लाभ यूपीए को ना मिलकर क्षेत्रीय दलों को मिलता दिख रहा है.

एनडीए का वोट शेयर किसानों में जनवरी की तुलना में तीन फीसदी गिरा है. जनवरी में ये 40 फीसदी था जो अब गिरकर 37 फीसदी पर आ गया है. यूपीए को छोड़कर अन्य राजनीतिक दलों ने इसी दौरान अपना समर्थन आधार 23 से 28%  यानी 5 फीसदी बढ़ाया है.

कांग्रेस की स्थिति जनवरी से जस की तस

बीजेपी की लोकप्रियता गिरने का जैसा लाभ मई 2017 से जनवरी 2018 के बीच कांग्रेस को मिला था, पिछले पांच महीने में उसमें ग्रैंड ओल्ड पार्टी कुछ तब्दीली नहीं ला सकी. हर चार में से एक वोटर यानी 25 फीसदी जनवरी में कांग्रेस के समर्थन में खड़े थे. पांच महीने बाद भी ये समर्थन आधार जस का तस है.

हालांकि कांग्रेस के सहयोगियों ने जनवरी की तुलना में समर्थन आधार कुछ बढ़ाया है. पांच महीने पहले ये आधार 5 फीसदी था जो अब बढ़ कर 6 फीसदी हो गया है.

इसका मतलब है कि अगर आज देश में चुनाव कराया जाए तो कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए 31 फीसदी वोट हासिल करेगा. सर्वे के मुताबिक अन्य पार्टियां जिनका समर्थन बीते 5 महीने में बढ़ा है, उनमें बीएसपी और यूपी में उसकी जोड़ीदार समाजवादी पार्टी शामिल हैं.

दोनों पार्टियों के समर्थन आधार में पिछले पांच महीने की तुलना में एक-एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. आज जिस तरह की स्थिति है और तत्काल चुनाव कराए जाएं तो उसमें गैर एनडीए और गैर यूपीए पार्टियां 32 फीसदी वोट शेयर लेती दिख रही हैं.

फिलहाल मोदी सरकार विरोधी वोट विभिन्न विपक्षी पार्टियों में बंटता दिख रहा है. इनमें से सिर्फ आधा हिस्सा ही कांग्रेस की अगुआई वाले एनडीए को मिलता दिख रहा है. वहीं बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए को सरकार समर्थक वोटों का तीन चौथाई हिस्सा मिलता दिख रहा है.

सरकार को लेकर बढ़ रहा है असंतोष

MOTN सर्वे के मुताबिक बीजेपी के लिए खराब बात ये है कि मोदी सरकार के समग्र प्रदर्शन को लेकर देश में अंसतोष बढ़ रहा है. मई 2017 में जहां ये 27 फीसदी के स्तर पर था वो  जनवरी में बढ़ कर 40 फीसदी और अब 47 फीसदी पर आ गया है. यानी एक साल में ही असंतोष का स्तर 20 फीसदी बढ़ गया है.

वहीं सरकार के कामकाज को लेकर समग्र संतोष भी पिछले साल के 64 फीसदी की जगह अब घटकर 47 फीसदी पर आ गया है.

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