सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समाज की बच्चियों के खतना करने पर उठाए ये महत्वपूर्ण सवाल

नई दिल्ली, खबरस्पेशल न्यूज़, अजित सिंह, 10-जुलाई’2018: दर्द के उस मंजर को उस इंसान से ज्यादा कौन जान सकता है जिसे वो दर्द दिया जा रहा हो. जी हाँ काफी लंबे समय से कुछ ऐसा ही मुस्लिम समाज की लड़कियों के साथ होता आरहा है. जिसपर सरकार ने अब आकर अपनी आँखे खोली हैं.सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समाज की बच्चियों के खतना करने पर उठाए ये महत्वपूर्ण सवाल

दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में नाबालिग बच्चियों के जननांग के खतने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि इससे बच्ची के शरीर की संपूर्णता का उल्लंघन होता है. जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बताया कि इस प्रथा से मासूम बच्चियों को अपूरणीय क्षति पहुंचती है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है और इस पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और 27 अफ्रीकी देशों में इस प्रथा पर रोक है। पीठ में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी शामिल हैं.

मुस्लिम समूह के वकील एएम सिंघवी ने पीठ से कहा कि इस मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाना चाहिए क्योंकि यह एक धर्म की जरूरी प्रथा का मामला है जिसकी समीक्षा की आवश्यकता है। इस पर पीठ ने पूछा कि किसी अन्य के जननांगों पर किसी और का नियंत्रण क्यों होना चाहिए?

सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार के रुख को दोहराते हुए कहा कि इस प्रथा से बच्ची के कई मौलिक अधिकारों को उल्लंघन होता है। इससे भी अधिक खतने का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है. वहीं सिंघवी ने दलील दी कि इस्लाम में पुरुषों का खतना सभी देशों में मान्य है और यह स्वीकार्य धार्मिक प्रथा। इसके साथ ही उन्होंने मामले के स्थगन की मांग की.

पीठ ने वकील सुनीता तिवारी द्वारा दाखिल जनहित याचिका स्वीकार कर ली और इस पर अब 16 जुलाई को सुनवाई होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में नाबालिग लड़कियों के खतने की प्रथा को चुनौती देने वाली पीआईएल में केरल और तेलंगाना को वादी बनाने का आदेश दिया था। इन राज्यों के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और केंद्र शासित दिल्ली पहले से वादी हैं.

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