सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से लोगों की सेहत को लेकर पूछे ये सवाल…

नई दिल्ली। थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाले उत्सर्जन मानकों की समय सीमा बढ़ाकर वर्ष 2022 करने पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र और बिजली मंत्रालय को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने पूछा, क्या सरकार के लिए लोगों का स्वास्थ्य अप्रासंगिक हो गया है? पीठ ने पूरी स्थिति को निराशाजनक बताते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोगों की उत्सर्जन मानकों को लागू करने में कतई दिलचस्पी नहीं है।

यही वजह है कि आम लोग वायु प्रदूषण के चलते बीमार हो रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी। पीठ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के वायु प्रदूषण से जुड़े मामले के संबंध में सुनवाई कर रही थी। बिजली मंत्रलय के हलफनामे का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि इसे देखकर साफ लगता है कि उसका थर्मल पावर प्लांटों से होने वाले प्रदूषण को कम करने का कोई इरादा नहीं है और वर्ष 2022 तक भी यह काम नहीं हो सकेगा। पीठ ने जलवायु परिवर्तन मंत्रलय की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएनएस नाडकर्णी से इस संबंध में इससे जुड़े अधिकारियों की एक बैठक बुलाने और इस संबंध में कोर्ट में एक हलफनामा दायर करने को कहा है।

सुनवाई के दौरान न्याय मित्र की भूमिका निभा रही अपराजिता सिंह ने कहा कि पूरे देश में 650 थर्मल पावर प्लांट हैं। इनमें से 82 या तो अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं या फिर अगले साल तक कर लेंगे। हालांकि इनसे निकलने वाले उत्सर्जन मानकों को कम करने में मंत्रलय कतई गंभीर नहीं है।

वहीं, न्याय मित्र ने कहा कि यही वजह है कि उसने उत्सर्जन मानकों की समय सीमा दिसंबर 2017 से बढ़ाकर 2022 कर दी है। वे इसे 2030 तक नहीं कर सकेंगे। इस पर मंत्रालय के वकील ने कहा, वे इस पर उठाए गए कदमों के संबंध में एक विस्तृत हलफनामा कोर्ट में दायर करेंगे।

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