अस्थि कलश यात्रा का कुछ ऐसा रहा नज़ारा

लखनऊ। ‘धरती को बौनों की नहीं, ऊंचे कद के इंसानों की जरूरत है। इतने ऊंचे कि आसमान छू लें, नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें।’ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यह कविता गुरुवार को उन पर ही सटीक हुई। दल, झंडा व धर्म की सीमाओं को लांघकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। झूलेलाल पार्क में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में राजनेताओं की आंखें नम थी। अटल को लेकर सबकी अपनी कहानी थी जो निसंदेह उन्हें दल और धर्म की सीमाओं से आगे ले रही थी।

गुरुवार दोपहर दिल्ली से वाजपेयी का अस्थि कलश लेकर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय और संचार मंत्री मनोज सिन्हा चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डे पर पहुंचे तो राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व डॉ. दिनेश शर्मा, विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित, केंद्रीय मंत्री शिवप्रताप शुक्ल व कृष्णा राज, पूर्व मंत्री कलराज मिश्र और भाजपा कार्यकर्ताओं का बड़ा हुजूम अपनी भावांजलि अर्पित करने को कतारबद्ध था।

यह अद्भुत संयोग था कि जिनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए लखनऊ उमड़ पड़ा था, उनके लिए प्रकृति भी आंसू बहा रही थी। अटाटूट बरसते बादलों की ओर निहारते लोग यह चर्चा भी कर रहे थे। एयरपोर्ट से भाजपा मुख्यालय तक पहुंचने में करीब तीन घंटे लगे। इसके बाद झूलेलाल पार्क तक की दूरी में रास्ते भर भावनाएं उमड़ती रहीं। लंबे समय बाद किसी राजनेता के लिए दलों का बंधन टूट गया। भाजपा मुख्यालय पर अटल बिहारी अमर रहें नारे, की गूंज में अटल का करिश्मा बयां हो रहा था। 

भारी था एक-एक पल 

झूलेलाल पार्क में भीड़ के लिए जैसे एक-एक पल भारी था। अस्थि कलश यात्रा पर जगह-जगह पुष्प वर्षा हो रही थी। अटल की आमजन से सीधे रिश्ते की यह बड़ी बानगी थी। नेताओं के चाहने के बावजूद यात्रा की गति तेज नहीं हो पा रही थी। भीड़ अस्थि कलश पर पुष्प वर्षा कर अटल से खुद को जोडऩे का मौका चूकना नहीं चाहती थी। यह सामान्य बात नहीं थी। पार्क में अस्थि कलश का इंतजार करने वाली भीड़ के बीच कई खास चेहरे भी थे। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव काफी पहले पहुंच गये थे। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर, कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रमोद तिवारी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रोफेसर रमेश दीक्षित भी इंतजार कर रहे थे। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई और बौद्ध धर्म के गुरुओं के दिलों में अटल के प्रति भावनाओं की लहर उमड़ रही थी। अस्थि कलश सभा स्थल तक पहुंचा तो अटल बिहारी अमर रहें का नारा फिर गूंजा। 

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं 

भव्य मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता अंकित थी ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं।’ गृहमंत्री राजनाथ सिंह आये तो अति भावुकता में इसी कविता को दोहराते हुए बोले ‘अटल जी प्रधानमंत्री नहीं बनते तो भी इतने ही लोकप्रिय होते।’ राजनाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और चंद्रशेखर की याद दिलाई जो अटल को हमेशा गुरुदेव कहते थे। संचालन कर रहे भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष जेपीएस राठौर ने जब राज्यपाल राम नाईक को श्रद्धासुमन अर्पित करने को बुलाया तो वह स्मृतियों में खो गए। नाईक ने अटल को महानायक कहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा ‘अटल जी का निधन आजादी के बाद के युग का अवसान है।’

उन्होंने उप्र की 22 करोड़ जनता की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित की। अटल के बाद लखनऊ में उनकी विरासत संभालने वाले बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन का गला रुंध गया। वह 14 वर्ष की उम्र से ही अटल के संपर्क में थे। मुलायम ने अटल से अपने संबंधों का जिक्र किया। व्यक्तिगत संबंधों की बुनियाद पर मुलायम एक नजीर पेश कर रहे थे। वह मंच से उतरे तो अटल जी की दत्तक पुत्री नमिता और परिवारीजन से कुशलक्षेम पूछना भी नहीं भूले। विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित हों या पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र, क्षेत्रीय प्रचारक अनिल सभी ने अटल को श्रद्धांजलि दी। 

शिया धर्म गुरु कल्बे जवाद और सुन्नी धर्म गुरु मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने वाजपेयी से जुड़ी स्मृतियां सुनाई। दोनों के पिता से अटल के गहरे रिश्ते थे। जूना अखाड़ा परिषद के स्वामी यतीन्द्रानंद हो, फादर राकेश चत्री हों या बौद्ध धर्म गुरु, सभी की यादों में अटल जी का कद ऊंचा था। बारी अटल जी के अनन्य सहयोगी शिवकुमार की आयी तो 50 वर्षों के सबंधों को साझा करते समय वह किसी तरह खुद को संभाल पाये। बोले ‘मेरी इच्छा थी कि मेरे प्राण उनसे पहले निकले।’ केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा के बाद प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा अटल जी की न सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व में स्वीकार्यता रही है। इसके बाद गोमती नदी में अटल जी की अस्थियां विसर्जित की गईं।

 अब विलंब केहि कारण कीजै

राजनाथ सिंह ने कई संस्मरण सुनाए। बोले, बात उन दिनों की है जब वह उप्र के मुख्यमंत्री थे। लखनऊ में ही एक इंटर कालेज के प्रबंधक ने मान्यता संबंधी किसी कार्य की सिफारिश अटल जी से करवायी और अटल जी ने तत्काल मुझे पत्र लिखा  दिया। मैंने तुरंत आदेश भी कर दिया लेकिन, आदेश जारी होने में विलंब हो गया। अगले दौरे में प्रबंधक फिर अटल जी के पास पहुंचे। कहा, मुख्यमंत्री को फिर पत्र लिख दीजिए। पहले तो अटल जी तैयार नहीं हुए लेकिन, जिद करने पर आवेदन पर ही लिख दिया ‘अब विलंब केहि कारन कीजै, तुरंत प्रभु आशीष दीजै।

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