कुछ ऐसा करना पड़ता है हज पर जाने वालों को वहाँ जाकर

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इस्लाम मानने वालों के लिए हज पर जाना जीवन में बड़ी खुशी की बात होती है. हर मुसलमान जीवन में एक बार हज जरूर जाना चाहता है. इस बार हज की शुरुआत 19 अगस्त से हो रही है. यह तीर्थयात्रा 24 अगस्त तक चलेगी. हम बता रहे हैं, हज जाने के बाद तीर्थयात्रियों (जिन्हें हाजी या हाजरीन कहते हैं) को वहां क्या-क्या करना होता है? दरअसल इस्लामी तारीख 10 जिल्हज को दुनिया के कोने-कोने से लोग सऊदी अरब के मक्का पहुंचते हैं. मक्का जाने वाले जेद्दा एयरपोर्ट पर उतरते हैं. मक्का में इस्लाम न मानने वालों का प्रवेश वर्जित है. उनके पहुंचने के बाद से वे इन प्रक्रियाओं के जरिए अपनी हज यात्रा पूरी करते हैं. यह सारी ही प्रक्रियाएं पैगंबर अब्राहम ने जो-जो किया था, उनका दोहराव होती हैं –कुछ ऐसा करना पड़ता है हज पर जाने वालों को वहाँ जाकर

इहराम

इसका मतलब होता है कि श्रद्धालु खास तरह के कपड़े पहनते हैं. पुरुष दो टुकड़ों वाला बिना सिलाई का एक सफेद चोगा पहनते हैं. महिलाएं भी ऐसा सफेद कपड़ा पहनती हैं, जिसमें सिलाई नहीं होती और उससे केवल उनके हाथ और चेहरा दिखता है. इस दौरान श्रृद्धालुओं को सेक्स, लड़ाई-झगड़े, इत्र और बाल-नाखून काटने से परहेज करना होता है.

तवाफ

मक्का पहुंचकर श्रृद्धालु हरम शरीफ (मुख्य मस्जिद) तवाफ करते हैं. माने काबे का सात बार घड़ी की विपरीत दिशा में चक्कर लगाते हैं.

सई

हाजी मस्जिद के दो पहाड़ों के बीच सात बार दौड़ लगाते हैं. इसे ही सई कहते हैं. यह पैगंबर इब्राहिम की पत्नी हाजरा की पानी की तलाश के लिए की गई दौड़भाग की याद में होती है.

अब तक उमरा

अब तक जो हुआ वह हज नहीं है. इसे उमरा कहते हैं. हज की मुख्य रस्में इसके बाद शुरू होती हैं. इसकी शुरुआत तब होती है, जब हाजी मुख्य मस्जिद से पांच किलोमीटर मी दूर मीना पहुंचते हैं.

जबल उर रहमा

अगले दिन लोग जबल उर रहमा नाम की पहाड़ी के पास जमा होते हैं. मीना से 10 किमी दूर अराफात की पहाड़ी के आस-पास जमा ये लोग नमाज अता करते हैं.

मुजदलफा

सूरज छिपने के बाद हाजी अराफात और मीना के बीच स्थित मुजदलफा जाते हैं. वहां वे आधी रात तक रहते हैं. वहीं वे शैतान को मारने के लिए पत्थर जमा करते हैं.

फिर ईद

अगले दिन ईद उल अजहा (बकरीद) मनाई जाती है. जब हाजी मीना लौटते हैं. वहां वे रोजाना के तीन बार शैतान को पत्थर मारने की रस्म निभाते हैं. आमतौर पर सात पत्थर मारने होते हैं.

पहली बार पत्थर मारना

पहली बार पत्थर मारने के बाद बकरे हलाल किए जाते हैं और जरूरतमंद लोगों के बीच मांस बांटा जाता है. बकरे या किसी दूसरे मवेशी की कुर्बानी को अल्लाह की खातिर इब्राहम के अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी का प्रतीक माना जाता है.

सफाई

अब हाजी बाल कटवाते हैं. पुरुष पूरी तरह से गंजे हो जाते हैं, जबकि महिलाएं एक अंगुल तक बाल कटवाती हैं. यहां से वे अपने सामान्य कपड़े पहन सकते हैं.

फिर से तवाफ

हाजी दोबारा मक्का की मुख्य मस्जिद में लौटते हैं और काबा के सात चक्कर लगाते हैं.

पत्थर मारना (रमीजमारात)

हाजी दोबारा मीना जाते हैं और अगले दो-तीन दिन तक पत्थर मारने की रस्म अदायगी होती है.

और फिर काबा

एक बार फिर लोग काबा जाते हैं और उसके सात चक्कर लगाते हैं. इसके साथ ही हज पूरा हो जाता है.

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