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कुछ इस तरह सिद्धू बना सकते हैं सुखपाल खैहरा के लिए नया रास्ता

चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी द्वारा विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष के पद से हटाए जाने के बाद सुखपाल खैहरा का अगला कदम क्या होगा, फिलहाल अभी इसका पता नहीं चल पाया है और इसको लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले नवजोत सिंह सिद्धू अब खैहरा की घर वापसी (कांग्रेस में शामिल होने) का रास्ता बना सकते हैं। खैहरा के सामने दूसरा विकल्प लोक इंसाफ पार्टी के रूप में है। बैंस ब्रदर्स उनको साथ लेकर अपनी पार्टी को मतबूत करना चाहते हैं।कुछ इस तरह सिद्धू बना सकते हैं सुखपाल खैहरा के लिए नया रास्ता

सिद्धू करवा सकते हैैं खैहरा की कांग्रेस में घर वापसी

विधानसभा चुनाव से पहले आप में शामिल होने को लेकर सिद्धू व केजरीवाल में बातचीत होती रही थी, लेकिन केजरीवाल को सिद्धू पसंद नहीं आए। इसके सिद्धू को कांग्रेस का दामन थामना पड़ा था। सिद्धू भी कांग्रेस में अपना वजूद बना रहे हैं और राहुल गांधी के सहारे अपना सियासी भविष्य संवारने की कोशिश में हैं। लेकिन, कैप्टन  अमरिंदर सिंह के सीधे निशाने पर होने के कारण वह अपनी ही सरकार में अकेले से पड़े हैं। इसलिए सिद्धू इस मौके का दोहरा लाभ ले सकते हैं।  राहुल गांधी भी खैहरा के नाम से परिचित हैं क्योंकि कैप्टन के करीबी राणा की मंत्री पद से छुट्टी करने को लेकर खैहरा ने राहुल को पत्र लिखा था। उसके बाद ही राणा ने इस्तीफा दिया था।

बैंस ब्रदर्स खैहरा को साथ लेकर अपनी पार्टी को मजबूत करने की कर सकते हैैं कोशिश

बैंस बद्रर्स बलविंदर सिंह बैंस और सिमरजीत सिंह बैंस के साथ चूूंकि खैहरा के शुरू से मधुर रिश्ते रहे हैं इसलिए बैंस ब्रदर्स खैहरा को अपने साथ लेकर पंजाब में पार्टी को और मजबूत बनाने की कोशिश भी कर सकते हैैं। दोनों लगभग एक ही मुद्दों पर कांग्रेस व अकाली दल का विरोध करते आए हैं। अलबत्ता विधानसभा के अंदर से लेकर बाहर तक हमेशा ही बैंस खुलकर खैहरा का समर्थन करते आए हैं।

यूथ एंड थ्रो की राजनीति कर रही है आप : छोटेपुर

आम आदमी पार्टी के पूर्व कनवीनर व पंजाब में पार्टी को खड़ा करने वाले सुच्चा सिंह छोटेपुर का कहना है कि आप पंजाब में पैर जमाने के लिए पंजाबी नेताओं का इस्तेमाल कर रही है और अपना मकसद पूरा करके उन्हें किनारे कर देती है। पार्टी की यह रणनीति सही नहीं हैं। पहले भी पार्टी ने कई नेताओं के साथ ऐसा ही किया है।

मैं पार्टी के फैसले के साथ : बलवीर

आप के प्रदेश सह प्रधान डाॅ. बलबीर सिंह ने कहा है कि वह खैहरा के हटाने के पार्टी के फैसले के साथ हैं। चीमा को पार्टी ने सभी विधायकों की राय लेने के बाद ही नेता प्रतिपक्ष बनाया है। उन्होंने खैहरा के साथ हाल ही में हुए विवाद को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। वह बोले, पहले भी उन्होंने यही कहा था कि अगर किसी मामले में किसी को कोई शिकायत है तो वह पार्टी फोरम पर अपनी बात रखे, न कि मीडिया में।

आप यूज करके खत्म कर रही पंजाबी नेताओं को: धर्मवीर गांधी

आप से निलंबित सांसद डाॅ. धर्मवीर गांधी का कहना है कि खैहरा को हटाना घटियापन है। उन्होंने कहा कि खैहरा की भी गलती है कि वह दो नाव पर पैर रखकर चल रहे थे। उन्हें पहले ही पार्टी छोड़ देनी चाहिए थी, क्योंकि एक न एक दिन यह होना ही था। पार्टी पंजाब के नेताओं को पंजाब के फैसले नहीं लेने देना चाहती है। इसी वजह से विधानसभा चुनाव हारी और अब लोकसभा चुनाव दिल्ली की रणनीति पर लड़ा जाएगा। पार्टी यूज एंड थ्रो की राजनीति भी नहीं कर रही है बल्कि यूज एंड ड्रिस्ट्राय की राजनीति कर रही है।

इन मुद्दों को लेकर खैहरा राज्‍य की सियासत को गरमाते रहे

-खैहरा ने अवैध रेत खनन के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा। कैबिनेट मंत्री राणा गुरजीत सिंह को इस्तीफा देना पड़ा।

-नशा तस्कर की मदद करने के मामले में खैहरा को कांग्रेस ने कठघऱे में खड़ा किया था।

-नशा तस्करों की मदद के मामले में अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया को लगातार खैहरा कठघरे में खड़ा करते आ रहे हैं।

-अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल के खिलाफ खैहरा ने ट्रांसपोर्ट माफिया, केबल माफिया को लेकर मोर्चा खोला।

-पंजाब में आप को स्वतंत्र फैसले लेने के अधिकार देने का मुद्दा पार्टी में खैहरा ने उठाया था।

-पंजाब आप में दिल्ली की दखलंदाजी बंद करने का मुद्दा उठाया था।

-अरविंद केजरीवाल का खुलकर मजीठिया से माफी मांगने के मामले को लेकर विरोध किया था।

केजरीवाल का विरोध करने की मिली सजा

नशे के मामले में अरविंद केजरीवाल ने अकाली नेता बिक्रम मजीठिया पर विधानसभा चुनाव से पहले तमाम आरोप लगाए थे। तीन महीने पहले उन्होंने मजीठिया से माफी मांग ली थी। इसके बाद खैहरा, सांसद भगवंत मान व अमन अरोड़ा ने खुलकर केजरीवाल के फैसले का विरोध किया था। मान ने पंजाब प्रधान व अरोड़ा ने उप प्रधान पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय पंजाब में संगठन विस्तार की कमान अरोड़ा के हाथों में थी।

खैहरा को हटाने के बाद भी पार्टी के पास अरोड़ा के रूप में मजबूत विकल्प था, लेकिन केजरीवाल के फैसले का विरोध करने की सजा उन्हें भी मिली और नेता प्रतिपक्ष के पद पर उनके नाम पर विचार करने के बाद भी पार्टी ने सहमति नहीं दी। प्रोफेसर बलजिंदर कौर व कुलतार सिंह संधवा तथा कंवर संधू जैसे चेहरों को भी पार्टी ने इसलिए तवज्जो नहीं दी क्योंकि पार्टी नेता प्रतिपक्ष के पद पर उसी को बैठाना चाहती है जो दिल्ली के इशारों पर चले।

कंवर संधू ने पार्टी का घोषणा पत्र तैयार करवाया था, जिसके दम पर पार्टी पंजाब में विधानसभा चुनाव की रेस में आई थी और एक बारगी सत्ता में भी आने के सपने देखने लगी थी। इसके बाद भी संधू को खैहरा से नजदीकी रिश्तों के चलते पार्टी ने इस पद बैठाना मुनासिब नहीं समझा।

कांग्रेस की राह हुई और आसान

विधानसभा के अंदर से लेकर बाहर तक खैहरा को नेता प्रतिपक्ष पद से हटाए जाने के बाद कांग्रेस की राह  आसान हो गई है। सत्ता में आने के बाद नेता प्रतिपक्ष पद पर रहे एडवोकेट एचएस फूलका को ज्यादा अनुभव न होने का लाभ कांग्रेस को सदन में मिला था। पहला सत्र आसानी के साथ कांग्रेस ने कूटनीति करके विपक्ष को आपस में उलझा कर निकाल लिया था।

उसके बाद खैहरा नेता प्रतिपक्ष बने तो नशे के मुद्दे पर घिर गए। नतीजतन सदन में खैहरा की आवाज ज्यादा नहीं गूंजने पाई। अब चीमा इस पद हैं और विधानसभा का सत्र बुलाने की तैयारियां की जा रही हैं। नतीजतन आगामी विधानसभा के सत्र में विपक्ष के हमलों को लेकर कांग्रेस की अभी से चिंता दूर हो गई है, क्योंकि चीमा भी पहली बार इस पद पर आए हैं और आप की गुटबाजी का लाभ भी कांग्रेस मिलेगा।

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