मुर्गे पर पुलिसवाले और ग्रामीण में छिड़ी जंग, जानें क्‍यों?

पुलिस की छवि आम जनमानस में नकारात्मक होने के बावजूद लोग उसे अपना रक्षक मानते हैं। नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सिविक एक्शन कार्यक्रमों से लेकर जन समस्या निवारण शिविर तक में पुलिस व प्रशासन के आला अधिकारी चीखचीखकर ग्रामीणों से कहते हैं कि वे उनके रक्षक व अधिकारों के संरक्षक हैं।

मुर्गे पर पुलिसवाले और ग्रामीण में छिड़ी जंग, जानें क्‍यों?

जनता भी चोर-उचक्कों से अपनी हिफाजत के लिए पुलिस पर भरोसा करती है लेकिन जब पुलिस की वर्दी पहने लोग ही उसके माल असबाब को अपना समझकर उड़ाने लग जाएं तो वह कहां जाए? गुरूवार को होली के एक दिन पहले बकावंड ब्लाक के जिस गरीब ग्रामीण के साथ यह वाक्या हुआ वह सिस्टम पर कैसे भरोसा करेगा, यह यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब पुलिस अधिकारी इस मामले की जांच व कार्रवाई कर दे सकते हैं।

 

जानकारी के अनुसार संभाग मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर बकावंड ब्लॉक के एक गांव से एक ग्रामीण अपनी साइकिल के कैरियल पर मुर्गे-मुर्गियां बांधकर संजय बाजार बेचने आ रहा था। इंद्रावती नदी के पुराने पुल के पास एक पुलिस जवान ने उसे पकड़ लिया। उसकी खता यह थी कि उसने मुर्गों-मुर्गियों को कैरियल पर उल्टा लटकाया था। इस अपराध में गरीब ग्रामीण को सिटी कोतवाली लाया गया।

इसके बाद उसके कैरियल से बंधे 35 मुर्गे-मुर्गियां पुलिस वाले एक-एक कर निकाल ले गए। कोई एक तो कोई दो ले गया। उसने एक अधिकारी से इस बात की शिकायत भी की लेकिन अधिकारी ने उसके लूटे मुर्गें-मुर्गियों को वापस दिलाने में असमर्थता जता दी। थोड़ी देर बाद उसे छोड़ दिया गया।

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बाजार सूत्रों के अनुसार जो मुर्गे-मुर्गियां ले जाए गए उनका वजन डेढ़ से दो किलो था। बाजार में चिकन का रेट 300 से 350 रुपए है। ऐसे में गरीब ग्रामीण के करीब 15 हजार रुपए मुर्गों के तौर पर पुलिस वालों ने डकार लिए और उसे फूटी कौड़ी भी नहीं मिली।  ग्रामीण ने अपनी आप-बीती सुनाई है। खबर में उसकी व उसके गांव की पहचान उजागर नहीं की गई है।

ग्रामीण के मुताबिक वह रविवार बाजार के दिन जब भी मुर्गे लेकर आता है, उसके साथ ऐसा होता है। उसने बताया कि पिछले एक माह में यह पांचवीं घटना है। इससे पहले कभी एक तो कभी दो मुर्गे पुलिस वाले ले लेते थे। पिछली बार मुर्गों की जगह उससे एक हजार रुपए की वसूली की गई थी। संभाग मुख्यालय के सिटी कोतवाली परिसर में गुरूवार को सुबह हुई इस घटना ने पुलिस वालों की होली तो मुफ्त के मुर्गों से दुरूस्त कर दी लेकिन बेचारे ग्रामीण की होली बदरंग हो गई।

इनका कहना है

इस प्रकार की घटना थाने में होना संभव नहीं है। यदि किसी पुलिसकर्मी ने ऐसा किया है तो ग्रामीण की शिनाख्त पर उसके विरूद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी। ऐसी शिकायत अभी नहीं मिली है।

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