अति पिछड़ों और अति दलितों के अारक्षण से बदलेगी सूबे की सियासी तस्वीर

लखनऊ! अब से 17 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के फैसले को एक बार फिर अमल में लाने की योगी सरकार की मंशा न सिर्फ आरक्षण की तस्वीर बदलेगी बल्कि प्रदेश की सियासत पर भी इसके गहरे असर नजर आएंगे। सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो इसका लाभ उन जातियों को विशेष रूप से हासिल होगा जिन्हें ‘प्रजा जातियों के रूप में देखा जाता रहा है। इसके साथ ही पिछड़ों की उपेक्षित जातियां भी हाशिये से ऊपर आ सकेंगी।

पिछड़ों में अति पिछड़े और दलितों में अति दलित आरक्षण की वर्तमान प्रणाली से हमेशा नाखुश रहे हैं और इसके लिए वह लंबे समय से आंदोलन भी चला रहे हैं। पिछड़ों की 70 ऐसी जातियां हैं जो आरक्षित होते हुए भी इसका लाभ नहीं उठा पा रही थीं। आरक्षण का मुख्य लाभ यादव, कुर्मी आदि जातियां अधिक हासिल रही थीं। इसी तरह दलितों में जाटव को ही इनका अधिक लाभ हासिल हो रहा था।

दलितों में 65 ऐसी जातियां हैं जो आरक्षण का लाभ पूरी तरह नहीं ले पा रही थीं। सरकार के फैसले से इनके हित संरक्षित किए जा सकेंगे और आरक्षण में उनकी भागीदारी तय हो जाएगी। 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा गठित सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट में इन जातियों को दलितों और आरक्षण के कोटे में ही अलग वर्ग में रखने की सिफारिश की गई थी। हालांकि उस समय इस फैसले को अमल में नहीं लाया जा सका था।

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दलितों को दो श्रेणियों में बांटने की थी सिफारिश

राजनाथ सिंह के शासनकाल में हुकुम सिंह की अध्यक्षता में गठित सामाजिक न्याय समिति ने आरक्षण के लिए दलितों को दो श्रेणी में बांटने की सिफारिश की थी। इसमें दलितों को दो श्रेणी में बांटा गया था। ए श्रेणी में जाटव और धूसिया रखे जाने थे जिनके लिए दस फीसद आरक्षण की बात कही गई थी। जबकि बी श्रेणी में 65 अन्य दलित जातियां थीं जिनके लिए 11 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई थी।

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पिछड़ों को बांटा था तीन श्रेणियों मे

इसी क्रम में सामाजिक न्याय समिति ने पिछड़ों को तीन श्रेणियों में बांटने की सिफारिश की थी। ए में यादव और अहीर थे जिनके लिए पांच प्रतिशत आरक्षण, बी में जाट, कुर्मी लोध व गूजर जैसी आठ जातियां के लिए नौ प्रतिशत आरक्षण और सी में 22 मुस्लिम पिछड़ी जातियों को मिलाते हुए लगभग 70 अति पिछड़ी जातियों के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण के लिए कहा गया था।

50 से अधिक जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित

2001 में सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि अनुसूचित जाति की 50 से अधिक जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। इसके लिए 60 विभागों के 12 लाख स्वीकृत पदों के सापेक्ष 10 लाख कर्मचारियों व अधिकरियों का आकलन किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार इसमें अनुसूचित जातियों के 21.89 प्रतिशत और पिछड़ी जातियों के 26.98 प्रतिशत पद भरे गए थे। अनुसूचित वर्ग में 66 जातियां हैं पर नौ जातियों को ही सरकारी नौकरियों में अधिकतम हिस्सेदारी मिली थी।

जिसमें जाटव, खटीक, धोबी, वाल्मीकि व धुसिया ज्यादा थे। कोरी, गोंड, पासी -तरमाली व कोल आदि की हिस्सेदारी कम थी। इसी तरह पिछड़े वर्ग की आरक्षण सूची में दर्ज 79 जातियों में से 11 को ही आरक्षण का अधिक लाभ मिला है। अपनी आबादी के अनुपात में यादव, जाट, अहीर, यदुवंशीय, ग्वाला, कुर्मी, मौर्य, पटेल, सैंथवार, मल्ल व शाक्य को अधिक लाभ मिला था। 68 अन्य जातियों को अपेक्षित आरक्षण न मिल सका।

अखिलेश ने दिया था 17 जातियों को एससी का दर्जा

अति पिछड़ी जातियों को लेकर सियासत की श्रृंखला में ही 17 जातियों का मामला भी है। निषाद, मल्लाह, केवट, मछुआ, मांझी, धीवर, धीमर, रायकवार, कहार, कश्यप, चाई, तीयर, गोडिय़ा, बाथम, कुम्हार, प्रजापति, राजभर जातियां अपने को अनुसूचित जाति में शामिल करने की लड़ाई लंबे समय से लड़ रही हैं। मुलायम सरकार ने केंद्र को इसके लिए पत्र भी लिखा था। अखिलेश यादव के शासनकाल में भी ऐसा ही पत्र भेजा गया था। बाद में अखिलेश सरकार ने इन जातियों को एससी की तरह सुविधाएं देने का फैसला किया। हालांकि हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी।

हम लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि पिछड़ों के आरक्षण को तीन वर्गों में बांटा जाए, पिछड़ा, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा। योगी सरकार क्या फैसला करती है, यह देखने की बात होगी। सरकार के निर्णय के बाद उसका अध्ययन कर ही आगे की रणनीति तय की जाएगी।

देश में प्रजा जातियों की स्थिति कभी भी अच्छी नहीं रही है। इसके लिए हमेशा आवाज उठाई जाती रही है। अब सरकार इस दिशा में सोच रही है, तो यह एक अच्छा कदम होगा। अति दलितों के लिए निश्चित आरक्षण का प्रावधान होना ही चाहिए।

योगी सरकार यदि अति पिछड़ों और दलितों के आरक्षण का निर्णय लेती है तो विधिक अड़चनें इसमें शायद ही आड़े आएं। इससे पहले बिहार में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों और अति पिछड़ों का वर्गीकरण किया था। बाद में इंद्री साहनी केस में नौ जजों की संविधान पीठ ने भी इसे तर्क संगत ठहराया था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ एएन त्रिपाठी कहते हैं कि इंद्रा साहनी केस में संविधान पीठ ने इस पर भी विचार किया था। पीठ ने कहा था कि बैकवर्ड में मोर बैकवर्ड की कैटेगरी भी बनाई जा सकती है लेकिन इसमें से क्रीमीलेयर को निकाल दिया जाए। पीठ का मानना था कि दोनों का आरक्षण प्रतिशत तय कर दिया जाए ताकि उनके हक सुरक्षित रहें। त्रिपाठी के अनुसार एससी के आरक्षण में क्रीमीलेयर का मामला अभी संविधान पीठ में विचाराधीन है।

एक तीर से सधेंगे कई और निशाने

अति दलितों और अति पिछड़ों को आरक्षण का मसला उठाकर योगी सरकार ने यह संकेत भी दे दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा की प्रस्तावित किलेबंदी की दरार उसने खोज ली है। इसका असर महागठबंधन के प्रयासों पर भी नजर आएगा। योगी सरकार ने इस पहल के जरिए एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। इसका असर जहां समाजवादी पार्टी पर दिखाई देगा, वहीं बसपा भी प्रभावित हुए बिना न रह सकेगी। समाजवादी पार्टी के बेस वोट बैैंक पिछड़े मतदाता हैैं।

इनमें 19.40 फीसद यादव हैैं और अन्य में 78 जातियां हैैं। अति पिछड़ों का आरक्षण कार्ड यादव समेत कुछ मजबूत जातियों को छोड़कर अन्य पर गहरा असर डाल सकता है। यही स्थिति बहुजन समाज पार्टी की भी है जिसका बेस वोट बैैंक दलित रहे हैैं। इनमें 55 फीसद जाटव हैैं जबकि शेष में अन्य दलित जातियां हैैं। दलितों में आरक्षण का कार्ड अन्य दलितों पर डोरे डालने में सहायक साबित हो सकता है।

गौरतलब है कि गोरखपुर और फूलपुर संसदीय क्षेत्र में हुए उप चुनाव के बाद से ही 2019 के लोकसभा चुनाव को केंद्र में रखकर सपा-बसपा के साथ अन्य दलों का महागठबंधन खड़ा करने की कोशिशें तेज हुई हैैं। सपा ने अपने साथ निषाद जैसी कई अन्य जातीय मतों पर आधारित पार्टियों को मिलाया भी है। अति दलितों और अति पिछड़ों को आरक्षण का फैसला लिया गया, तो इस पर भी असर आना तय है।

पूरी तैयारी के साथ ही आगे बढ़ेगी सरकार

राज्य सरकार इस बार आरक्षण के संबंध में कोई कदम पूरी तैयारी के साथ ही आगे बढ़ाएगी। क्योंकि पिछली बार राजनाथ सिंह के शासनकाल में कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट आने के बाद अशोक यादव ने इसे कोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए इसके अमल पर रोक लगी दी थी। भाजपा के प्रदेश मंत्री प्रकाश पाल के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में यह प्रकरण गया था। लेकिन, सपा और बसपा सरकारों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

11 राज्यों में पहले से लागू है यह व्यवस्था

प्रदेश में अब अति पिछड़ों के आरक्षण के बारे में सोचा जा रहा है लेकिन, कई राज्यों में यह पहले से लागू है। बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पुंडुचेरी, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर (आंशिक) में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है।

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