जाति-आधारित आरक्षण नहीं बल्कि इस वजह से गिर रहा है मेडिकल एडमिशन का स्तर

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जाति-आधारित आरक्षण नहीं बल्कि पैसे के बढ़ते चलन की वजह से मेडिकल क्षेत्र में गुणवत्ता का स्तर गिर रहा है. देश के सभी सरकारी और प्राइवेट मेडिकल संस्थानों में नीट(NEET) परीक्षा के अंक के आधार पर एडमिशन होता है. ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक खबर के मुताबिक सरकारी कॉलेजों के मुकाबले प्राइवेट संस्थानों के स्टूडेंट्स का औसत नीट स्कोर काफी कम है. सरकारी कॉलेजों में कुल 39,000 सीटें हैं तो वहीं प्राइवेट संस्थानों में 17,000 से ज्यादा सीटें हैं. प्राइवेट संस्थानों में मैनेजमेंट और एनआरआई कोटा होता है जिसमें एडमिशन लेने के लिए मोटी रकम देनी पड़ती है. रिपोर्ट बताती है कि मैनेजमेंट और एनआरआई कोटे में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स का नीट स्कोर काफी कम है और इनकी स्टडी फीस सरकारी के मुकाबले कई गुना ज्यादा है. जाहिर है कि इस श्रेणी में सिर्फ पैसे वाले ही एडमिशन ले सकते हैं.

सरकारी कॉलेजों के SC छात्रों का नीट स्कोर प्राइवेट के मुकाबले काफी ज्यादा

द टाइम्स ऑफ इंडिया ने पिछले साल 409 मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन लेने वाले लगभग 57,000 छात्रों की जानकारी विश्लेषण कर बताया कि सरकारी संस्थानों में एडमिशन लेने वाले छात्रों का औसत नीट स्कोर 720 में से 448 अंक था. जबकि प्राइवेट संस्थानों के छात्रों का औसत नीट स्कोर सिर्फ 306 ही है. आमतौर पर ये सवाल उठता है कि एससी और एसटी श्रेणी में एडमिशन लेने वाले छात्रों का स्कोर बेहद कम होता है जिसकी वजह से मेडिकल क्षेत्र की गुणवत्ता का स्तर गिर रहा है. लेकिन अखबार की ये रिपोर्ट इस दावे से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर करती है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल एससी कोटे से सरकारी कॉलेजो में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स का औसत नीट स्कोर 398 था वहीं प्राइवेट संस्थानों में मोटी रकम देकर एनआरआई और मैनेजमेंट कोटे में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स का औसत नीट स्कोर सिर्फ 306 अंक था.

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NRI कोटे की सालाना औसत फीस 19 लाख

इससे ये बात साफ हो जाती है कि ज्यादा पैसे के बल पर कम अंक लाने वाले छात्र मेडिकल क्षेत्र में एडमिशन ले ले रहे हैं. प्राइवेट संस्थानों में एनआरआई कोटे के स्टूडेंट्स का नीट स्कोर सबसे कम है और इनकी सालाना फीस सबसे ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल एनआरआई कोटे के छात्रों का औसत नीट स्कोर 720 में से सिर्फ 221 अंक था और इनकी एक साल की औसत फीस 19 लाख रूपये थी. वहीं मैनेजमेंट कोटे में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स का औसत नीट स्कोर सिर्फ 315 अंक था. मैनेजमेंट कोटे से एडमिशन लेने वालों की सालाना औसत फीस 13 लाख रूपये थी.

वहीं सरकारी कॉलेजों के स्टूडेंट्स का औसत नीट स्कोर 487 था. इन सरकारी कॉलेजों की औसत फीस 50 हजार से भी कम थी. हालांकि सरकारी कॉलेजों में भी ज्यादा फीस पर एडमिशन लिया जाता है. इस श्रेणी में एडमिशन लेने वाले छात्रों का औसत नीट स्कोर 372.5 था. इन आंकड़ों से ये बात साफ हो जाती है जाति-आधारित आरक्षण नहीं बल्कि कम अंक लाने वाले छात्र पैसे के बल पर मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन ले रहे हैं जिसकी वजह से इस क्षेत्र में गुणवत्ता की कमी आ रही है. एससी/एसटी छात्रों का औसत नीट स्कोर मोटे पैसे दे कर एडमिशन लेने वाले छात्रों के मुकाबले काफी ज्यादा है.

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