नया दल नये दिल तलाश रहे भाजपा के ‘शत्रु-कीर्ति’

पटना।  राजग मिशन-2019 के लिए जहां ‘भाजपा सरकार फिर एक बार’ और ‘नरेंद्र मोदी सरकार फिर एक बार’ नारों के साथ जनता के बीच उतरने की तैयारी में है, वहीं भाजपा के बागियों ने भी ठिकाना तलाशने की मुहिम तेज कर दी है। उधर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि ऐसे लोगों का गेम ओवर हो चुका है। नया दल नये दिल तलाश रहे भाजपा के 'शत्रु-कीर्ति'

बागियों के इस मुहिम को चुनावी साल में खाद-पानी देने का काम दावत-ए-इफ्तार ने किया। रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के राजग के भाईचारा भोज में नहीं पहुंचने से शुरू हुई राजनीति, राजद की इफ्तार में पटना साहिब के सांसद और अभिनेता से नेता बने पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा के पहुंचने से परवान चढ़ गई।

महत्वपूर्ण यह कि राजद की इफ्तार पार्टी में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और राज्यसभा सांसद मीसा भारती ने शत्रुघ्न सिन्हा को पार्टी में शामिल होने का न्योता ही नहीं दिया बल्कि राजग में रहते हुए भी लोकसभा चुनाव में पटना साहिब सीट पर समर्थन का एलान कर बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी।

शत्रुघ्न सिन्हा के बाद दरभंगा से भाजपा के निलंबित सांसद कीर्ति आजाद ने बुधवार को नई पार्टी से लोकसभा चुनाव लडऩे का एलान कर गठबंधन दलों के बीच तकरार की नींव डाल दी है।

इफ्तार से बदली सियासी रफ्तार

बिहार में लोकसभा सीट बंटवारे के मुद्दे पर राजग में खिचखिच और मान-अपमान के सवाल पर गठबंधन के प्रमुख घटक दलों के बीच खटपट के बीच दावत के दौर ने भी राजनीतिक तल्खी बढ़ा दी है। दलों के इफ्तार में जाना और न जाना दोनों की राजनीतिक चर्चा जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इसके मायने भी निकाले जा रहे हैं। 

किस दल को कितना मिलेगा फायदा

संसदीय चुनाव की बिसात बिछने से पहले बिहार में गठबंधन की राजनीति नाजुक दौर से गुजर रही है। मैदान में उतरने से पहले दोनों गठबंधनों के घटक दल अधिक से अधिक जनसमर्थन जुटाने की तैयारी कर लेना चाहते हैं। ऐसे में इफ्तार की दावत को सीधे तौर पर राजनीति, खेमेबाजी एवं दूसरे से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश से जोड़कर देखा गया।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बिहार में मुस्लिम और यादव आबादी को राजद का वोट बैंक माना जाता है। दरभंगा और पटना साहिब दोनों लोकसभा क्षेत्रों में मुस्लिम और यादव मतदाताओं की आबादी परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

इफ्तार के जरिए सभी दलों की कोशिश मुस्लिम समाज को यह अहसास कराने की रही कि उनके एजेंडे में धर्मनिरपेक्ष भावनाओं की अहमियत सबसे ऊपर है। ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार में इफ्तार के बहाने किस गठबंधन को कितना फायदा मिलेगा? राजग की कोशिशें कितनी कामयाब हो पाएंगी और गठबंधन की झोली कितनी भर पाएगी?

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