कभी पानी की प्यास बुझाती थी बावड़ियां, आज लड़ रही अपने अस्तित्व की जंग

- in राजस्थान

जयपुर । कभी पुरामहत्व का बेजोड़ नमूना और पानी का मुख्य स्त्रोत रही राजस्थान की ऐतिहासिक बावड़ियां आज लगभग बिसरा दी गई है। पानी की कमी मानें या फिर देखभाल का अभाव, बावड़ियां अपना वैभव खोती जा रही है। बावड़ियां अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष करती दिखाई दे रही है।

प्राचीन समय में पानी का मुख्य स्त्रोत और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रही ये बावड़ियां आज अपनी बदहाली के कगार पर है। इनकी कलात्मकता, बनावट, सीढ़ियां, झरोखों का निर्माण अपने आप में प्राचीन तकनीक का नमूना पेश करती है। अवैध निर्माण के चलते बावड़ियों में जहां पानी पहुंचने के मार्ग बन्द हो गए है, वहीं किसी में पानी है तो वह उपयोग के लायक नहीं है।

लोगों ने बावडिय़ों को कचरागाह बनाकर छोड़ दिया है। राजस्थान में पिछले तीन साल से “मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान” चल रहा है। रोजनेता और अधिकारी ग्रामीणों के साथ श्रमदान कर रहे है,लेकिन वहीं प्राचीन बावड़ियां उपेक्षा की शिकार हो रही है।

ये प्राचीन धरोहर अविस्मरणीय है

राजस्थान में चांदबावड़ी,आंभानेरी की बावड़ी,चिराना की बावड़ी सहित करीब 100 बावड़ियां ऐसी है,जिनका निर्माण रियासतकाल में पानी के संरक्षण के लिए किया गया था । लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के चलते पिछले कुछ सालों से इन बावड़ियों की हालत बदतर होती जा रही है । चांदबावड़ी में तो कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग भी हो चुकी है । पर्यावरण और जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वालों का मानना है कि अधिकांश बावड़ियों की बदतर हालत के लिए अवैध निर्माण जिम्मेदार है। प्रशासन की लापरवाही के कारण पानी की आवक वाले मार्गों पर अवैध निर्माण हो गए । आज इन बावड़ियों को उचित रख-रखाव और संरक्षण मिल जाए तो ये बावड़ियां लोगों की प्यास तो बुझाने के साथ ही पर्यटन के क्षेत्र में लाभकारी सिद्ध् हो सकती है ।

जलसंसाधन मंत्री बोले,काम हो रहा है

राज्य के जलसंसाधन मंत्री डॉ.रामप्रताप का कहना है कि मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत पुराने टांकों,कुओं और बावड़ियों का संरक्षण करने का काम चल रहा है। इस काम में अधिक गति लाने का प्रयास करेंगे।

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