एम.करुणानिधि के जगह आज एमके स्टालिन बन सकते हैं DMK प्रमुख

”मैं जिंदगी भर आपको लीडर कहता रहा, क्या आखिरी बार अप्पा (पापा) कहके पुकारूं?”  एमके स्टालिन ने ये भावुक कविता अपने पिता और डीएमके के प्रमुख एम.करुणानिधि के निधन के बाद लिखी थी. एमके स्टालिन का नाम उनके पिता ने सोवियत यूनियन के नेता जोसेफ स्टालिन के नाम पर रखा था. अब ये राजकुमार अपनी पिता की जगह लेने वाला है. आज एमके स्टालिन का डीएमके का नया प्रमुख चुना जाना लगभग तय है.एम.करुणानिधि के जगह आज एमके स्टालिन बन सकते हैं DMK प्रमुख

करुणानिधि को राज्य की सियासत में धाक जमाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा था, जबकि राजनीति में स्टालिन का सफर बिल्कुल अलग रहा है. 14 साल की उम्र में ही उन्होंने अपने पिता के लिए प्रचार करना शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे पिता की छाया से बाहर निकल कर उन्होंने खुद को स्थापित किया. पिता करुणानिधि ने ही डीएमके में स्टालिन के लिए जगह बनाई थी.

स्टालिन को 1977 में इमरजेंसी के दौरान आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था. बारह साल बाद उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनावों में सीट जीती, लेकिन दो साल बाद ही वो चुनाव हार गए. इसके बाद से उन्हें विधानसभा चुनावों में हार का सामना नहीं करना पड़ा है. स्टालिन की प्रशासनिक क्षमता के बारे में लोगों को 1996 में पता चला, जब उन्हें चेन्नई का मेयर बनाया गया. उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक आधुनिकता पर ज़ोर दिया था. राजनीतिक विश्लेषक संपथ कुमार कहते हैं, “मुझे स्टालिन की प्रशासनिक क्षमता को लेकर कोई संदेह नहीं है, क्योंकि उन्होंने खुद को एक अच्छे मेयर के तौर पर साबित किया है.”

हालांकि कुमार ने स्टालिन को सलाह दी है कि उन्हें अपने भाई अलागिरी को फिर से पार्टी में शामिल कर लेना चाहिए. उन्होंने कहा “करुणानिधि एक चाणक्य थे. उन्होंने पार्टी में सभी जिला सचिवों और पार्टी के प्रमुख सदस्यों को खुश रखा. उन्हें पार्टी कैडर से बहुत अच्छा समर्थन मिला. स्टालिन को भी यही करना होगा. उन्हें सावधान रहना होगा और पार्टी में अलागिरी को शामिल करना होगा. स्टालिन को सभी जिला सचिवों को साथ रखना होगा. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो करुणानिधि जैसे करिश्माई नेता की अनुपस्थिति में पार्टी चलाना उनके लिए मुश्किल होगा.”

मंगलवार को स्टालिन डीएमके के अध्यक्ष बनेंगे. एक ऐसा पद पर जिस पर करुणानिधि का 50 से ज़्यादा सालों तक कब्जा रहा. राजनीतिक पंडितों का माना है कि स्टालिन के लिए ये सफर आसान नहीं रहेगा. वरिष्ठ पत्रकार आरके राधाकृष्णन कहते हैं. ”पहली चुनौती पार्टी के भीतर है. कैसे वो कैडर और वरिष्ठ नेताओं को एक साथ लेकर चल सकते हैं. उनको तत्काल ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी वरिष्ठ नेता या जिला सचिव या असंतुष्ट सदस्य 5 सितंबर को अलगिरि की रैली में शामिल न हो.”

अक्टूबर 2016 में करुणानिधि राजनीति से दूर हुए तभी से स्टालिन बेहद सक्रिय हो गए. जून 2013 में करुणानिधि के 93वें जन्मदिन पर, स्टालिन ने बीजेपी को छोड़कर सभी पार्टियों को आमंत्रित किया. कई लोगों ने कहा कि एक मंच पर प्रमुख नेताओं को एक साथ लाना स्टालिन की ये रणनीति एक मास्टरस्ट्रोक थी. इस कार्यक्रम में राहुल गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भाग लिया था.

इस बार डीएमके ने 30 अगस्त को शोक सभा के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल दोनों को बुलाया है. डीएमके ने शुरू में कहा था कि अमित शाह भी इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे. लेकिन अब नितिन गडकरी बीजेपी की तरफ से इस कार्यक्रम में भाग लेंगे. ये दूसरी बार है जब कई बड़े नेता एक मंच पर डीएमके कार्यक्रम के लिए एक साथ आएंगे.

स्टालिन का पहला सबसे बड़ा टेस्ट 2019 का लोकसभा चुनाव है. राधाकृष्णन कहते हैं, “2019 में एक नेता के तौर पर स्टालिन का इम्तिहान होगा. उन्हें कम से कम 30 सीट जीतना होगा. याद रखें कि स्टालिन के नेतृत्व में पार्टी ने चुनावी कामयाबी का स्वाद नहीं चखा है. 2011, 2014 और 2016 के चुनाव में उनकी हार हुई थी.”

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