भगवान शिव के इस मंदिर में बदल जाता है दिव्य शिवलिंग का आकार, रहस्य जानकर आपके उड़ जाएंगे होश

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भगवान भोले की ससुराल कनखल में स्थापित मंदिर में दिव्य शिवलिंग का आकार अपने आप घटना और बढ़ता है। इसकी मान्यता अनोखी है।भगवान शिव के इस मंदिर में बदल जाता है दिव्य शिवलिंग का आकार, रहस्य जानकर आपके उड़ जाएंगे होश

शिव का एक अलौकिक व अनोखा मंदिर तिल भांडेश्वर महादेव कनखल में स्थित है। मंदिर में स्थापित दिव्य शिवलिंग का आकार अपने आप घटता व बढ़ता है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां पानी में तिल डालकर यदि लगातार 41 दिनों तक एक ही समय में शिवलिंग का जलाभिषेक किया जाए तो मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

पंडित मोतीराम अल्हड़ ने तिल भांडेश्वर मंदिर में ही गायत्री पुरुशरण की साधना की थी। मान्यता है कि सती दाह के बाद दक्ष प्रजापति के महल में प्रवेश करने से पूर्व भगवान शिव ने इसी स्थान पर तिल के समान रूप धारण किया था। तिल भांडेश्वर महादेव मंदिर में वर्ष 1865 से पूर्व से ही दिव्य शिवलिंग की पूजा अर्चना की जा रही है। वर्ष 1970 के लगभग यह मंदिर एक वृद्ध साधु की देख रेख में था। मंदिर में पुजारी के रहना का भी कोई प्रबंध नहीं था।

मंदिर की दशा को दुरुस्त करने के लिए भक्तों ने त्रिवेणीदास महाराज से मंदिर की देखरेख करने और पूजा अर्चना आदि करने का दायित्व संभालने का आग्रह किया। महंत त्रिवेणीदास महाराज ने महंत हंसदास महाराज से आज्ञा प्राप्त कर मंदिर का दायित्व संभाला। वर्ष 1972 से ही जनसामान्य के सहयोग से सर्वप्रथम मंदिर के गर्भगृह का जीर्णोद्धार, मंदिर परिक्रमा का निर्माण, फर्श और बाहरी चहारदीवारी का निर्माण किया गया। वर्ष 1987 में मंदिर में कमरों का निर्माण किया गया।

19वीं शताब्दी में ही ब्रह्मलीन महंत हंसदास महाराज ने तिलभांडेश्वर के किनारे बैठकर भगवान तिलभांडेश्वर की तपस्या की थी। लेकिन किसी को भी यह ज्ञात नहीं था कि शिवलिंग का आकार स्वयं ही घटता और बढ़ता है। पंडित मोतीराम अल्हड़ प्रतिदिन पूजा के समय जनेऊ से शिवलिंग को नापा करते थे।

एक दिन उन्हें आभास हुआ कि कृष्ण पक्ष में शिवलिंग का आकार तिल तिल घटता है और शुक्ल पक्ष में तिल तिल बढ़ता है। तिल भांडेश्वर महादेव मंदिर के महंत त्रिवेणीदास महाराज ने बताया कि मंदिर में सुबह और शाम भगवान तिल भांडेश्वर की पूजा की जाती है।

मंदिर का वास्तविक नाम तिल वर्धनेश्वर है और पंडित मोतीराम अल्हड़ ने ही मंदिर का नाम बदलकर तिल वर्धनेश्वर रखा था। ऐसा भी माना जाता है कि अधिकांश लोगों को मंदिर के नाम का उच्चारण करने में दिक्कत होती थी, जिस कारण मंदिर को नाम तिल भांडेश्वर रखा गया।

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