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	<title>पर्यटन &#060; Ujjawal Prabhat | उज्जवल प्रभात</title>
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	<description>Hindi News, Lifestyle &#38; Entertainment Articles.</description>
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	<title>पर्यटन &#060; Ujjawal Prabhat | उज्जवल प्रभात</title>
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		<title>कानपुर में है मां कुष्मांडा का अनोखा धाम, यहां पिंडी से रिसता है चमत्कारिक जल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Oct 2026 11:24:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[मां कुष्मांडा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="485" height="450" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/78-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82/">कानपुर में है मां कुष्मांडा का अनोखा धाम, यहां पिंडी से रिसता है चमत्कारिक जल</a></p>
<p>क्या आप चमत्कारों पर विश्वास करते हैं? दरअसल, उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में एक ऐसी जगह है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। हम बात कर रहे हैं घाटमपुर कस्बे में स्थित मां कुष्मांडा देवी के मंदिर की। मां कुष्मांडा को सृष्टि की रचना करने वाली &#8216;आदि शक्ति&#8217; माना जाता है। आइए बिल्कुल &#8230;</p>
<p>आप पढ़ रहे हैं : UjjawalPrabhat.Com</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="485" height="450" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/78-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82/">कानपुर में है मां कुष्मांडा का अनोखा धाम, यहां पिंडी से रिसता है चमत्कारिक जल</a></p>

<p class="wp-block-paragraph">क्या आप चमत्कारों पर विश्वास करते हैं? दरअसल, उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में एक ऐसी जगह है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हम बात कर रहे हैं घाटमपुर कस्बे में स्थित मां कुष्मांडा देवी के मंदिर की। मां कुष्मांडा को सृष्टि की रचना करने वाली &#8216;आदि शक्ति&#8217; माना जाता है। आइए बिल्कुल आसान शब्दों में जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी कुछ ऐसी अनोखी बातें जो सच में हैरान करने वाली हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चमत्कारी जल, जो लौटाता है आंखों की रोशनी<br /></strong>इस मंदिर की सबसे चौंकाने वाली बात यहां मौजूद माता की पिंडी है, जिससे बारह महीने पानी रिसता रहता है। यह पानी अंदर से कहां से आ रहा है, यह आज तक एक अनसुलझी पहेली है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि अगर कोई भी व्यक्ति लगातार 6 महीने तक इस बहते हुए जल को अपनी आंखों में लगाए, तो न सिर्फ आंखों से जुड़े बड़े से बड़े रोग ठीक हो जाते हैं, बल्कि खोई हुई रोशनी भी वापस लौट आती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दुनिया की इकलौती अनोखी पिंडी<br /></strong>यहां माता की जो पिंडी है, वह पूरी दुनिया में अपने आप में इकलौती मानी जाती है। चतुष्टय यानी चार कोनों वाले आकार की इस पिंडी के दो मुख हैं। यह जमीन पर कुछ इस तरह लेटी हुई अवस्था में दिखाई देती है कि इसका कोई ओर-छोर ही समझ नहीं आता।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>यहां पंडित नहीं, &#8216;मालिन&#8217; करती हैं पूजा<br /></strong>आमतौर पर मंदिरों में भगवान की सेवा पुजारी, पंडित या साधु-संत करते हैं, लेकिन कुष्मांडा माता मंदिर की परंपरा सबसे अलग है। सैकड़ों सालों से यहां देवी मां को कपड़े पहनाने, उनका मनमोहक शृंगार करने और भोग लगाने की पूरी जिम्मेदारी मालिन ही निभाती आ रही हैं। बता दें, यहां रोज बड़ी संख्या में लोग आते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी माँ की सेवा करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नवरात्र में उमड़ता है आस्था का सैलाब<br /></strong>नवरात्र के चौथे दिन यहां भक्तों का विशाल मेला लगता है और लाखों लोग पहुंचते हैं। श्रद्धालु अपनी मुरादें लेकर मां कुष्मांडा को मुख्य रूप से कच्चे चने का भोग लगाते हैं। इसके साथ ही देवी मां को &#8216;कुम्हड़ा&#8217; बहुत पसंद है, इसलिए मंदिर में कुम्हड़े की बलि देने की भी खास परंपरा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कब जाएं और कहां ठहरें?<br /></strong>दर्शन करने के लिए यह मंदिर सुबह 6 बजे से लेकर रात 9 बजे तक खुला रहता है। अगर आप यहां रात में रुकना चाहते हैं, तो घाटमपुर में ही गेस्ट हाउस आसानी से मिल जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मंदिर तक कैसे पहुंचें?<br /></strong>हवाई जहाज से: सबसे नजदीकी एयरपोर्ट कानपुर है। वहां से आप सीधे कैब या टैक्सी बुक करके मंदिर जा सकते हैं।<br />ट्रेन से: दर्शन के लिए पास का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन &#8216;कानपुर सेंट्रल&#8217; है। स्टेशन के बाहर से ही मंदिर जाने के लिए आपको लोकल बस, ऑटो और टैक्सी आसानी से मिल जाएंगी।<br />सड़क के रास्ते: कानपुर यूपी के सभी प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। शहर के भीतर से आप ई-रिक्शा, ऑटो या लोकल टैक्सी लेकर आराम से घाटमपुर स्थित मंदिर तक पहुंच सकते हैं।</p>
<p>आप पढ़ रहे हैं : UjjawalPrabhat.Com</p>
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		<item>
		<title>AI के भरोसे बना रहे हैं ट्रैवल प्लान? टिकट बुक करने से पहले इन बातों को खुद जांच लें जरूर</title>
		<link>https://ujjawalprabhat.com/ai-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%88%e0%a4%b5/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2026 08:08:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1040" height="533" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30.jpg 1040w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30-768x394.jpg 768w" sizes="(max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/ai-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%88%e0%a4%b5/">AI के भरोसे बना रहे हैं ट्रैवल प्लान? टिकट बुक करने से पहले इन बातों को खुद जांच लें जरूर</a></p>
<p>तकनीक और एआइ ने पर्यटन की योजना और रिसर्च को तेज और आसान बना दिया है, लेकिन अंतिम बुकिंग और वित्तीय जोखिम के मामलों में इंसानी सजगता ही सबसे जरूरी है। एआइ रास्ते और लॉजिस्टिक्स तो सही बता सकता है, पर यात्रा के अनूठे एहसास और जमीनी हकीकत खुद ही जानें तो बेहतर.. तकनीक तेज &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1040" height="533" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30.jpg 1040w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/1-30-768x394.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/ai-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%88%e0%a4%b5/">AI के भरोसे बना रहे हैं ट्रैवल प्लान? टिकट बुक करने से पहले इन बातों को खुद जांच लें जरूर</a></p>
<p>तकनीक और एआइ ने पर्यटन की योजना और रिसर्च को तेज और आसान बना दिया है, लेकिन अंतिम बुकिंग और वित्तीय जोखिम के मामलों में इंसानी सजगता ही सबसे जरूरी है। एआइ रास्ते और लॉजिस्टिक्स तो सही बता सकता है, पर यात्रा के अनूठे एहसास और जमीनी हकीकत खुद ही जानें तो बेहतर..</p>
<p><strong>तकनीक तेज हुई पर सिस्टम का तालमेल ठीक नहीं </strong><br />
हाल ही में जब मैंने स्काटलैंड, आयरलैंड और नार्वे में एक महीना बिताया, तो ट्रेन, फेरी, फ्लाइट, कार किराए पर लेने से लेकर एयरबीएनबी तक की सारी बुकिंग मेरे फोन पर कुछ ही मिनटों में हो गई। कुछ साल पहले तक इसके लिए ढेरों प्रिंटआउट निकालने पड़ते थे और दर्जनों फोन काल्स करने पड़ते थे, लेकिन तेज रफ्तार का मतलब यह नहीं कि सब कुछ बिना किसी रुकावट के हो जाए। मेरी एक फ्लाइट का स्टेटस भुगतान करने के कई दिनों बाद तक अंडर प्रोसेस ही दिखता रहा। यानी तकनीक तो तेज हुई है, लेकिन अलग-अलग सिस्टम्स के बीच का तालमेल अब भी उतना पक्का नहीं है।</p>
<p><strong>आधुनिक यात्री का बदलता मिजाज </strong><br />
आज यात्रियों का रवैया पूरी तरह बदल चुका है। पहले लोग मुझसे पूछते थे- मुझे कहां जाना चाहिए? अब वे अपनी पूरी योजना (जो अक्सर एआइ ने बनाई होती है) लेकर आते हैं और पूछते हैं, क्या यह प्रैक्टिकल है? या मुझसे क्या छूट रहा है? जगहों की खोज अब रील्स और चैटबाट्स तक सिमट गई है। अब लोग मुझसे सिर्फ अनुभव और वास्तविकता जानना चाहते हैं-वहां का मौसम कैसा है, सड़कें कैसी हैं और ऐसी कौन सी बात है जो किसी गाइड-लिस्ट में नहीं मिलेगी।</p>
<p><strong>अंतिम फैसला हो आपका </strong><br />
मैं यात्रा के दौरान तकनीक का इस्तेमाल करता हूं, लेकिन बहुत सोच-समझकर। यात्रा की रिसर्च के लिए एआइ बेहद कारगर साबित होता है-चाहे रूट प्लान करना हो, मौसम का सही समय देखना हो या यह तय करना हो कि एक दिन में कितना सफर व्यावहारिक है। इस यात्रा के दौरान मैंने अपनी सारी बुकिंग्स की जानकारी एक एआइ चैट में डाल दी थी, जो मेरी ट्रिप का मास्टरमाइंड बन गया।</p>
<p>इसने मेरी उन गलतियों को पकड़ लिया जो मुझसे छूट रही थीं-जैसे कि एक रात के लिए रहने का कोई इंतजाम ही नहीं था। बात तो सही थी, लेकिन बुकिंग जैसी जरूरी बातों के निर्णय मैं खुद ही करता हूं। एआइ मेरा गाइड है, मेरा एकमात्र सहारा नहीं।</p>
<p><strong>दूर हुईं छोटी रुकावटें </strong><br />
सफर में छोटी-छोटी रुकावटें भी भारी पड़ती हैं, क्योंकि इससे फोटोग्राफी और शूटिंग का कीमती समय बर्बाद होता है। उदाहरण के लिए, इस बार मेरी पार्टनर और मैं अलग-अलग एयरलाइंस और अलग-अलग टर्मिनल्स से सफर कर रहे थे। अगर बुकिंग्स नान-रिफंडेबल हों, तो एक ट्रेन की देरी से आगे की तीन बुकिंग्स पर पानी फिर सकता है।</p>
<p>ऐसे में एआइ की मदद से आप अपनी पूरी योजना को दोबारा शेड्यूल कर सकते हैं। यानी एक ऐसा सिस्टम, जो सब कुछ खुद सिंक कर ले और एक भी चीज बदलने पर पूरी योजना को अपने आप एडजस्ट कर दे, वह सच में यात्रा का अनुभव बदल देगा। हालांकि, हम अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। सीधी सी बात है, जब बात पैसों की आती है, तो एक छोटी सी गलती भी भारी पड़ती है।</p>
<p>अगर कोई एप आपको किसी खराब कैफे में भेज दे, तो सिर्फ एक घंटा खराब होता है, लेकिन अगर वह किसी &#8216;नान-रिफंडेबल&#8217; टिकट पर गलत तारीख बुक कर दे, तो पूरी ट्रिप ही बर्बाद हो जाती है। स्काटलैंड और नार्वे में मेरी ज्यादातर बुकिंग्स ऐसी थीं, जिनमें पैसे वापस नहीं मिलते, इसलिए मैंने हर एक तारीख खुद री-चेक की। जब तक कोई आटोमेटेड सिस्टम गलती होने पर खुद जिम्मेदारी नहीं लेता!</p>
<p><strong>याद रहता है वो अनुभव </strong><br />
एल्गोरिदम आपको यह बता सकता है कि लोफोटेन आइलैंड्स को बहुत अच्छी रेटिंग मिली है, लेकिन एआइ यह नहीं बता सकता कि आर्कटिक की ठंड में एक कैंपरवेन के भीतर आंखें खोलने का एहसास कैसा होता है या फिर टूटते तारों को देखने के लिए अपने सफर का रास्ता बदल लेना कितना जादुई था।</p>
<p>एल्गोरिदम समय और पैसों की बचत का हिसाब लगाते हैं, जबकि मेरी सिफारिशें एहसासों और अनुभवों पर टिकी होती हैं। लोग कभी सबसे छोटा रास्ता याद नहीं रखते; उन्हें तो बस वही पल याद रहता है, जहां थोड़ी सी गड़बड़ हुई और वह सफर की एक खूबसूरत कहानी बन गई।</p>
<p><strong>इंतजार उन बदलावों का </strong><br />
अब ऐसा भी नहीं है कि आप एआइ को सिरे से नकार ही दें। हां, जिस तेजी से तकनीक में परिवर्तन आ रहा है, वह वाकई काबिलेतारीफ है। उम्मीद है कि दो-तीन सालों में एक आम यात्री बस अपनी पसंद बताएगा ( उदाहरण के लिए 10 दिन की यात्रा, पहाड़ी जगह, कम ठंड और बजट फ्रेंडली) और एआइ उसे तुरंत बुक करने योग्य पूरी योजना थमा देगा।</p>
<p>सफर में आने वाली किसी भी रुकावट के दौरान रि-बुकिंग अपने आप हो जाया करेगी, लेकिन जो चीज कभी नहीं बदलेगी, वह है हमारे यात्रा करने की वजह। जब यात्रा की योजना पर्दे के पीछे चली जाएगी, तो इंसान जिन कहानियों और अनुभवों की तलाश करता है, उनका महत्व और बढ़ जाएगा। यहीं पर हम जैसे ट्रैवल क्रिएटर्स का काम शुरू होता है।</p>
<p>आप पढ़ रहे हैं : UjjawalPrabhat.Com</p>
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		<title>बिना क्रेन और मशीन के 13,000 फीट ऊंची चट्टानों पर कैसे बनाए गए मठ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 08:30:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1029" height="570" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3.jpg 1029w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3-768x425.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1029px) 100vw, 1029px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-13000-%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9f/">बिना क्रेन और मशीन के 13,000 फीट ऊंची चट्टानों पर कैसे बनाए गए मठ?</a></p>
<p>ग्रीस के मध्य भाग में स्थित मेटियोरा एक ऐसी जगह है, जिसे देखकर हर इंसान हैरत में पड़ जाता है। प्रकृति और इंसान की आस्था का ये बहुत ही खास मेल है। दरअसल, यहां लगभग 13 हजार फीट ऊंची बलुआ पत्थर की चट्टानों पर प्राचीन मठ बने हुए हैं। लोगों को हैरान करता है कि &#8230;</p>
<p>आप पढ़ रहे हैं : UjjawalPrabhat.Com</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1029" height="570" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3.jpg 1029w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/9-3-768x425.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1029px) 100vw, 1029px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-13000-%e0%a4%ab%e0%a5%80%e0%a4%9f/">बिना क्रेन और मशीन के 13,000 फीट ऊंची चट्टानों पर कैसे बनाए गए मठ?</a></p>

<p class="wp-block-paragraph">ग्रीस के मध्य भाग में स्थित मेटियोरा एक ऐसी जगह है, जिसे देखकर हर इंसान हैरत में पड़ जाता है। प्रकृति और इंसान की आस्था का ये बहुत ही खास मेल है। दरअसल, यहां लगभग 13 हजार फीट ऊंची बलुआ पत्थर की चट्टानों पर प्राचीन मठ बने हुए हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लोगों को हैरान करता है कि जब इन्हें दूर से देखा जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे ये मठ जमीन पर नहीं, बल्कि सीधे बादलों और आसमान के बीच लटके हुए हैं। आइए इस अनोखी जगह के बारे में और जानते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>आकाश में लटका हुआ शहर<br /></strong>मेटियोरा शब्द का मतलब भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, ये एक यूनानी शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है आकाश में लटका हुआ। विज्ञान की नजर से देखें, तो इन विशाल चट्टानों का निर्माण करोड़ों साल पहले नदी और डेल्टा क्षेत्र में जमा हुए अवसादों से हुआ था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">समय के साथ धरती के अंदर हुई हलचलों, बारिश और तेज हवाओं ने इन्हें कांट-छांटकर खड़ी दीवारों और गहरी दरारों वाला रूप दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>11वीं सदी से जुड़ा है इतिहास<br /></strong>इन विशाल बलुआ पत्थर की चट्टानों के ऊपर बने मठों का इतिहास 11वीं सदी से जुड़ा है। उस दौर में ईसाई संत संसार की मोह-माया से दूर शांत जगह में आध्यात्मिक साधना के लिए प्राकृतिक गुफाओं में रहने आए थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धीरे-धीरे ये छोटे आश्रम बड़े मठों के रूप में विकसिक हो गए। 14वीं और 15वीं शताब्दी आते-आते ये इलाका एक प्रमुख धार्मिक और मठवासी केंद्र बन गया। एक समय में यहां लगभग 24 मठ हुआ करते थे, लेकिन आज सिर्फ 6 मठ ही सुरक्षित हैं। ये मठ हैं ग्रेट मेटियारॉन, वरमाल, रूसानू, सेंट निकोलस अनापाफसास, होली ट्रिनिटी और सेंट स्टीफन।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दुर्गम चोटियों पर कैसे हुआ निर्माण?<br /></strong>आज के समय में पर्यटक इन मठों तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों और पक्की सड़कों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन सदियों पहले ये सुविधा नहीं थी। उस समय इन सीधी और विशाल चट्टानों पर निर्माण सामग्री पहुंचाना अपने आप में एक नामुमकिन लगने वाली चुनौती थी। हालांकि, लोगों ने हार नहीं मानी। उन्होंने लकड़ी की सीढ़ियों, मजबूत रस्सियों, जालों और टोकरियों के सहारे लोगों और भारी सामानों को ऊपर पहुंचाया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल<br /></strong>इंसान के दृढ़ संकल्प, शानदार वास्तुकला और प्रकृति के अजूबे के इस मेल को यूनेस्को ने 1988 में मेटियोरा को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। प्रकृति की खूबसूरती और इंसानों की संस्कृति के इस मेल को देखने आज दुनियाभर से पर्यटक आते हैं।</p>
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		<title>48 घंटों में घूमें अंडमान और निकोबार की सबसे खूबसूरत जगहें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2026 08:25:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[अंडमान और निकोबार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="543" height="532" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/5-11.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/48-%e0%a4%98%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%98%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%94%e0%a4%b0/">48 घंटों में घूमें अंडमान और निकोबार की सबसे खूबसूरत जगहें</a></p>
<p>अंडमान और निकोबार द्वीप भारत की सबसे खूसबूरत जगहों में से एक हैं। बंगाल की खाड़ी में स्थित ये द्वीप नीले पानी, सफेद रेत के तटों और अपने इतिहास के लिए जाने जाते हैं। अगर आप भी अंडमान और निकोबार द्वीप घूमने जाना चाहते हैं, लेकिन आपके पास सिर्फ दो दिन का ही समय है, &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">अंडमान और निकोबार द्वीप भारत की सबसे खूसबूरत जगहों में से एक हैं। बंगाल की खाड़ी में स्थित ये द्वीप नीले पानी, सफेद रेत के तटों और अपने इतिहास के लिए जाने जाते हैं। अगर आप भी अंडमान और निकोबार द्वीप घूमने जाना चाहते हैं, लेकिन आपके पास सिर्फ दो दिन का ही समय है, तो ये ट्रैवल गाइड आपके लिए परफेक्ट है। आइए जानें अंडमान और निकोबार द्वीप घूमने के लिए दो दिनों की परफेक्ट ट्रैवल गाइड।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दिन-1 श्री विजया पुरम सिटी टूर<br /></strong>पहले दिन की शुरुआत अंडमान और निकोबार द्वीप की राजधानी श्री विजया पुरम से करें। सुबह पहले एशिया की सबसे पुरानी चाथम सॉ मिल देखें और पास ही स्थित फॉरेस्ट म्यूजियम भी देखने जाएं। इनसे आपके अंडमान और निकोबार के इतिहास के बारे में काफी कुछ पता चलेगा। इसके बाद सेलुलर जेल देखें और फिर समुद्रिका नेवल मरीन म्यूजियम में समुद्री जीवों के दीदार करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके बाद सागरिका एम्पोरियम से स्थानीय हस्तशिल्प की खरीददारी करें। इसके बाद एंथ्रोपोलॉजिकल म्यूजियम, फिशरीज एक्वेरियम और साइंस सेंटर के भी दीदार करें। इसके बाद शाम होते-होते कॉर्बिन्स कोव बीच पहुंच जाएं और वहां से सनसेट का खूबसूरत नजारा देखें। रात को नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप पर साउंड एंड लाइट शो का आनंद लें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दिन 2- रोस आईलैंड और नॉर्थ बे की यात्रा<br /></strong>ट्रिप के दूसरे दिन अंडमान और निकोबार के मशहूर द्वीपों और एडवेंचर एक्टिविटीज का आनंद लें। सुबह अबरडीन जेट्टी से नाव पकड़कर रोस आईलैंड पहुंचें और वहां ब्रिटिश काल के अवशेषों का दीदार करें। इसके बाद नॉर्थ बे आईलैंड पहुंच जाएं, जो कोरल्स और वॉटर स्पोर्ट्स के लिए मशहूर है। यहां ग्लास-बॉटम बोट की सवारी करें और चाहें, तो स्नॉर्कलिंग और स्कूबा डाइविंग जैसी एडवेंचर एक्टिविटीज भी कर सकते हैं। शाम होते होते श्री विजया पुरम लौट आएं और रात को सेलुलर जेल में आयोजित होने वाले लाइट एंड साउंड शो का मजा लें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कैसे पहुंचे अंडमान और निकोबार द्वीप?<br /></strong>अंडमान पहुंचने के लिए आप दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, विशाखापट्टनम और चेन्नई जैसे शहरों से फ्लाइट लेकर वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुंच सकते हैं। ये हवाई अड्डा भारत के मुख्य शहरों से जुड़ा हुआ है और बिल्कुल सीधी कनेक्टिविटी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इंटर-आईलैंड कनेक्टिविटी<br /></strong>द्वीपों के बीच ट्रैवल करने के लिए नाव या फेरी का इस्तेमाल कर सकते हैं। डायरेक्टरेट ऑफ शिपिंग सर्विसेज (DSS) फीनिक्स बे जेट्टी से सभी प्रमुख द्वीपों के लिए नियमित फेरी सवाएं चलाती है। आप चाहें, तो अबरडीन जेट्टी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नॉर्थ बे और वाइपर आईलैंड के लिए प्राइवेट बोट्स भी बुक कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नाव और फेरी के अलावा, श्री विजया पुरम से शहीद द्वीप, स्वराज द्वीर और दिग्लीपुर जैसे द्वीपों तक पहुंचने के लिए हेलिकॉपटर सेवाएं भी उपलब्ध हैं।</p>
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		<title>आज जहां गुरुद्वारा, कभी था वहां राजपूत राजा का आलीशान महल</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 Sep 2026 07:58:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[आलीशान महल]]></category>
		<category><![CDATA[राजपूत राजा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1086" height="516" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16.jpg 1086w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16-768x365.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1086px) 100vw, 1086px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a5%e0%a4%be/">आज जहां गुरुद्वारा, कभी था वहां राजपूत राजा का आलीशान महल</a></p>
<p>देश की राजधानी दिल्ली के सेंटर में एक महशूर गुरुद्वारा है, जिसका नाम बंगला साहिब है। जहां आने के लिए लोग किसी खास मौके या त्योहार की राह नहीं तकते, यही वजह है कि पूरे साल यहां भीड़ देखने को मिलती है। पर कभी आपने सोचा है कि इस गुरुद्वारे के नाम में सिक्खों के &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="1086" height="516" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16.jpg 1086w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/09/3-16-768x365.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1086px) 100vw, 1086px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a5%e0%a4%be/">आज जहां गुरुद्वारा, कभी था वहां राजपूत राजा का आलीशान महल</a></p>

<p class="wp-block-paragraph">देश की राजधानी दिल्ली के सेंटर में एक महशूर गुरुद्वारा है, जिसका नाम बंगला साहिब है। जहां आने के लिए लोग किसी खास मौके या त्योहार की राह नहीं तकते, यही वजह है कि पूरे साल यहां भीड़ देखने को मिलती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पर कभी आपने सोचा है कि इस गुरुद्वारे के नाम में सिक्खों के किसी गुरु का नाम न होकर इसे बंगला साहिब क्यों कहते हैं? चलिए आज आज गुरुद्वारे के इसी दिलचस्प इतिहास को जानते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>गुरुद्वारा बंगला साहिब का राजपूत राजा से है नाता<br /></strong>गुरुद्वारा बंगला साहिब नई दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में अशोक रोड और बाबा खडग सिंह मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इस स्थान पर पहले कोई गुरुद्वारा नहीं था, बल्कि जयपुर के महाराजा मिर्जा राजा जय सिंह का महल हुआ करता था। जिसे उस दौर में &#8216;जयसिंहपुरा पैलेस&#8217; के नाम से भी जाना जाता था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कहते हैं कि जब साल 1664 में राजधानी हैजा और चेचक की चपेट में आई, तब श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी राजा जय सिंह के महल में ठहरे थे। इस महल में रहकर गुरु ने जात-पात का भेद भूलकर सभी महामारी से पीड़ित लोगों की खूब सेवा की थी। उन्होंने महल के कुएं से ताजा पानी देकर लोगों की तबीयत में सुधार किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>खुद हुए चेचक से पीड़ित<br /></strong>गुरु हरकृष्ण साहिब जी ने लोगों को तो ठीक कर दिया, पर इस सेवा के चलते वो खुद चेचक से पीड़ित हो गए। फिर 30 मार्च 1664 को वो खुद ज्योति ज्योत समा गए। उन्हीं की याद में सम्मान देते हुए महाराजा जी सिंह ने इस महल को सिख संगत को समर्पित कर दिया था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">महाराजा ने इस कुएं से एक छोटा तालाब भी बनवाया था, जिससे आज यह मान्यता जुड़ी हुई है कि इस पानी में बीमारियां ठीक करने की अद्भुत शक्ति है। इसी वजह से लोग आज भी इस तालाब का जल भरकर अपने घर ले जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>महल के नाम पर ही पड़ा गुरुद्वारे का नाम<br /></strong>वैसे तो यह गुरुद्वारा सिखों के आठवें गुरु श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी को समर्पित है, पर इसका नाम इसके इतिहास जुड़ा हुआ है। अब क्योंकि यह गुरुद्वारा पहले एक आलीशान महल हुआ करता था, ऐसे में इसका नाम ‘बंगला साहिब’ भी इसी से मिलता-जुलता रखा गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नहीं बंद होते कभी गुरुद्वारे के कपाट<br /></strong>इस गुरुद्वारे की खास बात यह है कि यह सातों दिन खुला रहता है, यानी इसके कपाट कभी भी बंद नहीं होते। वहीं, इस जगह से कभी कोई भूखा नहीं जाता क्योंकि इस गुरुद्वारे में 24 घंटे लंगर चलता है।</p>
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