जानिए, सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भाजपा की मजबूरी या बनेगी दूरी

लखनऊ । योगी सरकार के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने जिस तीखे अंदाज में खुद को मंत्रिमंडल से हटाने की चुनौती दी है, उससे यह सवाल गर्मा गया है कि भाजपा अब उनसे दूरी बनाएगी या उन्हें सरकार में बनाए रखेगी। क्या राजभर भाजपा के लिए कोई मजबूरी हैं?जानिए, सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भाजपा की मजबूरी या बनेगी दूरी

इसी तरह मछलीशहर में उनके उम्मीदवार हरी को 2669, जौनपुर में अरविन्द को 2204, देवरिया में उमेश को 4343, कुशीनगर में जाहिद को 2677, महराजगंज में कविलास को 5195, सुलतानपुर में गिरीश लाल को 3804, अंबेडकरनगर में गोपाल निषाद को 5792, डुमरियागंज में मनोज को 2709, बस्ती में शिवपूजन राजभर को 7093 और संतकबीरनगर में संत शिरोमणि बाबूलाल को 3900 मत मिले थे। फिर भी वह भाजपा को चुनौती दे रहे हैं और भाजपा कार्रवाई भी नहीं कर रही।

राजभर अपने बयानों से लगातार योगी सरकार के लिए कठिनाई खड़ी कर रहे हैं। उन्होंने करीब एक वर्ष पहले गाजीपुर के डीएम को हटाने और न हटाये जाने पर मंत्रिमंडल से इस्तीफे की धमकी देकर सरकार से जंग शुरू की। बुधवार को राजभर ने प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र चंदौली में अपनी पार्टी का लोकसभा प्रभारी बनाकर सीधी लड़ाई का संकेत दे दिया।

प्रदेश अध्यक्ष डॉ. पांडेय ने राजभर को मर्यादा में रखकर राजनीति करने की नसीहत दी थी, इसलिए वह उनके निशाने पर हैं। भाजपा के लोग अभी राजभर के खिलाफ खुलकर बोलने से बच रहे हैं पर, वाराणसी और आगरा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने उनके रवैये की शिकायत हुई। दरअसल, भाजपा अब यह आकलन करने में जुटी है कि राजभर पार्टी के लिए कितने मुफीद रहेंगे।

पिछड़ों और दलितों के आरक्षण में बंटवारे का दांव खेलने वाले राजभर ने वर्ष 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन किया। तबसे वह विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में उतरे लेकिन, उनका खाता 2017 के विधानसभा चुनाव में खुला। भाजपा ने समझौते में आठ सीटें दी और उन्हें चार सीटों पर जीत मिली। योगी सरकार में मंत्री भी बन गए।

भाजपा से हाथ मिलाने के बाद राजभर को जरूर सफलता मिली लेकिन, वह दावा करते हैं कि मेरे बेटे और राष्ट्रीय प्रवक्ता को विधानसभा चुनाव में भाजपा के लोगों ने हराया। राजभर भाजपा को चाहे जितनी चुनौती दें लेकिन, जिस आरक्षण के बंटवारे का मुद्दा वह गर्मा रहे हैं उसे सपा-बसपा ने कभी तरजीह नहीं दी। 

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