मुजफ्फरपुर की यह महिला पुलिस अफसर, रेप पीड़ितों के लिए हैं भगवान

‘आंटी हमको रख लो ना’ – मुजफ्फरपुर की महिला एसएचओ ज्योति कुमारी की आंखें डबडबा जाती हैं जब वो बालिका गृह की बच्चियों को याद करती हैं. मुजफ्फरपुर के साहू रोड पर बालिका आवास गृह में 6-15 साल तक की उम्र की बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न और बलात्कार के मामले सामने आए हैं. ज्योति कुमारी इस केस की आईओ (इन्फोर्मेशन ऑफिसर) हैं और वही इस केस की हीरो हैं – ऐसा हम नहीं, मुजफ्फरपुर के लोग और खुद इस शहर की एसएसपी हरप्रीत कौर मानती हैं.मुजफ्फरपुर की यह महिला पुलिस अफसर, रेप पीड़ितों के लिए हैं भगवान

यह मामला सामने आने के बाद से ही ज्योति बच्चियों के साथ परछाई की तरह रही हैं. बच्चियों की मेडिकल जांच और कोर्ट में उनके दिए बयान से केस में अहम मोड़ आ पाया है. ज्योति और उनकी टीम (जिसमें दो महिला सिपाही, एक महिला और एक पुरुष ड्राइवर शामिल हैं) ने इस मुश्किल लगने वाले काम को मुमकिन बनाया. 44 बच्चियों को मुजफ्फरपुर से अन्य शहरों के आवास गृह तक सुरक्षित हाल में लेकर जाया गया. इनमें से करीब 16 बच्चियों को मेडिकल जांच के लिए ज्योति और उनकी टीम काम पर लगी थी.

आलम यह है कि अब ज्योति को उनमें से ज्यादातर बच्चियों को कौन सी आइसक्रीम पसंद है, कौन सा रंग पसंद है और क्या पसंद नहीं, सब कुछ पता है. इन दो महीनों को याद करते हुए ज्योति कहती हैं – ‘जब कोई बच्ची हमसे कहती थी ना कि आंटी हमको आप ही रख लो ना, तो उसे ज़ोर से गले लगाकर सोचती थी, अगर पैसों से कमज़ोर नहीं होती तो इन सब बच्चियों को अपने पास ही रख लेती.’

सील हो चुके बालिका आवास गृह के बाहर लगे सोफे पर फोरेंसिक अधिकारियों और प्रेस वालों के बीच ज्योति इस केस से जुड़े अपने काम निपटा रही हैं. साथ साथ में हंसी मज़ाक भी चल रहा है. उन्हें मुजफ्फरपुर के समोसे पसंद हैं.

ज्योति बताती हैं –

हमने 11 साल की नौकरी में नहीं सोचा था कि ऐसा कोई केस सामने आएगा जो हमें भी हिला देगा. हम तो सोचते थे, महिला थाने में वही तलाक, लड़ाई झगड़े के मामले ही आते रहेंगे और हम ऐसे ही उनसे निपटते रहेंगे. लेकिन इस केस में तो छोटी छोटी बच्चियां हैं. उनके साथ हमें अलग ही तरह से पेश आना होता था. कोर्ट में जो बयान दर्ज किए गए हैं, वो सच सच बताने के लिए बच्चियों को राज़ी करना आसान नहीं था. सच कहें तो इनके साथ रहते हुए मैं अपनी बेटी को भूल ही जाती थी. इनसे इतना लगाव हो गया था कि मन करता था छोड़ो सब, चलो मेरे घर, बस.

झुलसती गर्मी में लगातार दो महीने से ज्योति सुबह 5 बजे से रात को 11 बजे तक केस में जुटी रहती हैं. एफआईआर से लेकर चार्जशीट, बयान, सबूत और न जाने क्या क्या. खुद पर हंसते हुए कहती हैं – हम तो चालीस रुपये का खाना कहीं खा लेते थे, घर तो कई बार जा ही नहीं पाते थे, जीप में ही सो जाते थे. मुजफ्फरपुर के अखबारों में छाई हुई ज्योति कुमारी दो-चार दिन के लिए अस्पताल में भर्ती भी हो गई थी. हालांकि इसने उनके हौसले पस्त नहीं किए और फिलहाल वो इस केस से जोंक की तरह चिपककर रहती दिख रही हैं. ज्योति बार बार कहती हैं कि अगर उन्हें उनकी एसएसपी हरप्रीत कौर की तरफ से हौसला नहीं मिला होता तो वो केस में इतना आगे तक नहीं आ पाती. यह भी शायद एक संयोग ही है कि बच्चियों के इस मामले में एसएसपी से लेकर ड्राइवर तक सब महिला ही हैं.

इधर, ज्योति कुमारी से मुजफ्फरपुर में कोई भी मिलता है तो सिर्फ यही कहता है – मैडम जी आप ने तो इस केस में जी जान लगा दी.  ज्योति हमसे बात करते हुए अपनी 8 साल की बेटी को याद करती है जो दूसरे शहर से उन्हें फोन पर कहती है – ‘मम्मी तुम्हें टीवी पर देखा, तुम अच्छा काम कर रही हो, हम भी पुलिस बनेंगे. हम बहुत तेज़ दौड़ते हैं.’ ऐसा बताते हुए ज्योति एक पल के लिए शायद फिर उन बच्चियों के बीच खो जाती हैं. फिर खुद को मानो झिंझोड़ते हुए कहती हैं – ‘बाकी सबने केस के एविडेंस पकड़े, मैंने इस केस की फीलिंग पकड़ी.’

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