देश में डिजिटल इंडिया और न्यू इंडिया का राग अलापा जा रहा है, मगर बुंदेलखंड अब भी बैलगाड़ी युग में जी रहा है. इसका ताजा उदाहरण टीकमगढ़ जिले में सामने आया है, जहां दलित परिवार का हुक्का-पानी सिर्फ इसलिए बंद कर दिया गया, क्योंकि परिवार ने उस कुएं से पानी भरने की जुर्रत की, जहां से अन्य वर्ग की महिलाएं पानी भरती थीं. अब तो इस परिवार को गांव तक छोड़ना पड़ा है.

यह मामला टीकमगढ़ जिले के खरगापुर थाना क्षेत्र के सरकनपुर गांव का है, जहां दलित मुन्ना लाल वंशकार का परिवार रहता है. मुन्ना लाल के मुताबिक, उसके गांव में पानी का संकट है, लिहाजा उसके परिवार की महिलाएं उस कुएं पर पानी भरने चली गईं, जहां से अन्य वर्ग की महिलाएं पानी भरती हैं. मुन्ना लाल ने आगे बताया कि दलित महिलाओं के पानी भरने पर गांव के लोग नाराज हो गए और पंचायत बुलाकर उनका हुक्का-पानी बंद करा दिया. गांव की दुकानों से सामान नहीं खरीद सकते, कोई बात नहीं करता, चक्की वाला आटा नहीं पीसता. पंचायत ने फैसला लेकर दो साल के लिए गांव से बाहर कर दिया.

परिवार के अन्य सदस्य नाथूराम वंशकार का कहना है, “गांव के लोग छुआछूत मानते हैं, जिसके कारण हमें दो साल के लिए गांव से बाहर कर दिया गया है. गांव में खाने को कुछ मिल नहीं रहा, पानी भरने की मनाही है. हम पुलिस के पास गए, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई.” पीड़ित परिवार का कहना है कि उसने मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक कार्यालय से भी की.

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वहीं, पुलिस अधीक्षक कार्यालय के जांच अधिकारी फूल सिंह परिहार का कहना है, “गांव से मारपीट की शिकायत आई थी. पंचायत या गांव से बाहर करने का कोई मामला नहीं है.” लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि पीड़ित वंशकार परिवार के 23 सदस्य गांव नहीं जा पा रहे हैं, उनके घरों में ताले लटके हुए हैं. बुंदेलखंड के दलित परिवार की यह कहानी साफ बताती है कि देश चाहे जहां पहुंच रहा हो, नारे कुछ भी बनाए जाएं, मगर जमीनी हकीकत कब बदलेगी, किसी को नहीं पता.