जोकीहाट विधानसभा उपचुनाव में तस्लीमुद्दीन के गढ़ में आसान नहीं किसी और की इंट्री

पटना। कर्नाटक की किचकिच खत्म होने के बाद अब बिहार में जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र में जोर-आजमाइश की बारी है। जदयू विधायक सरफराज आलम के इस्तीफा देकर राजद के टिकट पर सांसद चुने जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर 28 मई को मतदान है। कुल नौ प्रत्याशी मैदान में हैं। दोनों गठबंधनों में जोरदार टक्कर के आसार हैं। तस्लीमुद्दीन के बूते अगर यहां राजद का मजबूत आधार रहा है तो पिछले चार बार से यहां जदयू का भी एकाधिकार रहा है। दो बार सरफराज तो दो बार मंजर आलम ने जदयू के लिए यह सीट जीती है। लेकिन, इस बार जदयू के लिए मुकाबला आसान नहीं दिख रहा है।जोकीहाट विधानसभा उपचुनाव में तस्लीमुद्दीन के गढ़ में आसान नहीं किसी और की इंट्री

राजद-जदयू में कड़ा मुकाबला

जोकीहाट समेत पूरे सीमांचल को राजद के पूर्व सांसद तस्लीमुद्दीन का गढ़ माना जाता था। उनके निधन के बाद राजद ने उनके छोटे पुत्र शाहनवाज आलम को प्रत्याशी बनाया है। उनके सामने जदयू प्रत्याशी मुर्शीद आलम हैं। दोनों प्रमुख प्रत्याशियों के बीच पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के गौसुल आजम मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में जुटे हैं। कोशिश तो जदयू के बागी नेता और सरफराज आलम को दो-दो बार हराने वाले मंजर आलम ने भी की थी, किंतु नामांकन के बाद ही वह पीछे हट गए। निर्दलीय प्रत्याशियों के प्रयासों ने भी घमासान को आसान नहीं रहने दिया है। टक्कर तो कड़ी होगी ही।

लंबे समय से तस्‍लीमुद्दीन परिवार का दबदबा

जोकीहाट में तस्लीमुद्दीन परिवार का प्रारंभ से ही दबदबा रहा है। 1969 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर तस्लीमुद्दीन इस क्षेत्र से विधायक बने थे। तबसे अबतक हुए कुल 13 विधानसभा चुनावों में नौ बार इस परिवार का कब्जा रहा है। पिता इस क्षेत्र से पांच बार विधायक बने तो पुत्र ने भी चार बार चमत्कार दिखाया है।

सरफराज आलम तो राजद के टिकट पर दो बार चुनाव हार भी चुके हैं, किंतु तस्लीमुद्दीन अपराजेय रहे। उन्होंने विभिन्न दलों से पांच बार किस्मत आजमायी और जीते। तीन बार दूसरे क्षेत्र से भी विधायक चुने गए। उनके सांसद चुने जाने के बाद उनके सबसे बड़े पुत्र सरफराज इस सीट से पहली बार 1996 के उपचुनाव में जनता दल के टिकट पर विधायक बने थे। जनता दल से अलग होकर लालू प्रसाद ने जब नई पार्टी (राजद) बनाई तो सरफराज दोबारा विधायक चुने गए। किंतु उसके बाद लगातार दो बार हारने पर उन्होंने अपना दल बदल लिया। 2010 में जदयू से मैदान में आए और उपचुनाव में सांसद बनने से पहले तक बरकरार रहे।

चार बार दल बदलकर जीते थे तस्लीमुद्दीन

स्‍पष्‍ट है कि इस क्षेत्र से जीतने के लिए तस्लीमुद्दीन किसी दल के मोहताज नहीं रहे। चार बार दल बदलकर वे पांच बार विधायक चुने गए। 1969 में कांग्रेस पार्टी से पहली बार विधायक बने तो अगली बार टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय भी जीतकर आ गए। 1977 में जब जनता पार्टी बनी तो तीसरी बार विधायक बने। चौथी बार 1985 में भी वह इसी पार्टी से चुने गए। 1995 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के लिए भी यह सीट जीती। किंतु, अगले ही साल सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने इसे अपने बड़े पुत्र के नाम कर दिया।

इस बार मैदान में शाहनवाज

अबकी तस्लीमुद्दीन के छोटे पुत्र शाहनवाज आलम सीट निकालने के चक्कर में हैं। टक्कर तो होगी ही, क्योंकि इस सीट पर जदयू भी चार-चार बार कब्जा जमा चुका है। इस लिहाज से जदयू इसे अपना परंपरागत क्षेत्र मान रहा है। उपचुनाव में राजद के टिकट पर सांसद बने सरफराज पिछले दो चुनावों में जदयू के टिकट पर ही विधायक बनते आ रहे थे, जो इस्तीफा देकर राजद के टिकट पर सांसद बने।

जदयू के लिए चुनौती कड़ी

तस्‍लीमुद्दीन की सीमांचल के अल्‍पसंख्‍यक वोट बैंक पर पकड़ रही। उनकी मौत के बाद उनके पुत्र ने विरासत की राजनीति संभालते हुए अररिया संसदीय सीट पर राजद के टिकट पर जीत दर्ज की। इस संसदीय सीट के अंदर शामिल जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र में सरफराज को मिले सर्वाधिक वोट को देखते हुए जदयू के लिए जंग आसान नहीं है। उसके लिए इस सीट को बचाने की बड़ी चुनौती है।

जोकीहाट में ही सरफराज को मिले थे सर्वाधिक वोट

दिलचस्प बात यह है कि अररिया लोकसभा क्षेत्र के अधीन पडऩे वाले छह विधानसभा क्षेत्रों में से जोकीहाट ही ऐसी सीट थी जिसपर सरफराज आलम को लोकसभा उपचुनाव में सबसे अधिक वोट मिले थे। अररिया विधानसभा सीट में भी उन्हें लीड मिली थी, जबकि शेष चार विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के प्रदीप सिंह आगे थे। अब इसी जोकीहाट में जदयू प्रत्याशी का मुकाबला सरफराज आलम के भाई से है।

जदयू के लिए बेहद अहम है उपचुनाव

जदयू की बात करें तो उसके लिए जोकीहाट विधानसभा उपचुनाव बेहद अहम हो गया है। यह सीट पार्टी के ही कब्जे में थी। राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) के कद्दावर नेता तस्लीमुद्दीन के गढ़ रहे इस इलाके में अल्पसंख्यक वोटों की अच्छी तादाद है। यह चुनाव जदयू के प्रति उनके रुख को भी स्पष्ट कर देगा।

इसके अलावा, महागठबंधन से नाता तोडऩे के पश्चात यह दूसरा मौका होगा जब पार्टी जनता का सामना करेगी। पिछले दिनों जहानाबाद में हुए उपचुनाव में जदयू को हार का सामना करना पड़ा था। यहां राजद व जदयू के बीच कड़ी टक्कर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।

70 फीसद अल्पसंख्यक आबादी

जदयू के लिए वैसे यह अच्छी स्थिति है कि अररिया लोकसभा क्षेत्र की छह में से चार विधानसभा सीटें अभी राजग के कब्जे में है, जबकि एक पर कांग्रेस का कब्जा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, अररिया लोकसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यक मतदाता 42.95 फीसद हैं, मगर जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र में इनकी संख्या करीब 70 फीसद है। जोकीहाट को सीमांचल क्षेत्र के अल्पसंख्यक मतदाताओं की राजनीतिक नब्ज भी माना जाता है। सीमांचल में अररिया के अलावा पूर्णिया, कटिहार एवं किशनगंज जिले आते हैं और इन जिलों में अल्पसंख्यक मतदाताओं की आबादी 40 फीसद से अधिक है।

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