उत्तराखंड में जल संचय के प्रयासों से बदल रही है गांवों की दशा

देहरादून: जल संचय और उसके संवर्धन को लेकर उत्तराखंड विकेंद्रीकृत जलागम विकास परियोजना-2, विकासनगर की ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिसके तहत वर्षा जल संचयन, जलाशय, जल स्रोतों के उपचार, पौधरोपण आदि के जरिये ग्रामीण इलाकों का कायाकल्प किया जा रहा है। जुलाई 2015 में शुरू विश्व बैंक वित्त पोषित परियोजना के तहत 43.79 करोड़ का बजट कालसी और चकराता की 55 ग्राम पंचायतों के 74 राजस्व ग्रामों में विकास कार्य के लिए दिया गया है। जिसमें जल संरक्षण और जल संवर्धनन को लेकर भी काम किया जा रहा है। उत्तराखंड में जल संचय के प्रयासों से बदल रही है गांवों की दशा

जलागम प्रभाग विकासनगर की ओर से 2021 तक चलने वाली इस परियोजना के लिए पहले तीन साल की योजनाओं की रूपरेखा तैयार की गई है। जिसके तहत गांवों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग टैंक, सिंचाई टैंक, ट्रेंचेज, रिचार्ज पिट, वनीकरण, जलाशय, जलस्रोतों के पुनरुद्धार का काम किया जा रहा है। उप परियोजना निदेशक पीएन शुक्ल ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत द्वारा जरूरतमंदों का चुनाव किया जाता है। 

उसके बाद व्यक्तिगत रूप से ग्रामीणों की छतों पर 1500 लीटर क्षमता के रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का निर्माण किया जाता है। इसी के साथ गांवों में सभी के लिए 2500 लीटर क्षमता के सिंचाई टैंक भी बनाए गए हैं। इस संचित जल का उपयोग खेती, पशुओं के पीने, स्नान समेत लोग अपने दैनिक कार्यों आदि के लिए करते हैं। बताया कि इसके अलावा जल संवर्धन के लिए वनीकरण का काम भी किया जा रहा है।उनका कहना है कि जल संचय और संरक्षण के इस प्रयास के फलस्वरूप जलस्रोतों के डिस्चार्ज में 15 से 20 प्रतिशत का सुधार हुआ है। जिसकी रिपोर्ट वेब कॉस्ट संस्था द्वारा जल्द ही जलागम को सौंप दी जाएगी। 

जुलाई 2018 से अब तक हुए काम का विवरण 

योजना,                      कार्य,   निर्धारित लक्ष्य   

रेन वाटर हार्वेस्टिंग       330     777 

सिंचाई टैंक,                 132     327 

रिचार्ज पिट                 1620   3713 

ट्रेंचेज                          685    27798 

चाल-खाल                   16        492 

जलाशय                      9          90 

गांवों में खेती को मिली ‘संजीवनी’ 

जल संचय के इन प्रयासों से मलेथा, दुणवा, दिलऊ, सैंज, टिमरा, आरा, टिपऊ, खोई आदि गांवों में नकदी फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। इसी के साथ ग्रामीण गोभी, टमाटर, बीन्स आदि सब्जियों का उत्पादन कर आर्थिक रूप से भी मजबूत हो रहे हैं। 

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