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	<title>धर्म &#060; Ujjawal Prabhat | उज्जवल प्रभात</title>
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	<title>धर्म &#060; Ujjawal Prabhat | उज्जवल प्रभात</title>
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		<title>बजरंगबली के हाथ में वज्र और ध्वजा क्यों? हनुमान चालीसा की इस चौपाई से समझें इसका रहस्य </title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 04:48:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[हनुमान चालीसा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1011" height="576" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg 1011w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4-768x438.jpg 768w" sizes="(max-width: 1011px) 100vw, 1011px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%ac%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%94/">बजरंगबली के हाथ में वज्र और ध्वजा क्यों? हनुमान चालीसा की इस चौपाई से समझें इसका रहस्य </a></p>
<p>हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा को सबसे लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक माना जाता है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से हर प्रकार का अज्ञात भय, असुरक्षा और मृत्यु का डर दूर होता है। साथ ही हनुमान जी की कृपा &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा को सबसे लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक माना जाता है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से हर प्रकार का अज्ञात भय, असुरक्षा और मृत्यु का डर दूर होता है। साथ ही हनुमान जी की कृपा से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे तो हनुमान चालीसा की सभी चौपाइयों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन एक ऐसी चौपाई है जिससे यह संदेश मिलता है कि अपार शक्ति होने के बावजूद मनुष्य के भीतर ज्ञान और पवित्रता का होना ही उसे महान बनाता है। इस बात को जानकर आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि आखिर वह कौन-सी चौपाई है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको विस्तार से उस चौपाई और उसके हिंदी अर्थ के बारे में बताते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हाथ बज्र और ध्वजा विराजे।<br />कांधे मूंज जनेऊ साजै॥</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">हनुमान चालीसा की इस चौपाई का हिंदी अर्थ है कि बजरंगबली के एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में ध्वजा सुशोभित है। वहीं, उनके कंधे पर मूंज (एक प्रकार की पवित्र घास) से बना हुआ जनेऊ सजा हुआ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शब्दों के अनुसार अर्थ<br /></strong>हाथ- हाथों में<br />बज्र- वज्र (शक्तिशाली अस्त्र)<br />ध्वजा- पताका<br />विराजे- सुशोभित है<br />कांधे- कंधे पर<br />मूंज- एक प्रकार की पवित्र घास<br />जनेऊ- यज्ञोपवीत<br />साजै- सजा हुआ है</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चौपाई का महत्व<br /></strong>आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस चौपाई में हनुमान जी की शक्ति, भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। हनुमान जी के हाथ में वज्र बुराई और संकटों के नाश का प्रतीक है। इस चौपाई में बताया गया है कि प्रभु बेहद शक्तिशाली हैं, जो अपने भक्तों और धर्म की रक्षा के लिए कठोर से कठोर प्रहार कर सकते हैं। कंधे पर जनेऊ धारण करना यह दर्शाता है कि बजरंगबली सिर्फ एक योद्धा ही नहीं हैं, बल्कि वेदों के ज्ञाता, परम विद्वान और अखण्ड ब्रह्मचारी भी हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यता के अनुसार, मंगलवार या शनिवार के दिन हनुमान चालीसा की इस चौपाई का पाठ करने से व्यक्ति के मन का हर प्रकार का डर दूर होता है और सुख-समृद्धि व आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इसके अलावा, किसी नए काम की शुरुआत करने या परीक्षा से पहले इस चौपाई का पाठ करने से कार्यों में निश्चित सफलता प्राप्त होती है।</p>
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		<title>मन की अशांति और दुखों से छुटकारा दिलाएगी अष्टावक्र गीता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 04:44:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[फीचर]]></category>
		<category><![CDATA[अष्टावक्र गीता]]></category>
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<p>जीवन में कई बार मन अशांत हो जाता है और छोटी-छोटी बातें भी बड़ा दुख दे जाती हैं। भागदौड़, इच्छाएं, रिश्तों में उलझन और खुद से उम्मीदें हमें भीतर से थका देती हैं। ऐसे समय में बाहर की दुनिया को बदलना हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी सोच को समझना और संभालना जरूर संभव &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">जीवन में कई बार मन अशांत हो जाता है और छोटी-छोटी बातें भी बड़ा दुख दे जाती हैं। भागदौड़, इच्छाएं, रिश्तों में उलझन और खुद से उम्मीदें हमें भीतर से थका देती हैं। ऐसे समय में बाहर की दुनिया को बदलना हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी सोच को समझना और संभालना जरूर संभव है। अष्टावक्र गीता इसी यात्रा का मार्ग दिखाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तो चलिए आज हम अष्टावक्र गीता की 5 ऐसी अनमोल सीखों के बारे में जानेंगे, जो बुरी बात को भी अच्छे में बदलने का नजरिया देती हैं और मन को शांति की ओर ले जाती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>तुम शरीर नहीं, बल्कि उसे देखने वाली चेतना हो<br /></strong>अष्टावक्र गीता हमें सिखाती है कि हम केवल अपना शरीर या मन नहीं हैं। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है और मन में हर पल नए विचार आते-जाते रहते हैं। कभी खुशी होती है, तो कभी दुख। कभी मन शांत रहता है, तो कभी बेचैन हो जाता है। लेकिन इन सभी अनुभवों को देखने वाला हमारे भीतर मौजूद रहता है। जब हम खुद को अपने विचारों और भावनाओं से अलग समझने लगते हैं, तो उनके कारण होने वाली परेशानी कम हो सकती है। इसलिए जब मन में गुस्सा, डर या दुख आए, तो तुरंत उसमें उलझने के बजाय उसे समझने की कोशिश करें। याद रखें, विचार आपके भीतर आते हैं, लेकिन हर विचार आपकी पहचान नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सुख और दुख का संबंध हमारी सोच से है<br /></strong>हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हमारी इच्छाएं पूरी हो जाएं, लोग हमारी बात मान लें और जीवन हमारी उम्मीदों के अनुसार चले, तो हम हमेशा खुश रहेंगे। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इसी तरह, जब परिस्थितियां हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं होतीं, तो मन दुखी हो जाता है। अष्टावक्र गीता हमें अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं को समझने की प्रेरणा देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में कुछ चाहना गलत है, बल्कि अपनी खुशी को हर इच्छा की पूर्ति पर निर्भर नहीं बनाना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>जीवन से भागें नहीं<br /></strong>अक्सर हम अपने रिश्तों, धन, सफलता और लोगों की राय से इतना जुड़ जाते हैं कि उन्हें खोने का डर हमें परेशान करने लगता है। हम चाहते हैं कि हर व्यक्ति हमारे अनुसार व्यवहार करे और जीवन हमेशा हमारी इच्छा के मुताबिक चले। लेकिन संसार में बदलाव लगातार होता रहता है। अष्टावक्र गीता का संदेश है कि किसी भी चीज से अत्यधिक लगाव हमें मानसिक बंधन में डाल सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अहंकार छोड़ें और मन को हल्का बनाएं<br /></strong>हमारे दुखों का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम हर समय खुद को सही साबित करना चाहते हैं। कोई हमारी आलोचना कर दे, हमारी बात न माने या हमें सम्मान न दे, तो मन में गुस्सा पैदा होने लगता है। हम बार-बार उसी घटना के बारे में सोचते रहते हैं और अपनी शांति खो देते हैं। अष्टावक्र गीता हमें अहंकार से ऊपर उठने का संदेश देती है। जब हम हर बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना छोड़ देते हैं, तब जीवन सरल होने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अपना सम्मान छोड़ दें, बल्कि यह समझें कि हर बहस जीतना जरूरी नहीं और हर व्यक्ति से प्रशंसा पाना भी आवश्यक नहीं है। कभी-कभी चुप रहना, गलती स्वीकार करना और दूसरों को समझना ही मन की सच्ची शांति है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शांति बाहर नहीं, अपने भीतर खोजें<br /></strong>हम अक्सर सोचते हैं कि जब हमें अच्छी नौकरी, अधिक पैसा, सफलता और लोगों का प्यार मिलेगा, तभी जीवन में शांति आएगी। लेकिन बाहरी उपलब्धियां मिलने के बाद भी मन में खालीपन रह सकता है। अष्टावक्र गीता का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए स्वयं को केवल अपनी उपलब्धियों, असफलताओं और सामाजिक पहचान तक सीमित न समझें। आप अपनी गलतियों से कहीं अधिक हैं और आपकी कीमत केवल इस बात से तय नहीं होती कि दुनिया आपको किस नजर से देखती है। कुछ समय शांत बैठें, अपने विचारों को देखें और वर्तमान क्षण को स्वीकार करना सीखें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अत: मन की शांति पाने के लिए हर बार दुनिया को बदलना जरूरी नहीं है। कई बार अपनी सोच, इच्छाओं, आसक्ति और अहंकार को समझना ही बदलाव की शुरुआत बन जाता है। जब हम विचारों को बिना उलझे देखना, परिस्थितियों को स्वीकार करना और अपने भीतर झांकना सीखते हैं, तब दुखों का प्रभाव कम होने लगता है।</p>
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		<title>मां कात्यायनी की पूजा आज, देखें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 04:35:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[मां कात्यायनी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="557" height="472" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/4-13.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%a6/">मां कात्यायनी की पूजा आज, देखें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि</a></p>
<p>शारदीय नवरात्र 2026 (Shardiya Navratri 2026) का छठा दिन शुक्रवार, 16 अक्टूबर यानी आज है, जो मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित है। मां कात्यायनी जो देवी दुर्गा के युद्ध रूप के लिए जानी जाती हैं। इन्हें साहस, रक्षा, दृढ़ संकल्प और बाधाओं से मुक्ति पाने का प्रतीक माना जाता है। भक्त &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="557" height="472" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/4-13.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%a6/">मां कात्यायनी की पूजा आज, देखें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि</a></p>

<p class="wp-block-paragraph">शारदीय नवरात्र 2026 (Shardiya Navratri 2026) का छठा दिन शुक्रवार, 16 अक्टूबर यानी आज है, जो मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित है। मां कात्यायनी जो देवी दुर्गा के युद्ध रूप के लिए जानी जाती हैं। इन्हें साहस, रक्षा, दृढ़ संकल्प और बाधाओं से मुक्ति पाने का प्रतीक माना जाता है। भक्त मां कात्यायनी की पूजा से शक्ति, आत्मविश्वास, समृद्धि और सुखमय जीवन की कामना करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">नवरात्र के छठे दिन भक्त मां कात्यायनी की पूजा करते हैं, उनके पवित्र मंत्रों का जाप करते हैं और पारंपरिक भोग को अर्पित करते हैं। इस दिन हरां रंग काफी महत्व रखता है। विवाह की इच्छा रखने वाले लोग भी मां कात्यायनी की पूजा करते हैं। आइए जानते हैं 16 अक्टूबर, 2026 को होने वाली मां कात्यायनी की पूजा विधि, मंत्र, भोग, रंग, कथा और धार्मिक महत्व के बारे में।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>शारदीय नवरात्र 2026 छठा दिन तिथि, देवी और रंग<br /></strong>दिनांक- शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026<br />नवरात्र दिवस- छठा दिन<br />देवी की आराधना- मां कात्यायनी<br />छठे नवरात्र का रंग- हरा<br />परंपरागत भोग- शहद</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मां कात्यायनी कौन हैं?<br /></strong>मां कात्यायनी को देवी दुर्गा का एक शक्तिशाली रूप माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक, उन्होंने राक्षस महिषासुर को हराने और अच्छाई और बुराई के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए अवतार लिया था। उनकी पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">देवी कात्यायनी का नाम ऋषि कात्यायन के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने प्रचलित कथा के मुताबिक दिव्य स्त्री शक्ति को जागृत करने के लिए तपस्या की थी। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थनाओं के परिणाम स्वरूप देवी दुर्गा ने मां कात्यायनी का रूप धारण किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मां कात्यायनी का वाहन शेर है और उन्होंने अपने हाथ में तलवार धारण कर रखा है। मां दुर्गा को साहस, रक्षा और बुराई के नाश का प्रतीक माना जाता है। उनका दिव्य रूप भक्तों को याद दिलाता है कि शक्ति के साथ दृढ़ संकल्प होना ही चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मां कात्यायनी पूजा विधि<br /></strong>भक्त बड़ी ही सरलता के साथ मां कात्यायनी की पूजा कर सकते हैं। यह पूजा कृतज्ञता जाहिर करने, सुरक्षा की कामना करने और आस्था क मजबूत करने का मौका प्रदान करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस दिन सुबह जल्दी उठकर पूजा स्थल को साफ करें और देवी की तस्वीर या मूर्ति तैयार करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घटस्थापना के दौरान स्थापित कलश की अपने घर की परंपराओं का पालन करते हुए पूजा-अर्चना करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस दिन उचित सुरक्षा सावधानियों का पालन करते हुए देवी के सामने एक दीपक और अगरबत्ती जरूर जलाएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अपनी परंपराओं के मुताबिक ताजे फूल, चावल के दाने, कुमकुम और चंदन अर्पित करनी चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भोग के रूप में मां कात्यायनी को शहद अर्पित करनी चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके अलावा देवी कात्यायनी से जुड़े मंत्रों का जाप भी विशेष लाभ दिला सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नवरात्र छठे दिन मां कात्यायनी से जुड़े मंत्र<br /></strong>मां कात्यायनी नाम मंत्र<br />ऊं देवी कात्यायन्यै नमः॥</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मां कात्यायनी ध्यान मंत्र<br /></strong>चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।<br />कात्यायनी शुभं दद्यद् देवी दानवघातिनी॥</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मां कात्यायनी को भोग में क्या चढ़ाएं?<br /></strong>नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी को भोग के रूप में शहद जरूर चढ़ाना चाहिए। भक्त इसे अपनी प्रार्थना के हिस्से के रूप में अर्पित करते हैं और देवी से सद्भाव, शक्ति और कल्याण के लिए आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसके अलावा फल, मिठाई या मेवे भी मां कात्यायनी को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>नवरात्र के छठे दिन हरे रंग का महत्व<br /></strong>इस साल नवरात्र का छठा दिन 16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार के दिन पड़ रहा है। नवरात्र की प्रचलित रंग परंपराओं में हरा रंग विकास, नवजीवन, सद्भाव और समृद्धि प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा के दौरान हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मां कात्यायनी की पौराणिक कथा<br /></strong>एक प्रसिद्ध हिंदू कथा के मुताबिक, देवता महिषासुर की बढ़ती शक्तियों से चिंतिति होकर अपनी दिव्य शक्तियों से मां दुर्गा की रचना की। एक अन्य प्रचलित परंपरा के मुताबिक, ऋषि कात्यायन ने देवी को खुश करने के लिए तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने उनकी पुत्री के रूप में अवतार लिया और देवी कात्यायनी के नाम से जानी गईं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">मां ने दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित होकर सिंह पर सवार महिषासुर से युद्ध किया। मां कात्यायनी ने महिषासुर के अहंकार, अन्याय और विनाशकारी शक्तियों को उसी के साथ खत्म कर दिया। नवरात्र के दौरान मां कात्यायनी की कथा साहस और आस्था को प्रेरित करने के लिए पढ़ी और सुनी जाती है।</p>
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		<title>शरद पूर्णिमा पर 16 कलाओं से पूर्ण क्यों होता है चंद्रमा?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 04:32:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="934" height="479" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg 934w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2-768x394.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 934px) 100vw, 934px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a4%a6-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-16-%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa/">शरद पूर्णिमा पर 16 कलाओं से पूर्ण क्यों होता है चंद्रमा?</a></p>
<p>हिंदू धर्म में आश्विन माह की शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) का विशेष महत्व है। इसे वर्ष की सबसे पवित्र और शुभ पूर्णिमा माना जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। इस दिन देवी लक्ष्मी की साधना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और धन लाभ के &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph">हिंदू धर्म में आश्विन माह की शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) का विशेष महत्व है। इसे वर्ष की सबसे पवित्र और शुभ पूर्णिमा माना जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। इस दिन देवी लक्ष्मी की साधना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और धन लाभ के योग बनते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और अमृत की वर्षा होती है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे खीर रखी जाती है और सुबह उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इससे व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से क्यों परिपूर्ण रहता है और इसका क्या धार्मिक महत्व है? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चंद्रमा की 16 कलाओं का महत्व<br /></strong>धार्मिक मान्यता है कि पूरे वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा की रात ही चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे करीब होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चंद्रमा की 16 कलाएं उसकी 16 अलग-अलग अवस्थाओं को दर्शाती हैं। जिस तरह से सूर्य से 7 तरह की किरणें निकलती हैं, उसी तरह से चंद्रमा से भी 16 अलग-अलग तरह की किरणें निकलती हैं। इन्हीं 16 किरणों को चंद्रमा की 16 कलाएं कहा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">भगवान श्रीराम 12 कलाओं से युक्त थे और श्रीकृष्ण को भी 16 कलाओं का पूर्ण अवतार माना गया है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणें व्यक्ति के मानसिक तनाव और क्रोध को कम करती हैं। इस रात जागरण और पूजा-पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही मन एकाग्र होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>चंद्रमा की 16 कलाओं के नाम<br /></strong>अमृता<br />मनदा (विचार)<br />पुष्प (सौंदर्य)<br />पुष्टि (स्वस्थता)<br />तुष्टि (इच्छापूर्ति)<br />ध्रुति (विद्या)<br />शाशनी (तेज)<br />चंद्रिका (शांति)<br />धरा<br />कांति (कीर्ति)<br />ज्योत्सना (प्रकाश)<br />श्री (धन)<br />प्रीति (प्रेम)<br />अंगदा (स्थायित्व)<br />पूर्ण (पूर्णता अर्थात कर्मशीलता)<br />पूर्णामृत (सुख)</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कब है शरद पूर्णिमा 2026<br /></strong>शरद पूर्णिमा की तिथि की शुरुआत- 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट<br />शरद पूर्णिमा की तिथि का समापन- 26 अक्टूबर को सुबह 09 बजकर 41 मिनट<br />वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी।</p>
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		<title>दशहरे पर &#8216;नीलकंठ&#8217; पक्षी का दिखना क्यों माना जाता है शुभ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[PMC Data]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 04:27:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[फीचर]]></category>
		<category><![CDATA[नीलकंठ]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1062" height="664" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6.jpg 1062w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6-768x480.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1062px) 100vw, 1062px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a0-%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6/">दशहरे पर &#8216;नीलकंठ&#8217; पक्षी का दिखना क्यों माना जाता है शुभ?</a></p>
<p>इस साल शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) 11 अक्तूबर 2026, रविवार से शुरू हो चुकी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा को समर्पित इस 9 दिवसीय पर्व का समापन 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के मौके पर होगा। पंचांग के हिसाब से हर वर्ष अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि &#8230;</p>
<p>आप पढ़ रहे हैं : UjjawalPrabhat.Com</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="1062" height="664" src="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6.jpg 1062w, https://ujjawalprabhat.com/wp-content/uploads/2026/10/12-6-768x480.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1062px) 100vw, 1062px" /><p><a href="https://ujjawalprabhat.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a0-%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6/">दशहरे पर &#8216;नीलकंठ&#8217; पक्षी का दिखना क्यों माना जाता है शुभ?</a></p>

<p class="wp-block-paragraph">इस साल शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) 11 अक्तूबर 2026, रविवार से शुरू हो चुकी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा को समर्पित इस 9 दिवसीय पर्व का समापन 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के मौके पर होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पंचांग के हिसाब से हर वर्ष अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा (Dussehra 2026) का पर्व मनाया जाता है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण का वध किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दशहरा पर नीलकंठ पक्षी देखने का महत्व<br /></strong>दशहरा को लेकर हिंदू मान्यता है कि इस दिन एक खास पक्षी के दर्शन होना अत्यंत शुभ माना गया है। इस पक्षी का नाम &#8216;नीलकंठ&#8217; है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यता है कि इस पक्षी को भगवान शिव से जुड़ा माना जाता है। हिंदू धर्म में नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना अत्यंत शुभ माना गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दशहरे पर नीलकंठ पक्षी देखना क्यों माना जाता है शुभ?<br /></strong>एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना भाग्यशाली और विजय का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे मुख्य धार्मिक मान्यताएं इस प्रकार हैं-</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>श्रीराम और रावण विजय की कथा<br /></strong>पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण पर विजय पाने के लिए भगवान श्रीराम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसके पश्चात ही उन्हें रावण पर विजय प्राप्त हुई थी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>भगवान शिव का स्वरूप<br /></strong>नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का प्रतिनिधि या स्वरूप माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब शिवजी ने विषपान किया था, तब उनका कंठ नीला हो गया था और वे &#8216;नीलकंठ&#8217; कहलाए थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>पाप मुक्ति और सफलता<br /></strong>माना जाता है कि दशहरे के दिन इस पक्षी के दर्शन करने से वर्षभर के पाप नष्ट होते हैं और कार्यक्षेत्र में सफलता व प्रगति मिलती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्रचलित पौराणिक कथा क्या कहती है?<br /></strong>पौराणिक कथा के मुताबिक, दशहरे के मौके पर अगर नीलकंठ पक्षी के दर्शन हो जाए तो समझिए आपके सभी पाप मिट जाते हैं। दशहरे के दिन इस पक्षी को देखना किसी वरदान से कम नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस पक्षी के दर्शन से जीवन में सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक, जब भगवान राम ने रावण का अंत किया था, तो उनपर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा था।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसी दौरान भगवान शिव ने नीलकंठ पक्षी का रूप लिया था। कहा जाता है कि जब भगवान राम ने नीलकंठ पक्षी को देखा तो उनके सभी पाप खत्म हो गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">तभी से लेकर आज तक यह माना जाता है कि दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि अगर ये पक्षी आपको नहीं दिखे तो आप तस्वीर देखकर भी आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।</p>
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