जगुआर प्लेन हादसा: लखनऊ के इस बेटे की मौत, कर्नल पिता को शहादत पर गर्व

लखनऊ। सेना की गौरवशाली परंपरा को पिता से लेकर बेटे ने आगे बढ़ाया। पिता कर्नल एनएस चौहान भारतीय सेना की सिग्नल रेजीमेंट में तैनात थे, जबकि जांबाज बेटा भारतीय वायुसेना में उच्च कोटि का फाइटर पायलट। पिता को अपने एकलौते बेटे की शहादत पर गर्व है। जगुआर प्लेन हादसा: लखनऊ के इस बेटे की मौत, कर्नल पिता को शहादत पर गर्व

एयर कमोडोर संजय चौहान का जन्म दिल्ली में हुआ था। पिता सेना में अधिकारी थे, लिहाजा उनकी पढ़ाई देश के अलग अलग हिस्सों में हुई। सबसे अधिक सात साल तक की पढ़ाई उन्होंने मेरठ से की और फिर 1986 में वह एनडीए में शामिल हो गए। एयर कमोडोर तीन बहनों के बीच अकेले भाई थे। संजय चौहान का एक ही बेटा यशवीर सिंह चौहान है। वह भी एमटेक की पढ़ाई करने के लिए इसी महीने अमेरिका जा रहा है। लखनऊ के इंदिरानगर स्थित घर पर पिता कर्नल एनएस चौहान के साथ मां सरला चौहान रहती हैं।

पत्नी अंजलि सिंह बेटे के साथ इन दिनों जामनगर में ही रहती थीं। पिता कर्नल एनएस चौहान ने बताया कि संजय एक दिन के लिए अकेले ही उनसे मिलने के लिए लखनऊ आया था। वह रविवार को जामनगर वापस रवाना हुआ था। आखिरी बार सोमवार को उससे फोन पर बात हुई। घरवालों के बारे में हालचाल लिया। एयर कमोडोर संजय चौहान का अंतिम संस्कार जामनगर में ही गुरुवार को होगा। पिता कर्नल एनएस चौहान और मां सरला वहां पहुंच चुकी हैं। उनकी अमेरिका में रह रहीं दोनों बहनें भी आ रही हैं।

कई जान बचाने के लिए दी खुद की शहादत : लखनऊ के एक और वीर सपूत ने अपनी जांबाजी से न केवल कई जान बचायी, बल्कि वह खुद ही न्यौछावर हो गए। जामनगर से लड़ाकू विमान जगुआर में आयी गड़बड़ी के बाद भी वह अपनी जान बचाने के लिए उससे नहीं कूदे। विमान को खाली भूमि पर उतारने की कोशिश की और अंत तक वह स्थितियों से लड़ते रहे। एयर कमोडोर संजय चौहान कई जान को बचाते हुए शहीद हो गए।

एयर कमोडोर ने 16 दिसंबर 1989 में भारतीय वायुसेना में कमीशंड प्राप्त किया था। उनके पिता कर्नल एनएस चौहान भी एक सैन्य अधिकारी थे। वह एक योग्य फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी थे। एयर कमोडोर को उनके करियर में 3800 घंटों की लड़ाकू विमान के उड़ान का अनुभव हासिल था। एयर कमोडोर संजय चौहान भारतीय वायुसेना के योग्य अधिकारियों में से एक थे। लड़ाकू पायलट के रूप में उनकी क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह टेस्ट पायलट स्कूल के कमांडिंग अधिकारी भी रह चुके थे।

उन्होंने एक फाइटर स्क्वाड्रन को भी कमान किया था। उनकी बहादुरी और योग्यता को देखते हुए ही वर्ष 2010 में उनको वायुसेना मेडल प्रदान किया गया था। एयर कमोडोर संजय चौहान को भारतीय वायुसेना के 17 विमानों को उड़ाने का अनुभव था। वह हर विमान पर अपना शानदार नियंत्रण रखते थे। अपने करियर में उन्होंने मिग 21, हंटर, जगुआर, एचपीटी-32, किरन, एवीआरओ-748 और एएन-32 से भी उड़ान भरी थी।

राफेल की भी की थी टेस्टिंग : एयर कमोडोर संजय चौहान ने कई देशों में जाकर वहां के लड़ाकू विमानों की टेस्टिंग भी की थी। जिससे भारतीय वायुसेना को आधुनिक लड़ाकू विमान मिल सके। इन दिनों जिस राफेल विमान को फ्रांस से लेने की कार्रवाई चल रही है, उसे भी एयर कमोडोर संजय चौहान ने उड़ाया था। इसके अलावा उन्होंने मध्यम मल्टी रोल लड़ाकू विमान ग्रिपन और यूरो फाइटर से भी उड़ान भरी थी।

जामनगर में एक और सपूत की शहादत : जिस जामनगर में मंगलवार को एयर कमोडोर संजय चौहान शहीद हो गए, उसी जगह पर 30 अगस्त 2010 को दो एमआइ-17 हेलीकाप्टर आपस में टकरा गए थे। इस हादसे में लखनऊ के एक जांबाज की मौत हो गयी थी।

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