#coronavirus : अभी भी लोग नहीं जानते हैं सोशल डिस्टेंसिंग जैसे शब्दों के मायने

ओम दत्त

कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी को कोविड-19 इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह वायरस साल 2019 में शुरू हुआ था इसीलिए इसमें 19 जोड़ा गया। देश में कोरोनावायरस महामारी के चलते 21 दिनों का लॉकडाउन हो चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 130 करोड़ की आबादी वाले भारत के लिए 21 दिनों का लॉकडाउन का फैसला बहुत ही संवेदनशील है ।
लॉकडाउन के बाद झुण्ड की शक्ल में अपने घरों को जाने की जुगत में, राशन, सब्जी फल और दवा की दुकानों पर उमड़ी भीड़ (जिसमें पढ़े लिखों के साथ सामान्य लोग भी शामिल ) जो बेखौफ होकर पहले लेने की होड़ में एक दूसरे पर गिरी जा रही थी, उसे देख कर बरबस ख्याल आया कि ये लोग सोशल डिस्टेंसिंग, लॉकडाउन, आइसोलेशन, क्वारंटाइन जैसे बहु प्रचलित शब्दों(टर्म) से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हैं।

कुछ पढ़े लिखे लोंगों से बात करने पर भी पता चला कि ये शब्द हमेशा सुनते हुये रट गये हैं, लेकिन सामान्य लोग जो बीमार नहीं हैं उनके लिये इसका क्या मतलब है। बेवजह लॉकडाउन करके उनको परेशानी में डाल दिया गया है।
रसोई में मसाले भूनने की छींक से भी डरने और संक्रमण न फैले इस लिये बाई और डेली अखबार के घर में प्रवेश निषिद्ध करने वाले लोग, जब लॉकडाउन,सोशल डिस्टेंस,आइसोलेशन,क्वॉरेंटाइन का मतलब भी ठीक से नहीं जानते, वह प्रशासन के दबाव में भले ही या फिर बीमारी लगने के डर से लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं, लेकिन कोरोना वायरस की भयावहता इन शब्दों की पूरी समझ होते ही हो जायेगी और फिर बचाव सारे उपाय पूरी तरह अमल में होंगे ।
तो जानिये कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिये प्रयोग किये जाने वाले इन शब्दों के मायने ,विस्तार से-
1 लॉकडाउन
लॉकडाउन एक इमरजेंसी प्रोटोकाल होता है जिसके तहत लोगों को अपने इलाके को छोड़ने से रोका जाता है। मतलब होता है जो जहां पर है वही रहे, अगर कोई बीच रास्ते में फंस गया है तो उसे सुरक्षित स्थान पर भेजा जाता है। इसका मकसद होता है कि वायरस का संक्रमण किसी दूसरी जगह न जाने पाये और जहां भी वायरस है उसका आसानी से पता चल जाय।

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लॉकडाउन  में किसी को भी घर से निकलने की इजाजत नहीं होती है । इसमें गैर जरुरी उत्पादों की दुकानें बन्द रखने को कहा जाता है, केवल इमरजेंसी सेवाओं, अस्पताल, दवा, बैंक, राशन पानी जैसी जरूरी सेवाओं के लिए ही बाहर निकालने की अनुमति दी जाती है, लेकिन बाहर निकलने पर इनमें भी सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखना होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार बाहर टहलने ,बाहर एक्सरसाइज करने से परहेज करना चाहिए जहां तक संभव हो अपने घर में रह कर एक्सरसाइज करते रहें और तरह तरह के मनोरंजन भी करते रहें जिससे कि आप अवसाद में न जाएं और इन क्षणों का आप खुशी से उपभोग कर सकें।
2 सोशल डिस्टेंसिंग
‘एक दूसरे से 6 फीट की दूरी रखना ‘यही है सोशल डिस्टेंसिंग। वेंडर विट विश्वविद्यालय के संक्रमण रोग विशेषज्ञ डॉक्टर विलियम शैफनर ने बताया है कि बिना कफ और खांसी के भी हम जो सांस छोड़ते हैं , उसमें हमें तीन से 6 फीट की दूरी पर होना चाहिए, इस दूरी को ही “ब्रीडिंग जोन”कहते हैं।

डॉ विलियम शैफनर ने पाया कि हम जो सांस छोड़ते हैं वह कमरे में पहले से मैजूद हवा में मिल जाती है और 3 से 6 फीट की दूरी पर सांस लेने वाले व्यक्ति की सांस में मिलकर इन्हेल हो जाती है और यदि उस सांस में वायरस है तो कुछ सूक्ष्म वायरस से मिली हुई है हवा हम अपने अंदर इन्हेल करते हैं जिससे संक्रमण का खतरा रहता है।इसीलिए सोशल डिस्टेंसिंग में 6 फीट की कम से कम दूरी रखने की बात कही जा रही है।
सोशल डिस्टेंसिंग में 6 फीट की दूरी रखने के लिये 6 सीटर डायनिंग टेबल,दरवाजे की लम्बाई या फिर थ्री सीटर सोफे की लम्बाई को देखकर आसानी से दूरी का अन्दाजा लगाया जा सकता है।
3 क्वॉरेंटाइन
क्वॉरेंटाइन लैटिन मूल का शब्द है, इसका अर्थ होता है “चालीस”।  पुराने समय में बाहर से आये जहाजों में किसी यात्री को संक्रमण होने की आशंका होती थी या जहाज में संक्रमण होता था ,तो उस जहाज को 40 दिन के लिए अलग ठहरना पड़ता था। विदेश से आने वाले सभी जहाजों की क्वॉरेंटाइन संबंधी जांच होती थी।

“मेडिसिन नेट” वेबसाइट के अनुसार मेडिकल साइंस में क्वॉरेंटाइन का अर्थ होता है संक्रामक बीमारी से बचाने के लिए कुछ वक्त अलग रखना।क्वॉरेंटाइन (संगरोध) उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है जो विदेश या किसी अन्य ऐसे क्षेत्र से आए होते हैं जहां वायरस का संक्रमण हुआ हो ऐसे लोगों को 14 दिन के लिए क्वॉरेंटाइन कर दिया जाता है।
कोरोना वायरस के फैलने से रोकने में “होम क्वॉरेंटाइन” एक कारगर उपाय साबित हुआ है ।ऐसे लोग यदि सर्दी जुकाम से भी ग्रसित हैं तो उन्हें एक ऐसे कमरे में रख दिया जाता है जिसमें अलग से शौचालय भी हो जिसका केवल वही प्रयोग कर सकें,सर्जिकल मास्क लगाकर रहें, घर के किसी भी उपकरण को स्पर्श न करें , घर के बुजुर्ग, गर्भवती महिलाओं व बच्चों से उन्हें दूर रहना होता है। 14 दिन के होम क्वॉरेंटाइन में यदि कोरोना के लक्षण दिखते हैं तो तुरंत स्वास्थ्य विभाग हरकत में आता है।
4 आइसोलेशन (एकांत में रहना)
यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है जो वास्तव में कोरोना वायरस से संक्रमित हैं या फिर उनमें संक्रमण का अंदेशा है । वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए ऐसे लोगों को अलग करके आइसोलेट किया जाता है ,इसी प्रक्रिया को आइसोलेशन कहते।  संक्रमण के गंभीर शिकार लोगों को हॉस्पिटलाइज कर दिया जाता है और उन्हें आइसोलेशन यूनिट में रखा जाता है ।

कुछ लोग जिनमें वायरस के संक्रमण का संदेह होता है और लक्षण नहीं दिखता है या फिर माइल्ड लक्षण होते हैं उन्हें घर में ही रहने का विकल्प दे दिया जाता है ,लेकिन उन्हें चेतावनी दी जाती है कि वह सेल्फ आइसोलेशन में रहते हुए अलग कमरे में रहें, अलग बाथरूम का इस्तेमाल करें ,घर के किसी सदस्य से ना मिले और सर्जिकल मास्क अपने चेहरे पर हमेशा लगाए रखें। यदि उनमें करोना के लक्षण दिखते हैं तो तत्काल उन्हें स्वास्थ विभाग से संपर्क करने के लिए कह दिया जाता है।
4 हर्ड इम्यूनिटी
हर्ड का मतलब होता है “झुंड या समूह”। जब एक साथ कई लोगों का झुंड संक्रामक बीमारी से इम्यून हो जाता है तो उसे हर्ड इम्यूनिटी कहा जाता है। कोरोना वायरस के लिए भी यही माना जा रहा है कि एक बार कई लोग इससे संक्रमित हो कर ठीक हो गए तो यह वायरस आगे फैलेगा नहीं,क्योंकि इससे कई लोग इम्यून हो चुके होंगे। इसके लिए दो विधियां कारगर मानी जाती हैं।

वायरस का प्रभाव खत्म करने के लिये वैक्सीन बनाने की जरूरत पड़ती है, जिससे लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है।
 जब बड़ी संख्या में लोग वायरस से इनफेक्ट होने के बाद ठीक हो जाएंगे तो उनका शरीर प्रतिरोधक क्षमता से पूर्ण होगा जिससे वह वायरस को आगे फैलने से रोक देगा,और तब संक्रमण समाप्त होने लग जायेगा।

(लेखक जुबिली पोस्ट मीडिया वेंचर में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं) 

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