महाराष्ट्र में 2004 का इतिहास दोहराना चाहती हैं कांग्रेस

मुंबई। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भले ही करारी हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन उसने सूबे में सत्ता पाने की उम्मीद नहीं छोड़ी है। वह 2004 की भांति जनतादल (एस) को साथ लेकर सत्ता की कुंजी संभालने की कोशिश में लग गई है। महाराष्ट्र में 2004 का इतिहास दोहराना चाहती हैं कांग्रेस

2013 की तुलना में आज कांग्रेस को 44 सीटें कम मिली हैं। इसी प्रकार 1999 की तुलना में 2004 में भी कांग्रेस को 67 सीटें कम मिली थीं। तब भी भारतीय जनता पार्टी 79 सीटें पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। लेकिन 65 सीटें पानेवाली कांग्रेस ने उस समय 58 सीटें पानेवाली तीसरे नंबर की पार्टी से ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद पर रहने का समझौता कर सत्ता हासिल कर ली थी। लेकिन साझे की सत्ता के 20 माह पूरे होते-होते आज के निवर्तमान मुख्यमंत्री एवं तब जनतादल (एस) के कोटे से मंत्री एस.सिद्दरामैया को फोड़कर जद (एस) में ही सेंध लगानी शुरू कर दी थी।

सिद्दरामैया ने उसी दौरान अहिंद नामक संगठन बनाकर एच.डी.देवेगौड़ा के परंपरागत वोटबैंक अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग एव दलितों को अपने साथ जोडऩा शुरू कर दिया था। कांग्रेस एवं सिद्दरामैया की इस चाल को समझकर ही तब देवेगौड़ा ने सिद्दरामैया को जद(एस) से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। साथ ही साथ कांग्रेस से नाता तोड़कर तब के उपमुख्यमंंत्री एच.डी.कुमारस्वामी ने भाजपा नेता बी.एस.येद्दयूरप्पा के साथ 20-20 महीने मुख्यमंत्री रहकर उस विधानसभा का कार्यकाल पूरा करने का समझौता किया था। लेकिन कांग्रेस से धोखा खाए कुमारस्वामी ने भी 20 माह बाद भाजपा को धोखा ही दिया। येद्दयूरप्पा की बारी आने पर उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ तो लेने दी, लेकिन सदन में समर्थन देने से कतरा गए और सरकार 20 माह पहले ही गिर गई थी। 

सिद्दरामैया का उस समय का धोखा देवेगौड़ा परिवार आज भी भूल नहीं पाया है। लेकिन लगता है कांग्रेस का धोखा यह परिवार भूल चुका है। शायद इसी का परिणाम है कि मुख्यमंत्री पद के लालच में एच.डी.देवेगौड़ा के छोटे पुत्र एच.डी.कुमारस्वामी एक बार फिर कांग्रेस के साथ सत्ता संभालने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस गठबंधन का भी पूरे पांच साल चल पाना मुश्किल ही होगा। यदि कांग्रेस-जद(एस) की सरकार बन भी गई, तो साल भर बाद ही लोकसभा चुनाव आने पर इन दोनों दलों के बीच सीटों का झगड़ा रोका नहीं जा सकेगा।

कर्नाटक में साथ रहने के बावजूद संभवत: ये दोनों दल लोकसभा चुनाव एक-दूसरे के विरुद्ध ही लड़ेंगे। यह भी माना जा रहा है कि इस समय कांग्रेस के साथ जाने के कारण पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस शासन के दौरान पैदा हुई सत्ता विरोधी लहर का खामियाजा अब उसके साथ सत्ता संभालनेवाली जद(एस) को भी भुगतना पड़ेगा। कांग्रेस के साथ साझे की सत्ता के ये नुकसान देखते हुए जद(एस) अधिक समय तक ये सरकार चला पाएगी, इसमें संदेह ही नजर आता है।   

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