कांग्रेस राजस्थान में अकेले लड़ सकती है चुनाव, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में हुआ गठबंधन

नई दिल्ली. इस साल के आखिर में देश के तीन राज्यों- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने रणनीति बनानी शुरू कर दी है. कांग्रेस पार्टी ने इन राज्यों में संभावित चुनावी गठबंधनों पर भी विचार-विमर्श शुरू कर दिया है. इसके तहत मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तीन बार से सत्ता हासिल कर रही भाजपा को पटखनी देने के लिए कांग्रेस जहां दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करने पर विचार कर रही है.कांग्रेस राजस्थान में अकेले लड़ सकती है चुनाव, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में हुआ गठबंधन

वहीं, राजस्थान में पार्टी के मजबूत आधार को देखते हुए अकेले ही चुनावी मैदान में उतरने की रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी का लक्ष्य मध्यप्रदेश में, जहां पार्टी पिछले 15 वर्षों से सत्ता से बाहर है, बहुजन समाज पार्टी के साथ गठजोड़ कर चुनाव जीतने का है. वहीं, छत्तीसगढ़ में आदिवासी वोटों पर अधिकार रखने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) के साथ पार्टी का गठबंधन हो सकता है.

एमपी में संयुक्त मोर्चा के गठन का विचार

अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, मध्यप्रदेश में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, बसपा के नेताओं के साथ गठबंधन करने के लिए लगातार बातचीत कर रहे हैं. 230 सदस्यों वाली मध्यप्रदेश विधानसभा में पार्टी को 2013 में हुए पिछले चुनाव में सिर्फ 58 सीटें हासिल हुईं थी. वहीं बसपा ने इस चुनाव में 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कम सीटें जीतने के बावजूद बसपा का वोट शेयर 7 प्रतिशत रहा था, वहीं कांग्रेस का वोट शेयर 36.38 प्रतिशत था.

ऐसे में, कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि दोनों पार्टियों के एकजुट होने से वोट शेयर बढ़ेंगे और राज्य में भाजपा को पटखनी देने में आसानी होगी. प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने अखबार को बताया कि दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत हो रही है. उम्मीद है कि हम संयुक्त मोर्चा बनाकर भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर देने में सफल होंगे.

34 सुरक्षित सीटों का गणित

मध्यप्रदेश में अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं की बहुलता वाली 34 विधानसभा सीटें हैं. इन सीटों पर बसपा की पकड़ को देखते हुए कांग्रेस चुनाव पूर्व गठबंधन को लेकर गंभीर है. कांग्रेस पार्टी के नेताओं का मानना है कि अगर बसपा के साथ गठबंधन हो जाता है, तो ये सीटें संयुक्त मोर्चा के खाते में आ जाएंगी. कांग्रेस के एक नेता ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘कुछ इलाकों में चुनाव के दौरान गठबंधन का प्रभाव नहीं भी दिख सकता है. इसलिए गठबंधन की सहयोगी दोनों पार्टियां एक-दूसरे के प्रभाव वाले इलाके में दखल नहीं देंगी.’ यानी जहां बसपा की पकड़ होगी, वहां से कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं होगा. इसी तरह कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में बसपा अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगी.

छत्तीसगढ़ में बसपा और जीजीपी से मेल

छत्तीसगढ़ में सीएम रमण सिंह की भाजपा सरकार को हराने के लिए कांग्रेस ने यहां की भी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठजोड़ करने की योजना बनाई है. इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, वर्ष 2013 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वोट शेयर के बीच मात्र 0.7 प्रतिशत का अंतर रहा था. इस छोटे से अंतर को पाटने के लिए कांग्रेस इस बार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है.

वहीं, राज्य में इस बार कांग्रेस से अलग हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जनता कांग्रेस को भी ‘साधना’ है, इसलिए पार्टी चुनावी गठबंधन के प्रति अतिरिक्त रूप से गंभीर है. इसके लिए पार्टी, यहां के प्रमुख क्षेत्रीय दल गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) और बसपा के साथ चुनावी तालमेल की रणनीति पर काम कर रही है. पार्टी के प्रदेश प्रभारी पी.एल. पूनिया ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘हमें उम्मीद है कि बसपा और जीजीपी के साथ हमारा गठबंधन बन जाएगा. जीजीपी की राज्य के कई इलाकों में मजबूत पकड़ है. वहीं बसपा भी कई स्थानों पर बड़ा अंतर पैदा करती है. ऐसे में गठबंधन बनने के बाद कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना आसान हो जाएगा.’

10 प्रतिशत सीटों पर क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत

छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में जीजीपी के 8 विधायकों ने 2013 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी. वहीं बसपा का प्रत्याशी एक सीट पर जीता था, वहीं दूसरी पर उसने विपक्षी प्रत्याशी को कड़ी टक्कर दी थी. इसके अलावा राज्य की 12 विधानसभा सीटों पर भी बसपा के उम्मीदवारों ने डेढ़ हजार से लेकर 17 हजार तक वोट अर्जित किए थे. इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है कि इन पार्टियों के साथ गठबंधन होने के बाद विधानसभा चुनाव की करीब 10 प्रतिशत सीटों पर उसे भाजपा के मुकाबले बढ़त मिल जाएगी. पी.एल. पूनिया ने कहा, ‘हम लोगों ने चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए बसपा और जीजीपी के साथ बातचीत शुरू कर दी है. साथ ही हम बूथ स्तर तक अपनी पार्टी को भी मजबूत करने में जुटे हुए हैं. राज्य की 85 विधानसभा सीटों पर बूथस्तर तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.’

राजस्थान में अकेले दम दिखाएगी पार्टी

वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से पिछड़ गई थी. उस चुनाव में पार्टी को 200 सदस्यीय विधानसभा में महज 21 सीटों पर जीत मिल सकी थी. वहीं विपक्षी भाजपा ने कुल 163 सीटों पर जीत दर्ज कर, कांग्रेस को करारी शिकस्त दी थी. लेकिन इस बार माहौल बदला हुआ है.

वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ जनता के मूड को भांपते हुए कांग्रेस महीनों पहले से चुनावी तैयारियों में जुटी हुई है. राजस्थान में अभी तक दो दलों के बीच ही चुनाव होते रहे हैं. इसलिए कांग्रेस को उम्मीद है कि भाजपा सरकार के खिलाफ बना जनमत उसे चुनाव में जीत दिलाएगा. वहीं पिछले कुछ महीनों में हुए लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों में जीत दर्ज करने के बाद भी कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है.

दलितों में लोकप्रियता को भुनाएगी पार्टी

राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी 17 प्रतिशत है. वहीं इस जाति के लिए सुरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या 34 है. पिछले चुनाव में इनमें से महज 2 सीटों पर ही कांग्रेस को जीत मिली थी. लेकिन दलित आबादी के बीच पार्टी की लोकप्रियता और वसुंधरा राजे सरकार के खिलाफ गुस्से को देखते हुए, कांग्रेस को इस बार इन सभी सीटों पर जीत का भरोसा है. पार्टी की प्रदेश इकाई के एक वरिष्ठ नेता ने इकोनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘राजस्थान की स्थिति दूसरे राज्यों से अलग है. यहां पार्टी का मजबूत आधार है. हमलोगों ने दलितों के बीच काफी काम किया है. ऐसे में किसी दूसरी पार्टी के साथ गठजोड़ करके हम अपने मजबूत जनाधार को गंवा नहीं सकते हैं. गठबंधन से हमारे नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिरेगा.’

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