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CM नीतीश कुमार ने विरोधियों को मात देने के लिए अपनाया ‘टिट फॉर टैट’ का मंत्र

सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए ध्यान से देख और सुन रहा था. मन ही मन सोच रहा था कि क्या यह वही नीतीश कुमार हैं जिनसे मेरी पहली मुलाकात 1987 में विधायक क्लब के उनके फ्लैट में हुई थी? मैं बतौर संडे ऑब्जर्वर रिपोर्टर उनका इंटरव्यू करने गया था. अपने जवाब से नीतीश कुमार ने मुझे काफी प्रभावित किया था. आज भी याद है कि सौम्य और गंभीर स्वभाव के नीतीश कुमार ने बातचीत के क्रम में कई बार रिपिट किया, ‘मैं जमीर बेचकर राजनीति करने नहीं आया हूं.’

नीतीश कुमार बदल गए हैं और हो गए हैं खांटी राजनीतिज्ञ 

31 साल बाद यकीकन मेरे को दिल से लगा कि यह दूसरे नीतीश कुमार हैं. बिल्कुल दूसरे अवतार में खांटी(पक्के) राजनीतिज्ञ. बिल्कुल बदले हुए नीतीश कुमार. परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने वाले नीतीश कुमार. हो सकता है कि प्रवृति के इस चेंजिग में उनका अपना कोई योगदान न हो. उन्होंने स्वयं से अपने दिल और दिमाग को सियासत गामी नहीं बनाया हो. क्योंकि परिवर्तन तो प्रकृति का शास्वत नियम है जो कायदे से जीव और निर्जीव सब पर समान रूप से लागू होता है. हो सकता है नीतीश कुमार की अंतरआत्मा ने कहा हो कि सत्ता की राजनीति में जो अपने माइंडसेट को नहीं बदलेगा तो महाराणा प्रताप की तरह पूरी जिंदगी घास की रोटी ही खाता रह जाएगा. आज के डिजिटल युग में ऐसा करना स्वास्थ्य के लिए भी अहितकर होगा.

बहरहाल, यह सच्चाई है कि कोई विश्वास नहीं करेगा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जानकारी में बालिका सुधार गृह के 46 में से 34 मासूम बच्चियों के साथ लगातार 56 महीनों से रेप हो रहा था. लेकिन घर, बाजार, सड़क, चैराहे पर लोग-बाग यह चर्चा करने लगे हैं कि नीतीश कुमार कुतर्क को हथियार बनाकर सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के लिए दोषियों को बचाने का काम कर रहे हैं. लगने भी लगा है कि नीतीश कुमार की प्राथमिकता वोट की राजनीति है ताकि कुर्सी सलामत रहे. क्योंकि यही वो नीतीश कुमार हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक छवि की हिफाजत के लिए जीतनराम मांझी को त्यागपत्र देने की नसीहत दी थी. वर्ष 1999 में पश्चिम बंगाल के गैसल में रेलवे दुर्घटना के बाद उन्होंने मोरल ग्राउंड पर इस्तीफा दे दिया था.

इतना ही नहीं 2014 लोकसभा चुनाव की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर कुर्सी पर लात मार दी थी. फिर गुड गवर्नेंस के नाम पर लालू यादव की पार्टी से ‘तलाक’ लेकर पिछले साल जुलाई में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली.

महागठबंधन की सरकार चला रहे नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जुलाई, 2017 में लालू यादव की पार्टी से अलग हो गए थे

एक सवाल जेहन में उभरता है कि नीतीश कुमार और लालू यादव में बुनियादी तौर पर क्या अंतर है?

मुजफरपुर शेल्टर होम रेप कांड में प्रकट(सीधे) रूप से जिम्मेदार मंत्री(मंजू वर्मा) और बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए जिस अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नीतीश कुमार कर रहे हैं उसको देखते हुए एक सवाल जेहन में उभरता है कि उनमें और लालू यादव में बुनियादी तौर पर क्या अंतर है?

बात 1997 की है. चारा घोटाले में नाम आने के बाद एक पत्रकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव से पूछा कि ‘मोरल ग्राउंड पर आप इस्तीफा देंगे?’ इस पर हाजिरजवाब लालू यादव ने सवाल के बदले में सवाल पूछा था, ‘हमने तो फुटबॉल ग्राउंड का नाम सुना है और देखा भी है. ई मोरल ग्राउंड किस धातु का नाम है?’ यह सुनकर बेचारा पत्रकार खामोश रह गया.

सोमवार को सीएम नीतीश कुमार पत्रकारों के सवाल का जवाब ठीक उसी अंदाज में दे रहे थे जिस तेवर से ‘गरीबों के मसीहा’ लालू यादव अपने कुर्सी को बचाने के लिए देते थे. पत्रकारों द्वारा पूछे गए किसी भी प्रश्न का सटीक, सीधा और संतोषजनक जवाब नीतीश कुमार ने नहीं दिया. चेहरा तनाव से लबरेज. आवाज में दंभ की झलक, बर्ताव में चिड़चिड़ापन स्पष्ट दिख रहा था.

मुख्यमंत्री को पहले से अनुमान था कि संवाद कक्ष में मुजफरपुर कांड पर पत्रकारों से उनकी भिड़ंत होगी. संभवतः इसी को ध्यान में रखकर सारे अधिकारियों को तैयारी के साथ उन्होंने बुला रखा था. पर किसी भी अधिकारी ने टू दी प्वाइंट जवाब नहीं दिया.

कभी बात-बात पर छवि की बात करने वाले नीतीश कुमार से जब सवाल पूछा गया, ‘क्या मुजफरपुर कांड ने आपके छवि को धूमिल किया है‘, इसपर लगभग तुनकते हुए वो बोले, ‘इस घटना ने पूरे बिहार की छवि धूमिल की है.’ क्या मोरल ग्राउंड पर समाज कल्याण मंत्री को अपने पद से इस्तीफा नहीं देना चाहिए? इस सवाल पर गोटी की तरह गोल-गोल आंख कर के नीतीश कुमार ने कहा, ‘यह प्रश्न आप मंत्री से जाकर पूछें.’

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में नाबालिग लड़कियों के साथ रेप और यौन शोषण की घटना सामने आने से नीतीश सरकार की किरकिरी हुई है 

नीतीश कुमार अब चुनावी विजेता के अवतार में आना चाहते हैं

डेढ़ घंटे के प्रेस वार्ता में नीतीश कुमार ने अपने जवाब से देश दुनिया को यह अहसास करा दिया कि अब वो चुनावी विजेता के अवतार में आना चाहते हैं. उनको पता है कि मंजू वर्मा को मंत्रिमंडल से हटाने का मतलब कुशवाहा समाज के बीच विलेन बनना जो चुनाव में घाटे का सौदा होगा. बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) के बीच यादवों के बाद कुशवाहा समाज की जनसंख्या दूसरे नंबर पर है. कई कुशवाहा संगठनों का बयान भी आ चुका है कि अगर मंजू वर्मा को छूने की कोई साहस करेगा तो राज्य में समाज कयामत ला देगा. गोया वर्मा महारानी लक्ष्मी बाई की अवतार हों.

‘अपने आप को बचाने के लिए मंत्री महोदया अपनी जाति को ढाल बना रहीं हैं, क्या यह सही है?‘ इसपर वो बोले, जाकर उन लोगों से क्यों नहीं पूछते जो पिछले कई बर्षों से अपनी जाति को ढाल बनाकर अपने कुकर्मों को छिपाने का काम कर रहे हैं. इस तरह का बेतुका जवाब देकर नीतीश कुमार ने बता दिया कि ‘अगर लालू यादव राजनीति के डॉक्टर हैं तो मैं भी राजनीति का इंजीनियर हूं. हमने ‘टिट फॉर टैट’ यानी जैसे को तैसा मंतर(मंत्र) सीख लिया है.’

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