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शादी के डर से अटल जी आ छिपे थे कानपुर में अपने दोस्त के गांव में, जानें पूरी बात

कानपुर। जिंदगी की हर परिस्थिति का सामना करने का हौसला पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी में था। उनकी जीवटता तो सबकी जुबान पर रही। लेकिन, वह डरते भी थे, यह तो शायद उनके अन्य करीबी भी नहीं जानते होंगे। यह डर था, शादी का जिससे बचने के लिए वह अपने अभिन्न मित्र स्व. आचार्य गोरेलाल त्रिपाठी के पतारा स्थित रायपुर गांव पहुंच गए थे।शादी के डर से अटल जी आ छिपे थे कानपुर में अपने दोस्त के गांव में, जानें पूरी बात

देवनगर निवासी स्व. आचार्य गोरेलाल त्रिपाठी के पुत्र विजय प्रकाश त्रिपाठी बताते हैं कि पिताजी एवं गांव के बड़े-बुजुर्गों से अटल जी से जुड़ा रोचक प्रसंग सुनने को मिला। वर्ष 1944 से 1948 के बीच अटलजी की शादी की चर्चा उनके घर पर चली। वह देश सेवा को जीवन का उद्देश्य बना चुके थे और शादी करना ही नहीं चाहते थे। इसीलिए वह भागकर हमारे गांव रायपुर आ गए। तीन दिन तक छिपे रहे। डर की वजह से मकान से नीचे तक नहीं उतरते थे।

पिता के निधन के बाद दिया पितृवत् स्नेह

त्रिपाठी कहते हैं कि अटलजी संबंधों को निभाने वाले युग पुरुष थे। संस्मरण सुनाते-सुनाते पुरानी यादों में भावुक होकर बताया कि पिता के निधन के बाद उनसे हमेशा पितृवत् स्नेह मिला। वर्ष 1942-1950 के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रियता के दौरान पिताजी और अटलजी की मित्रता हुई। पिताजी नगर के कार्यवाह थे जबकि अटल जी हटिया और हॉस्टल शाखा के स्वयंसेवक थे। संघ शिक्षा वर्ग (ओटीसी) में प्रशिक्षण के दौरान एक माह साथ रहने से उनके बीच घनिष्ठता और बढ़ी। वर्ष 1963 में मेरे उपनयन संस्कार (जनेऊ) में दो घंटे के लिए अटलजी घर आए और उनका आशीर्वाद मिला।

कराया जीविकोपार्जन का इंतजाम

विजय त्रिपाठी बताते हैं कि पिता का 10 जुलाई 1989 को निधन होने के बाद दिसंबर में जब उनसे मिलने लखनऊ गया तो उस वक्त वह नेता विपक्ष थे। उन्हें पिता का परिचय देते हुए नौकरी मांगी तो वह बड़ी सहजता से बोले, बेटा नौकरी तो नहीं दे सकता, लेकिन तुम्हारे जीवकोपार्जन का इंतजाम कर सकता हूं। उन्होंने डॉ. शिवकुमार अस्थाना को बुलाकर कहा, बच्चे को सहयोगी बनाएं और इसके अनुरूप कार्य सौंपें। अस्थाना जी ने कमल ज्योति पत्रिका का कानपुर से संवाददाता बनाया।

उसके तीन दिन बाद बिरहाना रोड स्थित खत्री धर्मशाला में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में पिताजी के मित्र स्व. बाबूराम शुक्ल ने उनसे मेरा जिक्र किया। इस पर अटलजी ने मुझे ऊपर बुलाया और कमल ज्योति पत्रिका का सहायक संपादक बनाने की घोषणा कर दी। वर्ष 1991-96 तक सहायक संपादक के तौर पर कार्य किया। अटलजी ने एमएलसी बनाने की पेशकश की, जिसे सम्मानपूर्वक इन्कार कर दिया। 

कानपुर से ही बने थे जनसंघ के अध्यक्ष

यमुना तट पर आगरा में बसे छोटे से गांव बटेश्वर के मूल निवासी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी को असली धारा गंगा किनारे स्थित कानपुर में मिली। यहां दयानंद एंग्लो-वैदिक (डीएवी) कॉलेज में पढ़े वाजपेयी सियासत की उभरती शख्सियत तो अपनी काबिलियत से पहले ही बन गए थे, लेकिन राजनीतिक जीवन की पहली सबसे बड़ी कुर्सी उन्हें कानपुर ने ही दिलाई। यहीं पर वह पहली बार जनसंघ के अध्यक्ष बने। अटल जी और कानपुर का नाता बहुत गहरा था।

भाजपा की मातृ संस्था भारतीय जनसंघ की स्थापना और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पहली बार संगठन अध्यक्ष बनने की घटनाएं इसी शहर में हुई। 1951 में ऐतिहासिक फूलबाग मैदान के खुले अधिवेशन के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष और पंडित दीनदयाल उपाध्याय को महामंत्री चुना गया था। 1973 में बृजेंद्र स्वरूप पार्क में खुला अधिवेशन और पास स्थित आर्यनगर इंटर कॉलेज में कार्यकारिणी की बैठक हुई, जिसमें विवाद के चलते बलराज मधोक ने संगठन छोड़ा और अटल जी को अध्यक्ष के रूप में संगठन की कमान सौंपी गई।

इसके बाद 1977 में जब पहली बार केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी के रूप में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो जनसंघ भी उसमें शामिल हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने। बाद में दोहरी निष्ठा के सवाल पर पूर्व जनसंघ के लोग सरकार से अलग हो गए और 1980 में मुंबई में भाजपा की स्थापना हुई। इस बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी को ही अध्यक्ष बनाया गया।

गुरु के घर चबूतरे पर बैठकर छुआ क्षितिज

डीएवी कॉलेज में राजनीति शास्त्र के शिक्षक रहे स्व.डॉ.मदनमोहन पांडेय से अटल जी का गहरा लगाव था। अक्सर वह गुरु के कानपुर, पीरोड स्थित आवास पर पहुंच जाते और वहां घर के बाहर चबूतरे पर पढ़ाई करते थे। 
गुरु के घर पहुंचने के बाद वह बड़ी ही शालीनता से गुरु माता शारदा पांडेय के चरण छूते और फिर उनसे चटाई मांगकर चबूतरे पर बिछाते थे। गुरुजी की अलमारी से किताब निकालने से पहले वे गुरु माता की आज्ञा लेते। तब तक पढ़ाई करते, जब तक कि गुरुजी आ नहीं जाते।

स्व. पांडेय के पुत्र सेवानिवृत्त शिक्षक केके पांडेय ने बताया कि माता जी बताती थीं कि जैसे ही पिता जी आते, अटल जी दौड़कर उनके चरण छूते। फिर उनके साथ ही बैठते और अपनी जिज्ञासा को शांत करते। पिताजी कहते थे कि अटल तुम बहुत आगे जाओगे। केके पांडेय के मुताबिक, अटल जी को किताबों से बेहद लगाव था। साहित्य से तो उनका लगाव सबसे ज्यादा था। वह बताते हैं कि जब अटल जी प्रधानमंत्री बने तो माता शारदा पांडेय ने कहा-देखो, ये लड़का इसी चबूतरे पर पढ़ता था और आज देश का प्रधानमंत्री बन गया।

सहेजकर रखा है चबूतरा

जिस चबूतरे पर अटल जी पढ़ते थे, आज भी वह सुरक्षित है। केके पांडेय ने वैसे तो अपने मकान की मरम्मत कराई, पर चबूतरा ठीक वैसा ही है, जैसा पहले था। 

गुरु के विद्यालय को दिलाई मान्यता

डॉ.मदनमोहन पांडेय ने एक स्कूल की स्थापना की। सीबीएसई बोर्ड की मान्यता लेनी थी। काफी कोशिशों के बाद भी जब मान्यता नहीं मिली तो वे परेशान हो गए और बेटे केके पांडेय के साथ दिल्ली स्थित अटल जी के आवास पर पहुंचे। उस वक्त अटल जी केंद्र में नेता विपक्ष थे और उन्होंने उनके विद्यालय को मान्यता दिलाई।

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