मायाराज में हुए स्मारक घोटाले पर अखिलेश सरकार ने साधी चुप्पी

मायाराज में नोएडा व राजधानी लखनऊ में अंबेडकर स्मारकों के निर्माण में हुए 14 अरब रुपये से ज्यादा के घोटाले में तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा की रिपोर्ट पर अखिलेश यादव सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। जस्टिस मेहरोत्रा ने मई 2013 में अखिलेश सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें घोटाले के लिए पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबूसिंह कुशवाहा समेत 199 लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया था। 

आरोपियों में एक विधायक, दो पूर्व विधायक, दो वकील, खनन विभाग के पांच अधिकारी, राजकीय निर्माण निगम के 57 इंजीनियर व 37 लेखाकार, एलडीए के पांच इंजीनियर, पत्थरों की आपूर्ति करने वाली 60 फर्में व 20 कंसोर्टियम प्रमुख तथा आठ बिचौलिये शामिल थे।

लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में नसीमुद्दीन, बाबूसिंह कुशवाहा, राजकीय निर्माण निगम के तत्कालीन एमडी सीपी सिंह, खनन के तत्कालीन संयुक्त निदेशक एसए फारूकी तथा 15 अन्य इंजीनियरों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराकर जांच कराने तथा घोटाले की रकम की वसूली करने के साथ ही पूरे मामले की जांच सीबीआई या स्पेशल टास्क फोर्स गठित करके छह माह के भीतर कराने की भी संस्तुति की थी। 

यही नहीं, उन्होंने आरोपी अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति की जांच कराकर आय से अधिक संपत्ति पाए जाने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने और संपत्ति जब्त करने की सिफारिश भी की थी। इसके अलावा स्मारकों के लिए पत्थरों की आपूर्ति करने वाली 60 फर्मों और 20 कंसोर्टियम से भी वसूली की सिफारिश की गई थी।

पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबूसिंह कुशवाहा भी फंसे थे

दिलचस्प बात यह है कि मई 2013 में लोकायुक्त की ओर से सौंपी गई रिपोर्ट जुलाई 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने स्वीकार करते हुए उनकी सभी सिफारिशों पर कार्रवाई के आदेश दे दिए थे। इसके बाद पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी व बाबूसिंह कुशवाहा समेत 199 लोगों के खिलाफ सतर्कता अधिष्ठान को जांच सौंपी गई थी। 

रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं पर कार्रवाई की जिम्मेदारी गृह, लोक निर्माण व भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग को सौंपी गई थी। दोषियों को शीघ्र दंड दिलाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स या स्पेशल प्रॉसीक्यूटिंग एजेंसी गठित करने तथा आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए हाईकोर्ट से अनुमति लेकर विशेष कोर्ट बनाने की लोकायुक्त की सिफारिश पर अमल का दायित्व गृह विभाग को सौंपा गया था, लेकिन सब ठंडे बस्ते में चला गया। 

रिपोर्ट में लोकायुक्त ने पत्थरों की बाजार दर से 34 फीसदी ज्यादा दर पर खरीद करने से सरकार को हुई 14.10 अरब रुपये के नुकसान की भरपाई के लिए क्रिमिनल लॉ एमेडमेंट ऑर्डिनेंस 1944 की धारा 3 के तहत न्यायालय से अनुमति लेकर आरोपियों की संपत्ति कुर्क करके वसूली की सिफारिश की थी।

नसीमुद्दीन व बाबूसिंह से कुल धनराशि का 30-30 प्रतिशत, सीपी सिंह से 15 प्रतिशत, एसए फारूकी से पांच प्रतिशत तथा आरएनएन के 15 इंजीनियरों से कुल 15 प्रतिशत धनराशि की वसूली की सिफारिश की गई थी। यह भी सिफारिश की गई थी कि जांच में आरएनएन के जिन लेखाकारों के पास आय से अधिक संपत्ति पाई जाए, उनसे शेष हानि का पांच प्रतिशत वसूल किया जाए।

सरकारी खजाने को लगी थी 14.10 अरब की चपत

रिपोर्ट के अनुसार स्मारकों के निर्माण के लिए राजकीय निर्माण निगम, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, लोक निर्माण विभाग, नोएडा अथॉरिटी, लखनऊ विकास प्राधिकरण, संस्कृति तथा सिंचाई विभाग ने कुल 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपये जारी किए थे। इसमें से 41 अरब 48 करोड़ 54 लाख 80 हजार खर्च किए गए। शेष 1 अरब 28 करोड़ 28 लाख 59 हजार रुपये वापस कर दिए गए। स्मारकों के निर्माण पर खर्च की गई कुल धनराशि का लगभग 34 फीसदी ज्यादा खर्च करके सरकार को 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपये का नुकसान पहुंचाया गया। 
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