यूपी का बिजली विभाग, तबादलों को लेकर अपना रहा दोहरा मापदंड

#मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले संविदाकर्मीयों को मूल निवास से इतर दूसरी तहसील में भेजने वाले अलोक कुमार का खुद के नीचे बैठे लोगों को संरक्षण.

#बिजली विभाग के मुखिया के इस तुगलकी आदेश और बड़ों को दिए जा रहे संरक्षण के क्या हैं मायने. 

#विभाग के छोटे कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग पर चाबुक और चंद बड़ों को संरक्षण से किसको मिल रहा है फायदा.

#US Gupta, BS Tiwari, Sanjay Tiwari और मलाईदार कुर्सी पर तैनात AXEN पर मेहरबानी और छोटे कर्मचारियों पर हंटर.  

#चंद अफसरों पर मेहरबानी संविदा कर्मियों के बड़े समूह पर हंटर, सरकार के लिए बन सकता है संकट.   

#चेयरमैन व प्रबंधन का यह भेदभावपूर्ण रवैया कहीं सरकार के सामने एक और हडताल की स्थिति न खड़ी कर दे.  

लखनऊ : तबादले भी ऊर्जा विभाग में रस्मी हैं. यह चेयरमैन की मर्जी है कि तबादले के बाद भी खासुलखास का बालबांका न हो और वो बदस्तूर पुराने पद पर बना रहे. रसूखदार मलाईदार पदों पर बैठे इंजीनियरों का तबादला महज दिखावे के लिए होता है, हकीकत में वो अपने पदों पर बने रहते हैं. हां परेशान हाल और दिक्कतें झेल रहे इंजीनियर को तबादले पर जाना ही पड़ता है. ऐसे में विभागीय कर्मियों की नाराजगी योगी सरकार के सामने हडताल के रूप में एक नयी मुसीबत न खड़ी कर दे. बिजली विभाग के मुखिया और प्रबंधन की इस भेदभावपूर्ण कार्यशैली  को लेकर कर्मियों में फ़ैल रही नाराजगी इस चुनावी वर्ष में कितना फायदेमंद पार्टी के लिए साबित होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

अधिकारियों व कर्मचारियों के स्थानान्तरण की समीक्षा हर साल होती है लेकिन परियोजना प्रबंधक और Director Personal की आपसी मिली भगत से मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को रिलीव नहीं किया जाता है, जिसके चलते ये वहीँ पर लगभग 1 साल और 6 महीने से तैनात हैं और रिलीव नहीं हुये हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानांतरित हुए इन अफसरों और कर्मचारियों को यथावत बनाये रखने जैसे किसी आदेश के बिना ही यह वहां तैनात हैं. आदेश में वेतन रोकने की बात लिखने के बाद भी जब उसका पालन नहीं किया गया तो Director Personal द्वारा उस पर कोई कार्यवाहीं नहीं की जाती. जबकि कई ऐसे अफसरों/कर्मचारियों जिनकी खुद अथवा पारिवारिक समस्याएं थीं संज्ञान में होने के बावजूद हटा दिया गया. बस इनकी गलती यह है कि यह सब नान मलाईदार पदों पर तैनात थे.

बिजली विभाग के चेयरमैन आलोक कुमार के एक फरमान से मामूली तनख्वाह पर काम करने वाले संविदाकर्मीयों को उनके मूल निवास से इतर दूसरी तहसील में स्थानांतरित तो कर दिया गया लेकिन उसी बिजली विभाग में अलोक कुमार की नाक के नीचे बैठे तमाम अधिशाषी अभियंताओं को वर्षों से नहीं हटाया जा सका है. तबादलों की मानकों के अनुरूप हर वर्ष समीक्षा भी की गयी और स्थान्तरित होने वाले अफसरों/कर्मचारियों को रिलीव करने के आदेश भी परियोजना प्रबंधकों को जारी किये गए लेकिन मलाईदार पदों पर बैठे अधिशाषी अभियंताओं को हटाने में केवल लीपापोती ही की गयी. उच्चाधिकारियों द्वारा लिए जा रहे इस तरह के निर्णय से कर्मियों में असंतोष व्याप्त है जोकि इस चुनावी वर्ष में रोजगार को लेकर दावों, वादों मे उलझी योगी सरकार की उलझनें बढाने वाली साबित हो रही हैं. और आने वाले समय में हडताल की समस्या से जूझ रही सरकार के सामने एक और हड़ताल की स्थिति न खड़ी कर दे.

कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे पावर कारपोरेशन के लिए संविदा कर्मियों को लेकर आलोक कुमार का फरमान और भ्रष्ट व मलाईदार पदों पर तैनात अधिशाषी अभियंताओं को संरक्षण दिया जाना मुसीबतों को और बढ़ाने वाला है. कर्मियों में बिजली विभाग के मुखिया का इस तरह का कदम एकदम तानाशाही वाला माना जा रहा है, जहाँ छोटे कर्मचारियों पर चाबुक और बड़ों को संरक्षण देने का काम किया जा रहा है. दरअसल शासन में पावर कारपोरेशन प्रबंधन को विभिन्न स्रोतों से शिकायतें मिल रही थी कि तहसील में तैनात आउटसोर्स श्रमिक बिजली कंपनियों के हितों के विपरीत काम कर रहे हैं और स्थानीय प्रभाव के चलते यह श्रमिक पक्षपात पूर्ण तरीके से काम करते हैं.  जिसके मद्देनजर निर्णय किया गया कि आउट आउटसोर्स श्रमिकों की तैनाती उनकी गृह तहसील से बाहर किया जाए.

जबकि इसके विपरीत खुद प्रमुख सचिव चेयरमैन आलोक कुमार की नाक के नीचे हो रहे कारनामे उनको दिखाई नहीं दे रहे. संविदा कर्मियों पर चाबुक चलाने वाले आलोक कुमार बताएं कि उन अधिशाषी अभियंताओं पर चाबुक क्यूँ नहीं चला जिन्हें Director Personal संजय तिवारी के 14 सितम्बर 2018 के आदेश जिसमें कहा गया था कि स्थान्तरित होने वाले अधिकारी/कर्मचारी अपनी तैनाती 1 अक्टूबर तक नयी जगह पर कर लें. फिर भी उनको परियोजना प्रबंधक द्वारा रिलीव नहीं किया गया. आदेशों को दरकिनार करते हुए उनके वेतन को रोकने की बात केवल कागजों में ही धरी रह गयी. कई तो ऐसे कर्मचारी/अधिकारी हैं जोकि 3 दशक से एक ही जगह तैनात हैं. ऐसे अफसरों पर कार्यवाही क्यूँ नहीं की गयी और उन जिम्मेदारानों से जवाब क्यूँ नहीं लिया गया जिन्होंने कागजी खानापूर्ति करके तैनाती को यथावत बनाये रखा. करीब छः महीने या साल भर से बिना किसी अनुमति के रिलीव न होने वाले ये अफसर क्यूँ मुखिया आलोक कुमार को दिखाई नहीं पड रहे हैं.

इसके अलावा एटा जिले के जवाहरपुर तापीय परियोजना के “चर्चित सरिया चोरी” प्रकरण के सरगना US Gupta जिसको एटा जिला प्रशासन अपनी प्रथम रिपोर्ट में दोषी मान रहा है, को सजा देने के बजाय विभाग के जिम्मेदारानों द्वारा गुप्ता को आफिस अटैच बताया जा रहा है. जबकि उसके आदेश में अटैच जैसे किसी शब्द का जिक्र ही नहीं है. मामले की लीपापोती करते हुए US Gupta को जवाहरपुर से हटाकर निदेशालय में जिस “मुख्य अभियंता प्रगति ईकाई” के पद पर तैनाती दी गयी मूलतः वह पद है ही नहीं जबकि इसी प्रकरण में US Gupta के सहयोगी रहे और जिला प्रशासन की रिपोर्ट में दोषी JE Surendra Kumar को सोनभद्र में परियोजना प्रबंधक के साथ अटैच कर दिया गया है. US Gupta को निदेशालय पर इसलिए बैठाया गया ताकि वह पूरे मामले को मैनेज कर सके और वह इस काम में पूरी शिद्दत से लगा है. निदेशालय पर ही तैनात निदेशक तकनीकी बीएस तिवारी के कारनामे अलोक कुमार को नजर नहीं आ रहे.

सरिया चोरी के सरगना US Gupta, भ्रष्टाचार और घोटाले के जनक उत्पादन निगम के तकनीकी निदेशक बीएस तिवारी और Director Personal संजय तिवारी की तबादलों को लेकर लीपापोती के बावजूद इन सब पर मेहरबानी और छोटे कर्मचारियों पर हंटर चलाने के पीछे आखिर क्या वजह है. आलोक कुमार का यह कदम शासन की पारदर्शिता को कितना सटीक व उचित ठहराता है. क्या बिजली विभाग पर योगी सरकार की तबादला नीति लागू नहीं होती. पैसों का खेल करने वाले इन चंद अफसरों और अधिशाषी अभियंताओं पर कोई कार्यवाही न करके संविदा कर्मियों के बड़े समूह पर हंटर चला करके अलोक कुमार ने इस चुनावी वर्ष में भाजपा और योगी सरकार के लिए कितने फायदे का काम किया है इसका अवलोकन करना पार्टी और सरकार का काम है. लेकिन चेयरमैन आलोक कुमार द्वारा विभाग में अपनाई जा रही दोहरी नीति पर सवाल जरूर है.

 

साभार

अफसरनामा डाट काम

छोटों पर मार,बड़ों को अभयदान,आलोक कुमार का फरमान   

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