एक ओर जहां सरकार ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पर पूरा जोर दे रही है वहीं लाल किला के मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद प्लास्टिक की बोतलें और केले के छिलके बिखरे नजर आ रहे थे.

समारोह में जहां बच्चे और आम लोग बैठे थे उन बाड़ों में, समारोह संपन्न होने के कुछ मिनट बाद ही प्लास्टिक की, पानी की बोतलों के ढेर देखे जा सकते थे. इससे 17वीं शताब्दी के मुगल स्मारक में कचरे की पेटियों की व्यवस्था न होने का संकेत मिला. कूड़ेदान की जगह गत्ते के कुछ डिब्बों का उपयोग किया गया जो जरूरत से अधिक भर गए और बच्चों को जमीन पर ही कूड़ा फेंकना पड़ा. छात्रों के साथ समारोह में पहुंची शिक्षिका नमिता श्रीवास्तव ने कहा कि हैरानी की बात है कि बोतलें और अन्य कचरा फेंकने के लिए वहां कूडे़दान ही नहीं थे जबकि प्रधानमंत्री साफ-सफाई पर काफी जोर देते हैं.

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पूरा क्षेत्र ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कचरा फेंकने का स्थान हो

शिक्षिका रश्मी ने कहा कि पूरा क्षेत्र ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कचरा फेंकने का स्थान हो. मुझे समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने कचरा फेंकने के लिए उचित प्रबंध क्यों नहीं किए. छात्रों को कार्यक्रम के बाद केला, चिप्स सहित जलपान दिया गया था और कूड़ेदान ना होने के कारण उसका कूड़ा उन्होंने (छात्रों ने) इधर-उधर ही फेंक दिया था. प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने वर्ष 2022 तक प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने का संकल्प भी लिया है.