स्पीकर ओम बिड़ला से क्यों नाराज हुए संसदीय समितियों के पूर्व प्रमुख?

जुबिली न्यूज डेस्क
लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने कुछ दिनों पहले संसदीय कमेटियों के अध्यक्षों को पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि वे ऐसे किसी भी मामले पर चर्चा न करें जो कोर्ट में लंबित हो या राष्ट्रवाद से जुड़ा हो। स्पीकर के इस नसीहत पर कुछ संसदीय समितियों के पूर्व अध्यक्ष ने आपत्ति जतायी है। इन लोगों ने कहा है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है कि स्पीकर ऐसे मामलों को लेकर कोई निर्देश दिए हो।
संसद के मानसून सत्र से पहले 25 अगस्त को लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने पत्र लिखा था। फिलहाल इस पत्र पर इस पत्र पर अब बहस तेज हो गई है।
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कई सांसदों और विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में ऐसे कई मौके आए हैं, जिनमें कोर्ट में लंबित मामलों की भी संसदीय समितियों में चर्चा हुई है। कुछ जानकारों का मानना है कि स्पीकर के नए निर्देश आगे के लिए असामान्य उदाहरण पेश करेंगे।
बिड़ला के नए निर्देश के खिलाफ बोलने वाले कुछ नेता ऐसे भी है जो पहले किसी संसदीय कमेटी का नेतृत्व कर चुके हैं।
इस मामले पर पूर्व में संसदीय पैनल की अध्यक्षता कर चुके वीरप्पा मोइली ने कहा है कि संसदीय समितियां खुद संसद का विस्तृत रूप हैं। संसद सर्वोच्च है और यही समितियों के लिए भी लागू होता है। बल्कि समितियां संसद के मुकाबले काफी उदार होती हैं।
मोइली ने कहा कि अदालत में लंबित मामलों का मुद्दा अब पुराना हो चुका है। ऐसे कई मामले हैं, जो अदालत में हैं। ऐसे हालात में आखिर कैसे संसदीय कमेटी उन पर चर्चा करने से बच सकती है? उन्होंने कहा कि संसद सुप्रीम है और इसकी समितियां चर्चा के फोरम हैं। यह गैर-राजनीतिक आधार पर काम करती हैं। यहां तक कि यह संसद से ज्यादा उदार होती हैं। इसलिए स्पीकर के निर्देश न तो मजबूत हैं न ही मामलों की चर्चा पर अवरोध लगाने वाले हैं।
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वहीं पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) के पूर्व अध्यक्ष केवी थॉमस का कहना है कि स्पीकर ने पहले कभी किसी स्टैंडिंग कमेटी के कामकाज में दखल नहीं दिया।
स्पीकर के दखल पर लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा कि स्पीकर के पास संसदीय कमेटियों को निर्देश जारी करने की पावर होती है, लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता और स्पीकर समितियों के कामकाज में दखल नहीं देते।
कश्यप ने कहा कि संसद में कोर्ट में लंबित मामलों पर चर्चा न करने का नियम है, लेकिन यह एक ऐसा नियम है जिसका कोई एक पक्ष नहीं है। इसमें भी कुछ अपवाद हैं। हमें नहीं पता कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां आ गईं कि स्पीकर को यह निर्देश देने पड़े।
लोकसभा के एक और पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने इस मामले में कहा कि अदालत में लंबित केसों का नियम कोई तय नियम नहीं है। कमेटियों के मामले में तो अदालत में लंबित मामलों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है।
उन्होंने कहा कि रूलबुक में एक नियम है, जिसके अनुसार सदन किसी भी नियम को रद्द कर सकता है। यहां तक की कोर्ट में लंबित मामलों पर चर्चा न कराने के नियम को भी, ताकि सदन उस मुद्दे पर चर्चा कर सके। आचार्य ने ऐसे कई उदाहरण दिए, जिसमें स्टैंडिंग कमेटियों ने कोर्ट में लंबित मामलों पर भी चर्चा की है।
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उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2012 में संसदीय कमेटी ने कोल ब्लॉक आवंटन में हुए घोटाले के मामले पर चर्चा की थी, जबकि यह मामला एक जनहित याचिका की वजह से पहले ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। इसके अलावा 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में कथित गड़बडयि़ों की जांच के लिए फरवरी 2011 में जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (जेपीसी) का गठन हुआ था। जबकि इस मामले की 2010 से ही उच्चतम न्यायालय में सुनवाई चल रही थी।
आचार्य ने कहा कि पीएनबी घोटाले में भी जब मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित था, तब इस पर वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली समिति में चर्चा हुई थी। कमेटी ने इस मामले में वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से पीएनबी में हुए कथित घोटाले पर सवाल किए थे और इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए भी कहा था।

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