मिल गयी हिटलर की सोने से लदी ट्रेन, दो लोगों ने खोज निकाली

मिल गयी हिटलर की सोने से लदी ट्रेन, दो लोगों ने खोज निकाली….. किस्से कहानियों में गड़े हुए खजाने की बातें आपने खूब सुनी होगी, लेकिन यूरोपीय देश पोलैंड में ये गड़ा हुए खजाने की खोज किस्से कहानी से बाहर निकल कर हकीकत बन गई है। खजाना खोजने वाले दो पेशेवर खोजकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने सोने से लदी उस ट्रेन को खोज निकाला है, जिसके बारे में कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी फौज ने उसे एक अंधेरी सुरंग में छुपा दिया था। कहा जाता है कि हिटलर की फौज ने ये खजाना अपने कब्जे वाले इलाके में लूटमार कर इकट्ठा किया था। लेकिन अब सोने से लदी इस ट्रेन को जमीन से निकालने की तैयारियां शुरू होने वाली है, जिसके बाद दुनिया के सामने भी आ जाएगी सोने से लदी ट्रेन।

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साल 1945, द्वितीय विश्वयुद्ध अपने अंत के करीब पहुंचने लगा था। मित्र देशों के फौजी अभियान के सामने हिटलर की नाजी सेना के पांव उखड़ने लगे थे। हार सामने देख कर नाजी जनरल अपने भविष्य को लेकर चिंता में पड़ चुके थे। उन्होंने अपने कब्जे वाले इलाके में जुल्मों सितम तेज कर दिया था। जगह-जगह से लूटे हुए सोने-चांदी और कीमती सामानों को युद्धबंदियों और गुलामों के जरिए दिन रात बक्सों में बंद किया जा रहा था। जहां मुमकिन था वहां सोने चांदी को गला कर उन्हें बड़ी-बड़ी सिल्लियों और सोने की ईंटों में भी बदला जा रहा था। युद्ध खत्म होने के बाद भी अगर छापामार लड़ाई जारी रखनी पड़े तो पैसे की कमी आड़े न आए इसलिए नाजी जनरल जगह-जगह ऐसे खुफिया ठिकाने तैयार कर रहे थे जहां लूटा हुआ खजाना छुपाया जा सके।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कई जगह से नाजियों का छुपाए गए ऐसे खजाने बरामद भी हो चुके हैं। लेकिन करीब 70 बरस से खोज एक ऐसी ट्रेन की हो रही है जिसके बारे में कहा जाता है कि वो पूरी ट्रेन ही सोने से लदी हुई थी। सोने से लदी हुई ट्रेन 150 मीटर लंबी थी।

आज के वक्त के हिसाब से माना जा रहा है कि ट्रेन में इतना सोना भरा है कि उससे किसी छोटे-मोटे अफ्रीकी मुल्क की गरीबी हमेशा के लिए दूर की जा सकती है, इसीलिए इस ट्रेन की तलाश में लंबे वक्त से खजाना खोजने वाले कई पेशेवर विशेषज्ञ जुटे हुए थे और करीब 70 साल बाद उस ट्रेन को खोज निकाला गया है। यूरोपीय देश पोलैंड के पहाड़ी इलाके में बसे छोटे से जिले वालब्राइख को कुछ दिन पहले एक चिट्ठी मिली है, जिसमें एक पोलिश और एक जर्मन नागरिक ने दावा किया है कि उन्होंने उस जगह को खोज निकाला है जहां नाजियों ने खजाने से लदी ट्रेन को छुपाया था। लेकिन उसका पता बताने के लिए दोनों ने खजाने में 10 फीसदी हिस्सेदारी की शर्त भी रखी है।

वालब्राइख जिला परिषद और इस छोटे से जिले में रहने वाले तमाम लोगों को ही नहीं बहुत से इतिहासकारों का भी कयास था कि सोने से लदी वो ट्रेन उनके शहर के आसपास ही कहीं जमीन की गहराइयों में गुम है। दरअसल, इस ट्रेन की कहानी शुरू हुई थी अप्रैल 1945 में जब सोवियत लाल सेना तेजी से आगे बढ़ते हुए जर्मनों को पीछे खदेड़ रही थी। नाजियों ने इस हालात की कल्पना कर ली थी इसीलिए उन्होंने वालब्राइख के आसपास की दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जमीन के भीतर गुफाओं और सुरंगों का एक जाल से बना दिया था।

8 मई 1945 को वालब्राइख पर सोवियत लाल सेना का कब्जा हो गया। लेकिन इससे पहले ही लूटमार कर जुटाए गए सोने से भरी नाजियों की ट्रेन उस इलाके की तरफ जा चुकी थी जहां पर नाजियों ने खजाना छुपाने का इंतजाम किया हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उस ट्रेन को बहुत से खोजी दलों ने खोजने की कोशिश की है, जिनका मानना था कि सोने से लदी वो ट्रेन वालब्राइख के मशहूर सियाज के किले के पास मौजूद सुरंगों से ही गुजरने के बाद पहाड़ों में कहीं गुम हो गई। अब दो लोगों ने एक लॉ फर्म के जरिए दावा किया है कि उन्होंने उस जगह को खोज निकाला है जहां नाजियों ने ट्रेन को छुपा दिया था।

वालब्राइख जिला परिषद को ख्रुााना मिल जाने की सूचना देने वाली कानूनी फर्म का कहना है कि उनके क्लाइंट इलाके से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। जानकारी के मुताबिक दोनों में से एक शख्स के पास पुरातात्विक खुदाई करने का अच्छा खासा तजुर्बा है। उसके पास जमीन के नीचे छुपी चीजों को खोज निकालने वाली आधुनिक मशीनें भी हैं। वालब्राइख जिला परिषद भी उनके दावे को सही मान रही है, लेकिन मामला अब इस बात पर फंसा है कि खजाने का 10 फीसदी हिस्सा देने की दोनों की शर्त पर क्या फैसला होता है।

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