समागम से पूर्व पिता ने क्या खाया, इस पर निर्भर करती है शिशु की सेहत!

लखनऊ: शिशु की सेहत और वजन कैसा होगा, यह मां ही नहीं, पिता की डाइट पर भी निर्भर करता है। अभी तक डॉक्टर सहित सबका ध्यान सिर्फ मां के आहार पर रहता था, लेकिन नयी रिसर्च कहती है कि समागम से पूर्व पिता ने क्या खाया था, इस पर होने वाले बच्चे की सेहत निर्भर करती है। सिनसिनेटी यूनिवर्सिटी के बायोलॉजिस्ट- प्रोफेसर माइकल पोलक और जोशुआ बेनोइट ने नर फ्रूट फ्लाई के भोजन में बदलाव कर करके देखा कि उनके शिशुओं की सेहत और पिता के आहार के बीच क्या रिश्ता है।
यह अध्ययन इसी हफ्ते प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी बी की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। पोलक ने कहा कि उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पिता के आहार और शिशुओं की सेहत के बीच सीधा रिश्ता होता है। इस अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया और यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के चार्ल्स परकिंस सेंटर का भी योगदान रहा।
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सबको पता है कि पिता के आधे जीन्स बच्चे में पहुंचते हैं। लेकिन यूसी की यह स्टडी ऐसे वक्त में सामने आये हैं जब शोधकर्ता जीन्स के अलावा बाकी अन्य फैक्टर्स पर भी गौर कर रहे थे। इनमें पिता के सेमाइनल प्लाज्मा के साथ शिशु में पहुंचने वाले टॉक्सिंस मुख्य थे। ये टॉक्सिन कुछ जीन्स की सक्रियता को बाधित कर सकते हैं। पर्यावरण के प्रभाव से भी कुछ ऐसा ही असर हो सकता है। फिर ये बदलाव पीढ़ी दर पीढ़ी जारी रह सकते हैं। इन्हें एपिजेनेटिक्स कहते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में पिछले साल एक स्टडी में नर चूहे को फास्ट फूड की डाइट पर रखा गया और उसके बेटों को डाइबिटीज हो गयी, हालांकि बेटियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। यदि ये लक्षण पिता के डीएनए में दर्ज हो जायें तो दोनों ही संतानों की सेहत पर समान प्रभाव दिखाई देगा।
फ्रूट फ्लाई पर हुई रिसर्च को छह नोबल प्राइज मिल चुके हैं। ताजा नोबल प्राइज इस पर था कि जीन्स का शरीर की बॉडी क्लॉक पर क्या प्रभाव पड़ता है। इन मक्खियों पर रिसर्च का क्रेज बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में प्रारम्भ हुआ। आज भी वैज्ञानिक इन्हीं मक्खियों पर रिसर्च करते हैं। कारण यह है कि इनके 60 प्रतिशत जीन्स हमसे मेल खाते हैं और इनके 75 प्रतिशत जीन्स हमारी बीमारियों से मेल खाते हैं। इस नन्हीं सी मक्खी पर 150 साल से रिसर्च चल रही है और आज भी यह वैज्ञानिकों की प्रिय मॉडल है।

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