शनिदेव : नवग्रहों के राजा

ग्रंथों के अनुसार शनिदेव कश्यप गोत्रीय हैं तथा सौराष्ट्र उनका जन्मस्थल माना जाता है।
शनि अपना प्रभाव तीन चरणों में दिखाता है, जो साढ़े 7 सप्ताह से साढ़े 7 वर्ष तक रहता है। पहले चरण में जातक का संतुलन बिगड़ना, निश्चय विचार से भटकाव। दूसरे चरण में मानसिक और शारीरिक रोग। तीसरे चरण में मस्तिष्क का ठीक नहीं रहना, क्रोधी होना।

ज्योतिष में शनि को न्यायाधीश और क्रूर ग्रह कहा गया है। यही ग्रह हमारे कर्मों का फल प्रदान करता है। सूर्य पुत्र शनि देव की मूर्ति घर में रखना अशुभ माना जाता है। इनकी पूजा घर के बाहर किसी मंदिर में ही करना चाहिए, इनकी मूर्ति घर में लाने से बचना चाहिए।

प्रात:काल सूर्य उदय होने से पूर्व उठकर सूर्य भगवान की पूजा करें, गुड़ मिश्रित जल को चढ़ाएं।
माता-पिता और घर के बुजुर्गों की सेवा करें।
गुरु या गुरुतुल्य के आशीर्वाद लेते रहें।
किसी को अकारण कष्ट नहीं दें और प्रत्येक को भगवान का स्वरूप समझें।
पारिवारिक भरण-पोषण के लिए ईमानदारी और मेहनत से कमाए धन का सदुपयोग करें।

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