विध्वंसक ब्रेनवाॅश और आतंकवाद का शिकंजा

ISIS-1भारतीय सेना के एक रिटायर्ड हिंदू लेफ्टीनेंट जनरल की बेटी आस्ट्रेलिया पढ़ने गई थी। हालांकि उसने स्नातक दिल्ली में ही रहकर डीयू में किया था। बहरहाल आस्ट्रेलिया से वापस लौटने पर उसकी दिनचर्या रहस्मय जैसी हो गई थी। इस कारण कर्नल साहब को उसे लेकर कुछ शक हुआ। उन्होंने उसके लैपटाप व मोबाइल रिकार्ड को खंगाला तो पता चला कि उनकी लड़की आईएसआईएस की भक्त हो चुकी है। वह आईएसआईएस में भर्ती के लिए चैट के जरिए नौजवानों को मोटीवेट करती है। न सिर्फ इतना बल्कि वह खुद भी
आईएसआईएस की ओर से लड़ने के लिए सीरिया जाने का इरादा बना चुकी है।

इन तथ्यों के सामने आने से कर्नल साहब के होश उड़ गये। उन्होंने तत्काल आईबी से संपर्क किया और लड़की को वापस रास्ते पर लाने के लिए मदद मांगी। इसके पहले कुछ नौजवान आईएसआईएस से संपर्क रखने के मामले में पकड़े गये थे। चैंकाने वाली बात उनके संबंध में यह थी कि कुछ नादान हिंदू लड़के भी एडवेंचर की भावना में बहकर या किसी और कारण से उनके साथ हो गये थे। आतंकवाद को लेकर भारत में एक धारणा बनाई जा चुकी है कि इसकी जड़े इस्लाम के दर्शन और शिक्षाओं में है। लेकिन सात्विक हिंदू संस्कारों को गढ़े जाने की उम्र तक जी लेने के बावजूद भी हिंदू समाज के लड़के आईएसआईएस के सम्मोहन में कैसे उलझ रहे हैं यह सवाल इन प्रसंगो के बरक्स बहुत ही पेंजीदा बन जाता है। खाटी हिंदू परिवार में रहकर किस आकर्षण की वजह से इस समुदाय के नौजवान इस्लाम की ओर मुखातिब हो रहे हैं। इस पर सोचा जाना चाहिए।

बहुत पहले मनहर चैहान का एक उपन्यास मैंने पढ़ा था। उपन्यास बेहद खतरनाक था। जिसका प्रतिनायक अपने नजदीक आने वालों पर अपना बौद्धिक प्रभुत्व जमाने के बाद उसे यह समझाने की कोशिश करता था कि दुनियां में चरम आनंद दूसरे को तड़पते हुए देखने से मिलता है। दूसरा जितना पीड़ा यातना महसूस करे सामने वालें को उतने ही आनंद की अनुभूति होती है। बाद में उसमें महिला पात्र आती है और उसे अपने प्रभाव में लेकर उक्त थ्योरी वह उसमें इतने असरदार तरीके से डाल देता है कि महिला आनंद और सुख की छलनापूर्ण प्राप्ति के लिए अपने ही बेटे की हत्या कर डालती है।

साहित्य पूरी तरह काल्पनिक नहीं होता। वास्तविक घटनायें ही औपन्यासिक कथा वस्तु का आधार बनती है। इसलिए मनहर चैहान की उपन्यास को काल्पनिक कहकर सिरे से
खारिज नही किया जा सकता। इस हद तक ब्रेनवाॅश की क्षमता कैसे प्राप्त की जा सकती है और कौन लोग हैं जो इस विध्वंसक क्षमता को अपने में संजोने की कोशिश करते हैं। तालिबान हो या आईएसआईएस इनके कर्ताधर्ता इसमें माहिर हैं। वे अपना कौशल अभी मुख्य रूप से मुस्लिम लड़को पर ही आजमा रहे हैं। लेकिन जब वे उसका प्रयोग हिंदू लड़के-लड़कियों पर करते हैं तब भी उनका उतनी ही कामयाबी मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि विध्वंसात्मक उद्दीपन इस्लाम में नहीं उनके अपने तरीके से किसी दर्शन को पेश करने के अंदाज में है। जिहाद जैसी अवधारणाएं तोड़मरोड़ कर पेश करने में उन्हें ज्यादा आसान लगता है। इसलिए वे लोग इस्लाम को अवलंबन बना रहे हैं। आतंकवादी अपनी फौज के विस्तार के लिए नेट और सोशल मीडिया का सहारा लेने को अपनी रणनीति का केंद्र बिंदु बना चुके हैं। इंटरनेट पर जिहाद के नाम पर खून-खराबा को जस्टीफाइड करने के लिए वे वैसे ही असरदार तर्क परोसते हैं जैसा कि मनहर चैहान के उपन्यास का प्रतिनायक प्रस्तुत करता था। सीआईए ने भी माना है कि सुकुमार मनोमस्तिष्क के किशोरों और युवकों को ब्रेनवाॅश करके खूंखार बनाने की जो सिद्धि आईएसआईएस ने अर्जित कर रखी है उसका मनोवैज्ञानिक तरीके से ही तोड़ जब तक नहीं निकलेगा तब तक विध्वंसक प्रवृत्ति का शमन संभव नही हैं और तब तक आतंकवाद भी कितने भी गोला बारूद इस्तेमाल कर लिया जाये खत्म होने वाला नहीं है।

इसका एक सिरा अमेरिका प्रेरित बाजारवाद से भी जुड़ा है। लगभग ढ़ाई-तीन दशक पहले से मुक्त अर्थव्यवस्था के भाष्यकारों ने पूरी दुनिया को यह सलाह देनी शुरू कर दी थी कि इतिहास, राजनीति विज्ञान इत्यादि सोशल साइंस के विषयों की पढ़ाई कराने की कोई जरूरत नहीं है। नई पीढ़ी को तकनीकी विशेषज्ञता से लैस करना होगा तभी दुनियां प्रगति की राह पर तेजी से दौड़ पायेगी। हालांकि इसके पीछे कोई सदविचार न होकर शैतानी मंसूबे थे। बाजार के लिए संयम के उसूल और सारी नैतिक मान्यतायें व परंपरायें वैरियर साबित हो रही थीं। इसलिए सोशल साइंस के सब्जेक्ट पढ़ाई की मुख्यधारा से हटाये गये और विचार, दर्शन व इतिहास का अंत हो चुका है। ऐसी धारणायें फैलाई गई।

यह दूसरी बात है कि विचारों की भूख भी मानव समाज में एक आदिम भूख है। जिसका उन्मूलन नही किया जा सकता। एक ध्रुवीय दुनियां में वैकल्पिक विचार मंथन की गुंजाइश को आपने पूरी तरह समाप्त कर दिया है तो विचार की भूख मिटाने के लिए लोग कहीं न कहीं तो जायेगें ही। फिर भले ही वह आतंकवादियों के दरवाजे क्यों न हों। आतंकवाद का संबंध विचार और इतिहास के अंत जैसी भ्रंात धारणाओं के बलवती होने में भी निहित है यह मानना पड़ेगा।

इन पंक्तियों के लेखक ने पहले भी कई बार लिखा है कि इस्लामिक जगत में एक नये युग का अवतरण होने वाला है। जिसमें भारतीय मुस्लमान नेतृत्व की भूमिका अदा करेगें। इस्लाम की जिन पवित्र अवधारणों को आतंकवादी भावनाओं को उकसाने के लिए इस्तेमाल करने की गंुजाइश है उन्हें चिन्हित करते हुए बरेलवी मसलक के मौलानओं ने अपने मदरसो के लिए नया पाठ्यक्रम तैयार किया है। जिसमें मोहम्मद साहब की सुन्नत के माध्यम् से नई पीढ़ी को जागरूक करने की चेष्टा की जायेगी। गलत व्याख्याओं को विवेकपूर्ण इस्लाम के जरिये निष्प्रभावी करने का काम शुरू हो चुका है। किसी भी आतंकवादी के जनाजे में मुस्लमानों के शामिल न होने और न ही उसके लिए फातिहा पढ़ने का फतवा बेहद क्रांतिकारी है। हिंदी में मुस्लिम समाज के दानिशमंद पत्रकारों ने खबर की खबर के नाम से एक पोर्टल शुरू किया है। जिसमें अफगानिस्तान पर कब्जे के दौरान अमेरिका ने फंडिंग करके वहां के मदरसों के जरिए बहुत ही अनर्थकारी व्याख्यायें प्रक्षिप्त कराई। उनका निराकरण करने में यह पोर्टल शानदार भूमिका का निर्वाह कर रहा है। ऐसे में दूसरों को भी सब्र और सलीके से पेश आने की जरूरत है। ताकि विवेकपूर्ण इस्लाम के अगुवाकारों के मकसद में किसी तरह की रुकावट की स्थिति पैदा न हो सके।

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