लोकसभा चुनाव 2019 में उत्तर प्रदेश देगा सबको सटीक जवाब

सियाराम पांडेय ‘शांत’
पूरी दुनिया की नजर भारत में होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। इस लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक  80 सीटें उत्तर प्रदेश में हैं।  2014 के लोकसभा में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने उत्तर प्रदेश की 73 सीटें जीती थी। अकेले भाजपा यहां 71 सीटों पर विजयश्री का वरण किया था।   इस नाते सभी  इस बार मतदाताओं का मिजाज समझने को बेताब हैं। उसके गुस्से और प्यार के तापमान को चुनावी पैरामीटर पर मापने के प्रयास तेज हो गए हैं। कयासों का बाजार तो पहले ही गर्म है।   हालांकि उत्तर प्रदेश के  चुनाव नतीजे हमेशा विस्मयकारी रहे हैं। उम्मीद की जा सकती है कि इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा। वैसे तो इस बार  पूरे देश में चुनाव विकास के मुद्दे पर ही लड़ा जाएगा लेकिन चौकीदार बनाम चोर, कामदार बनाम नामदार, जाति और धर्म के मुद्दे भी कम प्रभावी नहीं होंगे। विदश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है कि इस बार सर्जिकल स्ट्राइक मतदाता करेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। मतदाता हर चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं। इस बार का चुनाव भी उसका अपवाद नहीं होगा। हालांकि इस चुनाव के केंद्र में भाजपा ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष एकजुट भी हो रहा है। कहीं संपूर्णता में और कहीं अंशत:। पिछला लोकसभा चुनाव भी नरेंद्र ममोदी को केंद्र में  रखकर ही लड़ा गया था और इस बार भी हाल वैसा ही है। उत्तर प्रदेश में दलीय गठबंधन को  महामिलावट कहने वाली भाजपा का दावा लोकसभा चुनाव में 543 में से 300 से अधिक सीटें जीतने का  है तो विपक्ष उसे सबसे कम सीटों पर सिमटता बता रहा है। कयासों का बाजार गर्म है लेकिन इस बार का चुनाव हर चुनाव से ज्यादा रोचक और आक्रामक होगा, इस सत्य से इनकार नहीं किया  जा सकता।  देश में विकास का इकतारा भले ही अपना बहुत प्रभाव न छोड़ पाए लेकिन जाति के सौ तारों वाले संतूर को साधने के बाद ही चुनावी विजय की धुन निकलेगी। धर्म और जाति के मुद्दे हर चुनाव में हावी रहे हैं, इस चुनाव में भी उसका असर दिखना लगभग तय है।
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उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों का साधने का हर संभव प्रयास हुआ है। सपा और बसपा गठजोड़ मैदान में है। कांग्रेस पर भी गठबंधन के पासे इन दोनों दलों ने फेंके जरूर लेकिन कांग्रेस ने यूपी में अकेले दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चुनाव की दुंदुभि बजने के बाद उसका रुख क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन चुनाव में इस बार सांसें रोक देने वाला हैरतअंगेज चुनाव होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।  भीम आर्मी चीफ चंद्रशेर से अस्पताल में प्रियंका गांधी का मिलन और इसके ठीक बाद  अखिलेश यादव और मायावती के बीच का वार्ता बहुत कुछ कहती है। संकेत तो यहां तक मिल रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस के लिए छोड़ी गई सीटों रायबरेली और अमेठी में अपना उम्मीदवार उतार सकता है।जातीय समीकरणों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में 49 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे ज्यादा संख्या दलित मतदाता हैं।  कुछ जिलों को अपवाद मानें तो शेष जिलों में दलित दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है। वहीं 20 जिले ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर सबसे ज्यादा हैं और 20 जिलों में वे दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक भी हैं।
ब्राह्मण, राजपूत, यादव खींचते हैं सियासत की बड़ी रेखा
उत्तर प्रदेश में  सियासत की बड़ी रेखा तीन प्रमुख जातियां  यादव, ठाकुर और ब्राह्मण खींचती हैं। अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग संख्या के लिहाज से प्रदेश में सबसे ज्यादा है। हिंदू-मुस्लिम और अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग को जोड़ दें तो हर जिले में इनकी संख्या सर्वाधिक है। इसमें शक नहीं कि ओबीसी समूह के तौर पर वोट नहीं करता। ओबीसी में सबसे ज्यादा यादव हैं। उत्तर प्रदेश के 44 जिलों में 8 फीसदी से अधिक यादव मतदाता हैं। इनमें से 9 जिलों में यादवों की हिस्सेदारी 15 फीसदी या इससे ऊपर है। एटा, मैनपुरी और बदायूं में यादव मतदाता मुस्लिम मतदाताओं के बराबर हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-गुर्जर  मतदाता हावी
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में यादवों की संख्या नगण्य है। इन इलाकों में जाट और गुर्जरों की खासी तादाद है। जाट मतदाताओं का पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खास असर है। बागपत में तो लगभग 40 प्रतिशत जाट और गुर्जर मतदाता हैं। वहीं बुंदेलखंड और पूर्वांचल के जिलों में लोध, कुर्मी, पाल और कुशवाहा जैसी जातियां यादवों के बराबर हैं। ये जातियां अक्सरहां यादवों के प्रभाव को न्यूट्रल भी करती रही हैं।  अति पिछड़ी जातियों की भी यहां  लंबी जमात है जिनके पास अलग-अलग सीटों पर चुनाव जिताने की कुंजी है। जाति का खेल हर चुनाव में खेला जाता रहा है और इस चुनाव में भी उसकी पटकथा सभी दल अपने-अपने तरीके से लिखने में जुटे हैं।
यूपी के 60 जिलों में 8 प्रतिशत ब्राहमण मतदाता
60 जिलों में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 8 प्रतिशत से अधिक है। इनमें से  29 जिले ऐसे भी हैं जहां ब्राह्मण मतदाता 12 फीसद हंै।  ब्राह्मणों की खासियत यह है कि वे अपनी संख्या के बराबर या  उससे अधिक मतदाताओं को किसी भी दल के पक्ष की ओर आकर्षित करने की कूव्वत रखते हैं। पूरे प्रदेश में ठाकुर मतदाता 5 से 6 प्रतिशत संख्या में हैं। पूर्वांचल के जिलों में ठाकुर और भूमिहार मतदाताओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत है। गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मथुरा, आगरा, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, सुल्तानपुर, बांदा और चित्रकूट ऐसे जिले हैं, जहां यादवों के साथ ठाकुरों की बहुतायत है। इन तीन प्रमुख जातियों की तुलना में वैश्य या बनिया समुदाय की आबादी प्रदेश में कम है, लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के कारण इनकी जरूरत हर दल को पड़ती है। कुर्मी जाति भी उत्तर प्रदेश चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
16 जिलों में चुनाव पर सीधा असर डालते हैं कुर्मी
कुर्मी जाति की दमदार मौजूदगी संत कबीरनगर, मि.र्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर और बस्ती जिलों में देखी जा सकती है। इन 16 जिलों में कुर्मी मतदाता 6 से 10 प्रतिशत तक हैं।
लोध का क्रोध भी बिगाड़ सकता है समीकरण
कुर्मी के अलावा लोध या लोधी मतदाता भी उत्तर प्रदेश  में ठीकठाक स्थिति में हैं। इनका क्रोध किसी भी राजनीतिक दल के जीत के समीककरण को बिगाड़ सकता है। रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, माहामाया नगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जिलों में लोध मतदाता 5 से लेकर 10 प्रतिशत हैं।
पिछड़ी जाति के वोट जिधर, वही दल सिकंदर
उत्तर प्रदेश के  जातीय समीकरण पर गौर करें तो सामान्य वर्ग की संख्या-20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या -54.05, अनुसूचित जाति-24.94 व अनुसूचित जनजाति-0.06 प्रतिशत है। अन्य पिछड़े वर्ग की 54.05 प्रतिशत की आबादी में यादव/अहीर-19.40 यानी 10.46 प्रतिशत , अति पिछड़े वर्ग लोधी, कुर्मी, जाट, गूजर, सोनार, अरख, गोसाई, कलवार आदि की आबादी 10.22 प्रतिशत है जिसमें कुर्मी-7.46, लोध-6.06, जाट-3.60, गूजर-1.71, कलवार-0.70 प्रतिशत हैं। अत्यन्त पिछड़े वर्ग की आबादी अन्य पिछड़े वर्ग में 61.59 प्रतिशत यानी कुल जनसंख्या में 33.34 प्रतिशत है। जिसका उत्तर प्रदेश की राजनीति में खासा महत्व है। अत्यन्त पिछड़े वर्ग में निषाद,कश्यप,बिन्द, रायकवार-12.91 प्रतिशत, पाल, बघेल-4.43, कुशवाहा, मौर्य,शाक्य,काछी, माली-8.56, मोमिन अंसार-4.15, तेली,साहू-4.03, प्रजापति-3.42, हज्जाम, नाई,सविता-3.01, राजभर-2.44, चौहान,नोनिया-2.33, बढ़ई,विश्वकर्मा-2.44, लोहार-1.81, फकीर-1.93, कन्डेरा,मंसूरी-1.61, कान्दू, भुर्जी-1.43, दर्जी-1.01, व अन्य अत्यन्त पिछड़ी जातियों की संख्या-12.97 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश के समीकरण में अतिपिछड़ी, विशेषकर सर्वाधिक पिछड़ी जातियों का 50 प्रतिशत से अधिक रुझान जिस दल की ओर होता है, उत्तर प्रदेश में वहीं दल सिकन्दर बनता है।
लोक सभा चुनाव-2014 में सामाजिक समीकरण व अतिपिछड़ों की बदौलत अप्रत्याशित सफलता प्राप्त करने वाली भाजपा हर स्तर पर पिछड़ों, अतिपिछड़ों को साधने में जुटी है। आगामी विधान सभा चुनाव में 33 प्रतिशत से अधिक संख्या वाली अत्यन्त पिछड़ी निषाद, मल्लाह, केवट, लोध, कोयरी, बंजारा, माली, सैनी, लोहार, बढ़ई, नाई, हज्जाम, बारी, धीवर, कहार, राजभर, बियार, नोनिया, किसान, गोड़िया, तेली, तमोली, बरई आदि जातियों की भूमिका काफी अहम होगी उत्तर प्रदेश से 80 सांसदों में ब्राह्मण-17, राजपूत -16, जाट, यादव, लोधी, कुर्मी-5-5, मौर्य,कुशवाहा,सैनी, निषाद,कश्यप-3-3, जाटव, गूजर, वाल्मीकी-2-2, पासी-6, कोरी,भूमिहार, धोबी, मल्लाह, खटिक, धानिक, खरवार जाति के 1-1 सांसद हैं। उत्तर प्रदेश से केन्द्रीय मंत्री मण्डल में 11 मंत्री हैं, जिनमें 3 ब्राह्मण, 2 राजपूत, 1-1 लोधी, निषाद, कुर्मी, धानुक, जाट, भूमिहार जाति सम्बन्धित हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को  2009 के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक वोट मिले थे। उत्तर प्रदेश में 2009 में उसे 17.5 प्रतिशत वोट के साथ 10 सीटें मिली थी जबकि 2014 में 42.3 प्रतिशत वोट के साथ उसने  71 सीटों पर अपना विजयी परचम लहराया था। 25 प्रतिशत वोट भाजपा को कहां से मिले, इसे लेकर विपक्ष में लंबे समय तक खलबली भी रही। इस बार सपा-बसपा गठबंधन की कोशिश यादव, मुस्लिम और दलित मतों को अपने पक्ष में करने की तो है ही,वे सवर्णों को भी अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। वैसे कांग्रेस भी सवर्णों के साथ-साथ दलितों और पिछड़ों को साधने में जुटी है और भाजपा का तो नारा ही है-सबका साथ-सबका विकास। उसने जिस तरह पूर्वांचल और पश्चिमांचल के विकास के प्रयास किए हैं, उसका लाभ उसे मिल सकता है। यह चुनाव राष्ट्रवाद, विकासवाद के दावों पर भी लड़ा जाएगा। विपक्ष का प्रयास भाजपा को यूपी में ही नहीं, पूरे देश में रोकने का है लेकिन भाजपा ने भी विपक्ष को घेरने के लिए विकास के जो चौसर बिछाए हैं, विपक्ष उसे नजरअंदाज तो कर सकता है, लेकिन उसके प्रभावों से बच नहीं सकता। झूठ और सच का सियासी खेल तो चुनाव पूर्व से ही आरंभ हो गया था। इसमें तेजी ही आयेगी। सभी दलोंने  अपने-आपने तरकश से आरोपों-प्रत्यारोपों के अनेक ब्रह्मास्त्र निकाले हैं, उनसे निपटने के बाद ही कोई विजय पथ पर आगे पथ संचलन कर सकेगा। चुनाव वह दरअसल आग का दरिया है जिसमें सभी को डूब कर  ही बैतरणी पार करनी है।

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