रामचरित मानस में लिखे है तारीफ करने के इतने फायदे…

- in धर्म

प्रशंसा और प्रसन्नता एक-दूसरे से जुड़े हैं। प्रसन्न मन का उद‌्गार प्रशंसा में फूटता है। प्रशंसा करना भी एक कला है। कुछ लोग सकुचाते हैं, लज्जावश प्रशंसा नहीं कर पाते हैं। कुछ लोग दूसरों को कम समझते हैं, इस वजह से प्रशंसा नहीं कर पाते। जो हृदय दूसरों की प्रशंसा करने से कतराते नहीं है, वह निर्भीक और पूर्वाग्रहों से रहित होते हैं। एक पवित्र हृदय में ही प्रशंसा के भाव आते हैं और जिसकी प्रशंसा की जाती है, उसे बेहतर व्यक्ति बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।रामचरित मानस में लिखे है तारीफ करने के इतने फायदे...

एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बार-बार जैसा कहा जाता है, अंतर्मन उसे सच समझ लेता है और वह वैसा ही बन जाता है। आप किसी बच्चे से कहें कि तुम पढ़ाई में पहले से बेहतर हो गए हो, बहुत मेहनत से पढ़ते हो, तो धीरे-धीरे उस बच्चे का मन इसे सच मान लेगा और वह सच में पढ़ाई में पहले से श्रेष्ठ हो जाएगा। अगर उसकी नित्य निंदा करें और कहें कि उसके कम अंक आते हैं, वह टीचर की बातें नहीं समझ पाता है तो उस बच्चे का मन मुरझा जाएगा और वह पढ़ाई से दूर भागेगा।

रामचरितमानस के किष्किंधा काण्ड में जब हनुमान को सीता की खोज में समुद्र के पार जाना था, वह उदास और गुमसुम से बैठे थे। उस समय रीछराज जामवंत की प्रशंसा प्रोत्साहित करने वाली थी और उन्हें सागर पार जाने का हौसला देने वाली थी।

महाकवि कालिदास लिखते हैं- स्तोत्रं कस्य ना तुष्टये। स्तुति अर्थात् प्रशंसा किसे प्रसन्न नहीं करती है वेदों, पुराणों में देवी-देवताओं की स्तुति के लिए विविध स्तोत्रों की रचना की गई है। चाणक्य नीति में भी किसी व्यक्ति से मनचाहा कार्य करवाने के चार सूत्र हैं- साम, दाम, दंड और भेद। साम अर्थात् स्तुति का स्थान प्रथम है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप किसी की प्रशंसा करें और वह आपके वश में न आ जाए।

अपनी तारीफ सुनना किसे नहीं भाता है? सभी चाहते हैं कि लोग हमारे कार्यों, प्रयासों की सराहना करें, पर तारीफ के दो बोल बोलने पड़ते हैं तो जाने क्यों हमारी जबान पर ताला लग जाता है। सिर्फ एक स्थान है जहां हर आगंतुक मुक्तकंठ से सिर्फ प्रशंसा करता है। उसका नाम ‘शोक सभा’ है। प्रशंसा करने के लिए शोक सभा की प्रतीक्षा न करें। प्रशंसा को आप सकारात्मक ऊर्जा कह सकते हैं। यह ऐसा भाव है जो मिलने वाले का उत्साहवर्धन करता है और उसके व्यक्तित्व को निखारने में सहयोग देता है।

एक छोटी सी बात गांठ बांध लें- निंदा, हिंसा और प्रशंसा, प्रेम का एक रूप है। प्रशंसा मुक्तकंठ से करें, पर चाटुकारिता नहीं। चाटुकारिता में अपना उल्लू सीधा करने की मंशा होती है। साथ ही यह भय होता है कि अगर सत्य वचन कहे जाएं तो कहीं कोपभाजन न बनना पड़े। इसलिए सत्य कहा जाए और वह कर्णप्रिय हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

दुनिया में छिपा भगवान् भोलेनाथ और हनुमान जी एक ऐसा रहस्य, जिसे जान कर हैरान हो जाओगे !

दोस्तों आज हम आपको बताये हनुमान जी और